एक गद्दार पति, जालोर की वीरांगना हीरादे देशभक्त पत्नी और जालोर के किले की वो 1 खूनी रात!

जालोर की वीरांगना हीरादे के बारे मे और जानिए जालोर के इतिहास की सबसे रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी। जब साल 1311 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौरान सेनापति बीका दहिया ने गद्दारी की, तो उसकी देशभक्त पत्नी ‘क्षत्रानी हीरादे’ ने इतिहास का सबसे बड़ा न्याय किया। देशप्रेम और बलिदान की यह अमर गाथा!

जालोर की वीरांगना हीरादे और जालोर दुर्ग की खूनी रात

एक ऐसा इतिहास, जहाँ एक पत्नी ने अपने ही पति का सिर धड़ से अलग कर दिया! क्यों एक सुहागन को खुद अपने हाथों से अपना सिंदूर उजाड़ना पड़ा? यह कहानी है जालोर के किले की उस खूनी रात की, जब एक औरत का देशप्रेम उसके सुहाग पर भारी पड़ गया था!”

एक गद्दारी की कहानी

साल था 1311। दिल्ली का क्रूर सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी जालोर के अभेद्य किले को घेर कर खड़ा था। महीनों बीत गए, लेकिन खिलजी की सेना किले का एक पत्थर तक नहीं हिला पाई। थक हार कर खिलजी लौटने ही वाला था कि… इतिहास के पन्नों में दर्ज हुई एक शर्मनाक गद्दारी!”

गद्दारी और वो मशहूर मुहावरा

कान्हड़देव चौहान का सेनापति, बीका दहिया, पैसों और राजपाट के लालच में आकर खिलजी से जा मिला। उसने किले की एक गुप्त और कच्ची दीवार का राज खिलजी को बता दिया—वही राज जिसके कारण मारवाड़ में कहावत बनी: ‘राई के भाव रात ही बीत गए’। गद्दार बीका सोने के सिक्कों से भरी पोटली लेकर जब गर्व से अपने घर पहुँचा, तो उसने अपनी पत्नी हीरादे को अपनी इस ‘कामयाबी’ के बारे में बताया।”

जालोर की वीरांगना हीरादे का न्याय

पति के मुंह से देशद्रोह की बात सुनते ही क्षत्रानी हीरादे का खून खौल उठा। एक तरफ उसका सुहाग था, और दूसरी तरफ उसकी मातृभूमि की आन-बान-शान। हीरादे ने एक पल भी नहीं गंवाया। उसने अपनी तलवार खींची और एक ही झटके में अपने गद्दार पति का सिर धड़ से अलग कर दिया! उसने साबित कर दिया कि देशद्रोह की सजा सिर्फ और सिर्फ मौत होती है।”

जालोर की वीरांगना हीरादे को नमन

“हालांकि तब तक बहुत देर हो चुकी थी और जालोर के किले में साका और जौहर हुआ, लेकिन इतिहास ने हीरादे के इस महान बलिदान को हमेशा के लिए अमर कर दिया। नमन है राजस्थान की ऐसी वीरांगनाओं को!”

जालोर की वीरांगना हीरादे: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

जालोर की हीरादे कौन थीं?

हीरादे जालोर के चौहान शासक राव कान्हड़देव के सेनापति बीका दहिया की पत्नी थीं। वे अपनी अद्वितीय देशभक्ति और साहस के लिए जानी जाती हैं, जिन्होंने देशद्रोह करने पर अपने ही पति का वध कर दिया था।

हीरादे ने अपने पति बीका दहिया को क्यों मार दिया था?

: साल 1311 ईस्वी में जालोर के युद्ध के दौरान, बीका दहिया ने पैसों और राजपाट के लालच में आकर अलाउद्दीन खिलजी को जालोर किले की गुप्त और कच्ची दीवार का भेद बता दिया था। जब हीरादे को इस देशद्रोह (गद्दारी) का पता चला, तो उन्होंने राष्ट्र रक्षा के लिए तलवार उठाकर अपने पति का सिर धड़ से अलग कर दिया।

हीरादे की इस साहसी घटना का उल्लेख किस ऐतिहासिक ग्रंथ में मिलता है?

इस ऐतिहासिक घटना का सबसे प्रामाणिक और विस्तृत उल्लेख कवि पद्मनाभ द्वारा रचित प्रसिद्ध ऐतिहासिक ग्रंथ ‘कान्हड़दे प्रबंध’ में मिलता है।

हीरादे के पति को मारने के बाद जालोर के किले का क्या हुआ?

