कर्नल जेम्स टॉड :1 अंग्रेज जो बन गया राजस्थान के इतिहास का जनक!

कर्नल जेम्स टॉड (Colonel James Tod) कौन थे? जानें उनके जीवन, ईस्ट इंडिया कंपनी के सफर और उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘Annals and Antiquities of Rajasthan’ से जुड़े सभी महत्वपूर्ण फैक्ट्स और समस्त जानकारी

फैक्ट फाइल: कर्नल जेम्स टॉड (Fact File: Colonel James Tod)

  • पूरा नाम (Full Name) कर्नल जेम्स टॉड (Colonel James Tod)
  • जन्म तिथि (Date of Birth) 20 मार्च, 1782 ई. (20 March 1782)
  • जन्म स्थान (Place of Birth) इस्लिंगटन, इंग्लैंड (Islington, England)
  • राष्ट्रीयता (Nationality) ब्रिटिश (British)
  • पेशा/पहचान (Profession) ब्रिटिश सैनिक अधिकारी और इतिहासकार (Military Officer & Historian)
  • लोकप्रिय नाम (Popular Name) घोड़े वाले बाबा (राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में भ्रमण के कारण)
  • मुख्य पद (Key Position) पश्चिमी राजपूत राज्यों के पॉलिटिकल एजेंट (Political Agent)
  • सेवा काल (Service Period) सन् 1817 से 1822 ई. (पॉलिटिकल एजेंट के रूप में)
  • मृत्यु तिथि (Date of Death) 17 नवम्बर, 1835 ई. (17 November 1835)
  • इतिहास का संकलन: उन्होंने राजस्थान के विभिन्न राज्यों में घूमकर प्राचीन शिलालेख, वंशावलियां और ऐतिहासिक सामग्रियां एकत्रित कीं।
  • प्रसिद्ध उपमाएँ: उन्होंने हल्दीघाटी के युद्ध को ‘मेवाड़ की थर्मोपोली’ और दिवेर के युद्ध को ‘मेवाड़ का मैराथन’ कहा था।
  • लेखन की कमियाँ: उनके विवरणों को पूरी तरह वैज्ञानिक पद्धति (Scientific Method) से लिखा हुआ नहीं माना जाता और राजपूत जाति से अत्यधिक लगाव के कारण उनके कुछ विवरण अधूरे भी हैं।

कर्नल जेम्स टॉड का प्रारंभिक जीवन और सैनिक करियर ( Colonel James Tod Early Life and Military Career)

कर्नल जेम्स टॉड का जन्म 20 मार्च, 1782 ई. को इंग्लैंड (England) के इस्लिंगटन (Islington) नामक स्थान पर हुआ था।

ईस्ट इंडिया कम्पनी में प्रवेश: सन् 1798 ई. में उन्होंने एक सैनिक रंगरूट (Military Recruit) के रूप में ईस्ट इंडिया कम्पनी (East India Company) की सेवा में प्रवेश किया।

शुरुआती कार्य: ई. सन् 1801 में उन्हें दिल्ली के पास पुरानी नहर की पैमाइश (Surveying) करने का काम सौंपा गया।

दौलतराव सिंधिया के दरबार में: 1805 ई. में वे दौलतराव सिंधिया के दरबार में नियुक्त अंग्रेज सैनिक टुकड़ी में शामिल किए गए

कर्नल जेम्स टॉड पॉलिटिकल एजेंट के रूप में सेवा (Service as a Political Agent

सन् 1817 से 1822 ई. के मध्य कर्नल टॉड को पश्चिमी राजपूत राज्यों (Western Rajput States) में ईस्ट इंडिया कम्पनी के पॉलिटिकल एजेंट (Political Agent) के पद पर कार्य करने का अवसर मिला।

इस अवधि (Period) के दौरान उन्होंने राजपूत राज्यों के इतिहास से संबंधित महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सामग्री (Historical Material) को जुटाने का पूरा प्रयास किया। राजपूत जाति और शासकों (Rulers) के प्रति उनका गहरा लगाव देखकर कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों को उनकी कंपनी के प्रति स्वामीभक्ति (Loyalty) पर संदेह (Doubt) होने लगा था। आखिरकार, खराब स्वास्थ्य (Poor Health) के आधार पर 1822 ई. में उन्हें अपने पद से त्यागपत्र (Resignation) देना पड़ा।