पति को मारने के बाद हीरादे तुरंत राजा कान्हड़देव को सचेत करने दौड़ीं, लेकिन तब तक खिलजी की सेना गुप्त रास्ते से किले में घुस चुकी थी। इसके बाद इतिहास का प्रसिद्ध जालोर का साका (1311 ई.) हुआ, जिसमें कान्हड़देव वीरगति को प्राप्त हुए और राजपूत महिलाओं ने जौहर किया।

राई के भाव रात ही बीत गए कहानी( राई के भाव रात ही बीत गए कहावत)

साल 1311 ईस्वी में जालोर का किला चारों तरफ से अलाउद्दीन खिलजी की विशाल सेना से घिरा हुआ था। खिलजी के सेनापति कई महीनों की घेराबंदी के बाद भी जालोर के इस अभेद्य दुर्ग में सेंध लगाने में नाकाम रहे थे। जालोर के शासक राव कान्हड़देव चौहान और उनके वीर सैनिकों ने तुर्क सेना के छक्के छुड़ा दिए थे। निराश होकर खिलजी की सेना वापस दिल्ली लौटने का मन बना रही थी, लेकिन तभी इतिहास का सबसे शर्मनाक मोड़ आया।

बीका दहिया का लालच और गुप्त दीवार का राज

कान्हड़देव चौहान की सेना का एक गद्दार सेनापति, बीका दहिया, सोने के सिक्कों और जालोर के राजपाट के लालच में आकर आधी रात को चुपके से अलाउद्दीन खिलजी के खेमे में जा पहुँचा। उसने खिलजी के सामने आत्मसमर्पण करते हुए किले का एक ऐसा गुप्त राज खोला जो सिर्फ कुछ ही वफादारों को पता था।

बीका दहिया ने बताया कि जालोर किले की एक दीवार का एक हिस्सा मिट्टी और गारे से बना हुआ (कच्चा) है, जिसे बाहर से पहचान पाना असंभव है। उसने खिलजी को उस कच्चे हिस्से को ढूंढने की एक अनोखी और अचूक तरकीब बताई। उसने कहा:

“जालोर दुर्ग की जो दीवार कच्ची है, यदि उसके पास राई (सरसों) बो दी जाए, तो राई का बीज जमीन की नमी को सोखकर रात ही रात में अंकुरित हो जाएगा। जहाँ सुबह तक राई के पौधे उग आएं, समझ लेना वही दीवार का सबसे कमजोर और कच्चा हिस्सा है। वहाँ तोप या हाथियों से वार करके किले के भीतर आसानी से घुसा जा सकता है।”

रात ही रात में राई की कौतुक खरीद

खिलजी ने बिना एक पल गंवाए अपने सैनिकों को हुक्म दिया कि जालोर और आसपास के सभी गाँवों से जितनी भी राई मिल सके, उसे तुरंत खरीद लिया जाए। सुल्तान के आदेश पर सैनिकों ने रात के अंधेरे में ही स्थानीय व्यापारियों और किसानों के घरों के दरवाजे खटखटाए।

चूंकि खिलजी को वह काम सुबह होने से पहले अंजाम देना था, इसलिए उसके सैनिकों ने राई को सामान्य भाव से दस गुना, यहाँ तक कि सौ गुना सोने के दामों में खरीदना शुरू कर दिया। जालोर के इतिहास में यह अपनी तरह की पहली और सबसे बड़ी आपातकालीन व्यापारिक घटना थी। रात ही रात में पूरे क्षेत्र की राई खिलजी के शिविर में पहुँच गई और दीवार के पास बो दी गई। बीका दहिया की बात सच साबित हुई; नमी सोखने के कारण वह कच्ची दीवार ढह गई।

सुबह का सच और कहावत का जन्म

अगले दिन सुबह जब जालोर के अन्य किसानों और छोटे व्यापारियों को पता चला कि रात में राई सोने के भाव बिकी है, तो वे अपनी बची-कुची राई के बोरे लेकर भारी मुनाफे की उम्मीद में खिलजी के शिविर की ओर दौड़ पड़े।

लेकिन तब तक खिलजी का काम पूरा हो चुका था, किले की दीवार टूट चुकी थी और युद्ध का अंतिम चरण शुरू हो चुका था। जब किसानों ने अपनी राई बेचने की पेशकश की, तो खिलजी के सेनापतियों ने उन्हें दुत्कारते हुए कहा:

“अब तुम्हारी राई की कोई कीमत नहीं है। जो काम होना था, वह हो चुका। राई के भाव तो रात ही बीत गए!”

तभी से मारवाड़ और पूरे राजस्थान में यह लोकोक्ति या कहावत हमेशा के लिए अमर हो गई। आज भी जब कोई व्यक्ति सही समय निकल जाने के बाद किसी काम को करने की कोशिश करता है या कोई सुनहरा अवसर हमेशा के लिए गंवा देता है, तो लोग इसी मुहावरे का इस्तेमाल करते हैं—’राई के भाव रात ही बीत गए’।

बीका दहिया का इतिहास

जालोर के इतिहास में बीका दहिया को एक वीर सैनिक नहीं, बल्कि राजपूताना की आन-बान-शान को मिट्टी में मिलाने वाले एक कायर और लालची गद्दार के रूप में याद किया जाता है। वह जालोर के पराक्रमी चौहान शासक राव कान्हड़देव की सेना में एक उच्च पदस्थ सेनापति था। साल 1311 ईस्वी में जब दिल्ली का सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी जालोर दुर्ग को जीतने में नाकाम होकर वापस लौटने की तैयारी कर रहा था, तब बीका दहिया ने पैसों, सोने की अशर्फियों और जालोर के राजपाट के लालच में आकर अपनी ही मातृभूमि की पीठ में छुरा घोंप दिया।

उसने आधी रात को खिलजी के शिविर में जाकर किले की एक गुप्त और कच्ची दीवार का राज उजागर कर दिया। उसने खिलजी को राई बोकर उस कमजोर दीवार को ढूंढने की तरकीब बताई, जिसके कारण किले की दीवार ढह गई। बीका दहिया की इस गद्दारी से मारवाड़ में प्रसिद्ध कहावत “राई के भाव रात ही बीत गए” का जन्म हुआ। हालांकि, उसका यह देशद्रोह उसकी देशभक्त पत्नी क्षत्रानी हीरादे बर्दाश्त नहीं कर पाई। जब वह सोने की पोटली लेकर घर लौटा, तो हीरादे ने बिना देर किए तलवार से उसका सिर धड़ से अलग कर उसका अंत कर दिया।

कान्हड़दे प्रबंध (जालौर का इतिहास)

कान्हड़दे प्रबंध’ मध्यकालीन भारतीय इतिहास का एक ऐसा अनमोल और गौरवशाली साहित्यिक रत्न है, जिसकी रचना प्रसिद्ध कवि पद्मनाभ ने की थी। पुरानी राजस्थानी, गुजराती और पश्चिमी अपभ्रंश भाषा के मेल से लिखे गए इस महाकाव्य का मुख्य कथानक जालौर के महान चौहान शासक राव कान्हड़देव सोनगरा और उनके परम प्रतापी पुत्र वीरमदेव के अद्वितीय शौर्य और राष्ट्रभक्ति के इर्द-गिर्द घूमता है। इस अमर ग्रंथ में सन् 1311 ईस्वी में दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी द्वारा जालौर दुर्ग पर किए गए खूनी आक्रमण, वहाँ के वीरों के बलिदान और राजपूत वीरांगनाओं द्वारा किए गए पावन जौहर का रोंगटे खड़े कर देने वाला सजीव चित्रण मिलता है।

इस महाकाव्य की सबसे बड़ी विशेषता इसके वे अनोखे प्रसंग हैं जो इतिहास में कहीं और देखने को नहीं मिलते; जैसे सुल्तान खिलजी की बेटी शहजादी फिरोजा का वीरमदेव से अटूट व एकतरफा प्रेम, लालची सेनापति बीका दहिया का घिनौना राष्ट्रद्रोह, और अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने ही पति का धड़ से सिर अलग करने वाली देशभक्त वीरांगना हीरादे का अद्वितीय साहस। यही कारण है कि कान्हड़दे प्रबंध को आज भी मध्यकाल की सबसे महान और प्रेरक देशभक्ति गाथाओं में बेहद सम्मान के साथ गिना जाता है।

जालोर किले का इतिहास

राजस्थान का जालौर किला (सुवर्णगिरि) एक प्राचीन और अभेद्य दुर्ग है, जिसका निर्माण आठवीं शताब्दी में प्रतिहार राजा नागभट्ट प्रथम ने करवाया था. बाद में यह परमारों और फिर सोनगरा चौहानों के अधीन आया, जिनमें राव कान्हड़देव सबसे प्रतापी शासक हुए.

इस किले का सबसे बड़ा ऐतिहासिक मोड़ सन् 1311 ईस्वी में आया, जब दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने इस पर आक्रमण किया. महीनों की घेराबंदी के बाद भी जब खिलजी सफल नहीं हुआ, तो कान्हड़देव के सेनापति बीका दहिया ने लालच में आकर किले की एक गुप्त और कच्ची दीवार का राज खोल दिया. इसी घटना से मारवाड़ में “राई के भाव रात ही बीत गए” की प्रसिद्ध कहावत बनी.

हालांकि, बीका की देशभक्त पत्नी हीरादे ने राष्ट्रद्रोह के अपराध में अपने पति का वध कर दिया. अंततः, तुर्क सेना गुप्त रास्ते से किले में घुस गई, जिससे कान्हड़देव और वीरमदेव वीरगति को प्राप्त हुए और राजपूत महिलाओं ने जौهر किया. इसके बाद खिलजी ने इसका नाम बदलकर ‘जलालाबाद’ कर दिया था.

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