कर्नल टॉड की अमर कृतियाँ (Immortal Works of Colonel Tod)

कम्पनी की सेवा से अवकाश (Retirement) प्राप्त करने के बाद वे इंग्लैंड चले गए और वहाँ उन्होंने अपने द्वारा एकत्रित की गई ऐतिहासिक सामग्री को साहित्यिक कृति (Literary Work) के रूप में प्रकाशित करने का निश्चय किया।

एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान’ (Annals and Antiquities of Rajasthan)यह कर्नल टॉड का सबसे सुप्रसिद्ध ग्रन्थ (Famous Book) है, जिसे राजस्थान और राजपूतों के बारे में एक प्रकार का विश्वकोश (Encyclopedia) माना जाता है। इसमें न केवल राजस्थान बल्कि संपूर्ण भारतवर्ष के प्राचीन इतिहास की ऐसी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सामग्री उपलब्ध होती है, जो किसी अन्य ग्रन्थ में नहीं मिलती। इसके दो भाग प्रकाशित हुए:

पहला भाग (1829 ई.): इस भाग में राजपूताने की भौगोलिक स्थिति (Geographical Position), राजपूतों की वंशावली (Genealogy), तत्कालीन सामन्ती व्यवस्था (Feudal System) और वीर भूमि मेवाड़ का इतिहास (History of Mewar) वर्णित है।

दूसरा भाग (1832 ई.): इस खण्ड में मारवाड़, बीकानेर, जैसलमेर, आमेर और हाड़ौती के राज्यों का इतिहास दिया गया है।

‘पश्चिमी भारत की यात्रा’ (Travels in Western India)

कर्नल टॉड की मृत्यु (1835 ई.) के पश्चात् सन् 1839 ई. में उनका दूसरा प्रमुख ग्रन्थ ‘पश्चिमी भारत की यात्रा’ प्रकाशित हुआ।

इस ग्रन्थ में इन क्षेत्रों का भ्रमण करते समय उनके व्यक्तिगत अनुभवों (Personal Experiences) का विवरण है।

इसमें उन्होंने राजपूत समाज में प्रचलित परम्पराओं (Traditions), अन्धविश्वासों (Superstitions), आदिवासियों के जीवन, मन्दिरों, मूर्तियों, पंडे-पुजारियों और घुमक्कड़ जातियों के बारे में विस्तार से लिखा है।इसके साथ ही इसमें अनहिलवाड़ा, अहमदाबाद तथा बड़ौदा के इतिहास के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है।

कर्नल टॉड का प्रसिद्ध कथन: राजस्थान के बारे में उन्होंने लिखा था— ‘राजस्थान में कोई छोटा-सा राज्य भी ऐसा नहीं है जिसमें थर्मोपोली (Thermopylae) जैसी रणभूमि न हो और शायद ही कोई ऐसा नगर मिले जहाँ लियोनिआस (Leonidas) जैसा वीर पुरुष पैदा न हुआ हो।’ उनके इस कथन ने यूरोपवासियों (Europeans) को आश्चर्यचकित कर दिया था।

ग्रन्थों की कमियाँ और कर्नल टॉड का अवसान (Shortcomings and Demise)

इतने महत्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रन्थ होने के बावजूद कर्नल टॉड के लेखन में कुछ कमियाँ (Defects/Shortcomings) भी थीं:

राजपूत जाति के बारे में उनके द्वारा प्रस्तुत विवरण अधूरा (Incomplete) है।

यह पूरी तरह से वैज्ञानिक पद्धति (Scientific Method) से लिखा गया ऐतिहासिक ग्रन्थ नहीं है।

इन कमियों के बावजूद, एक ऐतिहासिक सन्दर्भ ग्रन्थ (Historical Reference Book) के रूप में इसके महत्व (Importance) को नकारा नहीं जा सकता। इतिहास के इस महान खोजी का 17 नवम्बर, 1835 को निधन (Death) हो गया। वे आज भी इतिहास प्रेमियों के दिलों में ‘राजस्थान के इतिहास के पितामह’ के रूप में जीवित हैं।

“कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार राजपूतों की उत्पत्ति”

कर्नल जेम्स टॉड (Colonel James Tod) के अनुसार, राजपूत भारत के मूल निवासी (Native) नहीं, बल्कि विदेशी जातियों की संतान थे। उनके ‘विदेशी उत्पत्ति के सिद्धांत’ (Theory of Foreign Origin) का मुख्य आधार राजपूतों और मध्य एशिया (Central Asia) से आई प्राचीन विदेशी जातियों—शक (Shakas) और सीथियन (Scythians)—के बीच की ऐतिहासिक समानताएं हैं।

टॉड ने अपने सिद्धांत को प्रमाणित करने के लिए दोनों संस्कृतियों के सामाजिक और धार्मिक रीति-रिवाजों (Customs) की तुलना की। उन्होंने पाया कि दोनों में कई गहरी समानताएं थीं, जैसे:सूर्य की पूजा (Sun Worship) और सती प्रथा (Sati Pratha)।अश्वमेध यज्ञ, घोड़ों की पूजा (Horse Worship) और अस्त्र-शस्त्रों का सम्मान (Worship of Weapons)।मदिरापान (Consumption of Liquor) की परंपरा।

कर्नल टॉड का दृढ़ तर्क था कि चूंकि राजपूतों के ये तौर-तरीके और योद्धा लक्षण प्राचीन सीथियन जाति से हूबहू मेल खाते थे, इसलिए वे उन्हीं विदेशी आक्रमणकारियों के वंशज हैं। समय के साथ ये विदेशी जातियां भारतीय समाज में पूरी तरह घुल-मिल गईं और यहाँ के ‘क्षत्रिय’ (Kshatriyas) कहलाए।

कर्नल जेम्स टॉड के गुरु (Guru) कौन थे, जिन्होंने इतिहास लेखन में उनकी मदद की?

कर्नल जेम्स टॉड के गुरु का नाम ‘जैन यति ज्ञानचन्द्र’ था। वे मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) के रहने वाले थे। ज्ञानचन्द्र जी ने कर्नल टॉड को राजस्थान के प्राचीन ग्रंथों, जैन साहित्यों और स्थानीय शिलालेखों को पढ़ने और समझने में अमूल्य सहायता प्रदान की थी, जिसके लिए टॉड ने अपनी पुस्तक में उनके प्रति गहरा आभार भी व्यक्त किया है।

कर्नल जेम्स टॉड का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

ऐतिहासिक तथ्यों (Facts) के अनुसार, कर्नल जेम्स टॉड का जन्म 20 मार्च, 1782 ई. को इंगलैंड के इस्लिंगटन (Islington, England) नामक स्थान पर हुआ था। वे सन् 1798 ई. में एक सैनिक के रूप में भारत आए थे।

कर्नल जेम्स टॉड की सबसे प्रसिद्ध पुस्तक कौन सी है और वह कब प्रकाशित हुई?

कर्नल जेम्स टॉड की सबसे सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान’ (Annals and Antiquities of Rajasthan) है। इस महान ऐतिहासिक ग्रन्थ का पहला भाग सन् 1829 ई. में प्रकाशित हुआ था, जिसमें राजपूताने के भूगोल, सामंती व्यवस्था और मेवाड़ के इतिहास का विस्तृत वर्णन है। इसका दूसरा भाग सन् 1832 ई. में सामने आया था।

कर्नल जेम्स टॉड को “घोड़े वाला बाबा” (Ghode Wala Baba) क्यों कहा जाता है?

कर्नल जेम्स टॉड जब राजस्थान के पॉलिटिकल एजेंट थे, तब वे यहाँ के इतिहास, परंपराओं और संस्कृति को समझने के लिए गांवों का दौरा करते थे। वे हमेशा एक घोड़े पर सवार होकर दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में जाते थे और स्थानीय लोगों से ऐतिहासिक जानकारियां, लोककथाएं और प्राचीन दस्तावेज इकट्ठा करते थे। गांवों के लोग उन्हें अक्सर घोड़े पर घूमते हुए देखते थे, इसी कारण उनका नाम स्थानीय स्तर पर बड़े आदर के साथ “घोड़े वाला बाबा” पड़ गया।

कर्नल जेम्स टॉड की सबसे प्रसिद्ध पुस्तक कौन सी है और यह कब प्रकाशित हुई थी?

: कर्नल जेम्स टॉड की सबसे प्रसिद्ध और कालजयी कृति ‘एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान’ (Annals and Antiquities of Rajasthan) है। इस महान ऐतिहासिक ग्रंथ का प्रथम भाग सन् 1829 ई. में प्रकाशित हुआ था। इसका दूसरा भाग इसके कुछ समय बाद सन् 1832 ई. में सामने आया था।

‘Annals and Antiquities of Rajasthan’ को इतिहास में क्या दर्जा प्राप्त है?

: इस पुस्तक को राजस्थान के इतिहास का ‘विश्वकोश’ (Encyclopedia) माना जाता है। इसमें राजपूताने की भौगोलिक स्थिति, राजपूतों की वंशावली, तत्कालीन सामंती व्यवस्था (Feudal System) और विशेष रूप से मेवाड़, मारवाड़, बीकानेर, जैसलमेर और हाड़ौती राज्यों के इतिहास का ऐसा प्रामाणिक व विस्तृत विवरण है जो किसी अन्य ग्रंथ में नहीं मिलता।

कर्नल टॉड की मृत्यु के बाद उनकी कौन सी महत्वपूर्ण किताब प्रकाशित हुई थी?

: कर्नल जेम्स टॉड की मृत्यु (1835 ई.) के पश्चात् सन् 1839 ई. में उनकी दूसरी प्रसिद्ध पुस्तक ‘पश्चिमी भारत की यात्रा’ (Travels in Western India) प्रकाशित हुई थी। इस ग्रंथ में उन्होंने राजपूत समाज की परंपराओं, अंधविश्वासों, आदिवासियों के जीवन और अपनी यात्रा के व्यक्तिगत अनुभवों को दर्ज किया है।

कर्नल टॉड ने हल्दीघाटी के युद्ध को क्या उपमा दी थी?

कर्नल जेम्स टॉड ने हल्दीघाटी के ऐतिहासिक युद्ध की तुलना यूनान (Greece) के प्रसिद्ध युद्ध से करते हुए इसे ‘मेवाड़ की थर्मोपोली’ (Thermopylae of Mewar) कहा था। इसके साथ ही उन्होंने सन् 1582 ई. में हुए दिवेर के युद्ध को ‘मेवाड़ का मैराथन’ (Marathon of Mewar) की संज्ञा दी थी।

कर्नल जेम्स टॉड की राजपूतों के प्रति सहानुभूति का उनके करियर पर क्या असर पड़ा?

कर्नल टॉड राजपूत शासकों और यहाँ की संस्कृति से बेहद प्रभावित थे। उनका यह झुकाव ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों को पसंद नहीं आया और उन्हें टॉड की कंपनी के प्रति वफादारी (Loyalty) पर संदेह होने लगा। इसी राजनीतिक दबाव और खराब स्वास्थ्य के कारण उन्हें 1822 ई. में अपने पद से इस्तीफा (Resignation) देना पड़ा।

कर्नल जेम्स टॉड ने अपनी कालजयी कृति ‘Annals and Antiquities of Rajasthan’ (1829 ई.) के माध्यम से राजस्थान के बिखरे इतिहास को पहली बार वैज्ञानिक और साहित्यिक रूप देकर वैश्विक पटल पर रखा। उन्होंने राजपूतों को शक और सीथियन जैसी विदेशी जातियों की संतान बताया。भले ही आधुनिक इतिहासकार उनके कुछ तथ्यों और तारीखों में त्रुटियाँ मानते हों, लेकिन स्थानीय संस्कृति, प्राचीन शिलालेखों और हल्दीघाटी व दिवेर जैसे महान युद्धों को अमर बनाने में उनके ऐतिहासिक संदर्भ ग्रंथों का महत्व आज भी बेजोड़ और प्रामाणिक है।

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