सिर पर जलती आग और सुरों का जादू! जानें राजस्थान के प्रसिद्ध ‘चरी लोक गीत’ (Chari Folk Song) का हैरान करने वाला इतिहास

सिर पर जलती चरी को संतुलित कर गाए जाने वाले पारंपरिक राजस्थानी चरी लोक गीत (Rajasthani Chari Geet) की पूरी कहानी। जानिए चरी नृत्य और गीत (Chari Dance and Song) का इतिहास, महत्व और चरी गीत के बोल (Chari Song Lyrics) इंटरनेट पर क्यों मचा रहे हैं धूम!

चरी लोक गीत और चरी नृत्य : फैक्ट फाइल

  • गीत का नाम: चरी लोक गीत (Chari Folk Song)
  • मुख्य क्षेत्र: किशनगढ़ और अजमेर (राजस्थान)
  • संबंधित समुदाय: मुख्य रूप से गुर्जर (Gurjar) और सैनी समुदाय।
  • मुख्य आकर्षण: चरी नृत्य और गीत (Chari Dance and Song) का अद्भुत संगम, जहाँ सिर पर जलती हुई चरी (कलश) रखकर नृत्य किया जाता है।
  • प्रसिद्ध नृत्यांगना: फलकू बाई (Phalku Bai) – जिन्होंने इस कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
  • मुख्य वाद्य यंत्र (Main Musical Instruments): इस पारंपरिक गीत के गायन और प्रस्तुति के दौरान मुख्य रूप से ढोल (Dhol), थाली (Thali), और बांकिया (Bankia) जैसे राजस्थानी वाद्यों का प्रयोग किया जाता है।
  • वेशभूषा और परिधान (Traditional Attire): नृत्यांगनाएं इस दौरान चटक रंगों वाले पारंपरिक घाघरा-चोली और ओढ़नी पहनती हैं, जो भारी गोटा-पत्ती और शीशे (Mirror work) के काम से सजे होते हैं।
  • मुख्य आभूषण (Traditional Jewelry): प्रस्तुति के समय महिलाएं राजस्थान के पारंपरिक गहने जैसे बोरला (Borla), हंसली (Hansli), टिमणिया (Timaniya), और मोगरी (Mogri) धारण करती हैं।
  • गीत की मुख्य भाषा/बोली (Language/Dialect): यह लोक गीत मुख्य रूप से मारवाड़ी (Marwari) और ढूंढाड़ी (Dhundhari) भाषा के मिश्रण में गाया जाता है, जो सुनने में बेहद मधुर लगता है।
  • प्रतीकात्मक महत्व (Symbolic Meaning): चरी के भीतर जलती हुई अग्नि की लपटें मरुभूमि की कड़ी धूप और तपन में भी राजस्थानी जीवन के उत्साह, उमंग और सकारात्मकता को दर्शाती हैं।
  • प्रस्तुति का समय (Performance Time): हालांकि यह मांगलिक अवसरों पर गाया जाता है, लेकिन इसकी सबसे सुंदर और भव्य प्रस्तुति रात के समय (Night performance) होती है, जहाँ जलती हुई चरी का दृश्य अद्भुत दिखाई देता है।

क्या है चरी लोक गीत का इतिहास? (History of Chari Folk Song)

राजस्थान के मरुस्थलीय और ग्रामीण इलाकों में पानी की हमेशा से किल्लत रही है। ऐसे में यहाँ की महिलाओं को पानी लाने के लिए मिलों दूर जाना पड़ता था। जब महिलाएं पानी भरकर लौटती थीं, तो वे खुशी और उत्साह में झूम उठती थीं। इसी खुशी को प्रकट करने के लिए राजस्थानी चरी गीत (Rajasthani Chari Geet) गाए जाते हैं। चरी का शाब्दिक अर्थ होता है – पीतल या मिट्टी का एक छोटा घड़ा (कलश)।

यह गीत केवल पानी लाने के संघर्ष को ही नहीं दिखाता, बल्कि यह घर में आने वाले मेहमानों के स्वागत, शादी-ब्याह और पुत्र रत्न की प्राप्ति जैसे मांगलिक अवसरों पर महिलाओं के उल्लास को भी प्रकट करता है।

चरी नृत्य और चरी लोक गीत का अनोखा तालमेल (Chari Dance and Song)

इस लोकगीत की असली खूबसूरती तब निखर कर आती है जब इसके साथ नृत्य किया जाता है। पारंपरिक चरी गीत (Traditional Chari song) की थाप पर महिलाएं अपने सिर पर पीतल की चरी (कलश) संतुलित करती हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस चरी के अंदर कपास के बीज (काकड़े) और तेल डालकर आग जलाई जाती है।

अंधेरी रात में जब महिलाएं सिर पर जलती हुई आग की लपटों के साथ बिना हाथ लगाए बेहद कठिन स्टेप्स करती हैं, तो देखने वाले दाँतों तले उंगली दबा लेते हैं। ढोल, थाली और बांकिया जैसे पारंपरिक वाद्यों की गूंज इस माहौल को और भी जादुई बना देती है।

डिजिटल दुनिया में चरी लोक गीत की धूम

आजकल इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में लोग राजस्थानी संस्कृति को बहुत पसंद कर रहे हैं। यूट्यूब और अन्य म्यूजिक प्लेटफॉर्म्स पर चरी गीत के बोल (Chari Song Lyrics) और इसके वीडियो खूब सर्च किए जाते हैं। पुरानी पीढ़ी से नई पीढ़ी तक सफर तय करते हुए इस गीत ने अपने पारंपरिक स्वरूप को आज भी बरकरार रखा है।

चरी नृत्य और गीत (Chari Dance and Song) के दौरान सिर पर जलती आग का क्या महत्व है?

चरी नृत्य और गीत की प्रस्तुति के दौरान सिर पर रखे पीतल के कलश (चरी) में कपास के बीज (काकड़े) और तेल डालकर आग जलाई जाती है। यह जलती हुई अग्नि केवल एक कलात्मक प्रदर्शन या स्टंट नहीं है, बल्कि इसके गहरे सांस्कृतिक मायने हैं। यह अग्नि मरुभूमि की भीषण गर्मी, तपन और जीवन की कठिन चुनौतियों का प्रतीक है। इसके बावजूद, महिलाएं बिना हाथ लगाए जिस संतुलन के साथ थिरकती हैं, वह यह दिखाता है कि राजस्थानी संस्कृति हर मुश्किल परिस्थिति पर विजय पाकर मुस्कुराना जानती है। रात के अंधेरे में यह जलती लौ अंधकार पर प्रकाश की जीत को भी दर्शाती है।

पारंपरिक चरी लोक गीत (Traditional Chari Song) मुख्य रूप से किन अवसरों पर और किस समुदाय द्वारा गाया जाता है?

यह पारंपरिक लोकगीत मुख्य रूप से राजस्थान के अजमेर और किशनगढ़ क्षेत्र में गुर्जर (Gurjar) और सैनी समुदाय की महिलाओं द्वारा गाया जाता है। हालांकि इसकी शुरुआत पानी लाने के आनंद से हुई थी, लेकिन समय के साथ यह राजस्थान के हर बड़े मांगलिक कार्यक्रम का हिस्सा बन गया। आज के समय में इसे विवाह समारोहों, लोक मेलों, बच्चे के जन्म (जच्चा उत्सव) और घर में किसी विशेष अतिथि के आगमन पर बड़े चाव से गाया और परफॉर्म किया जाता है। फलकू बाई जैसी महान लोक कलाकारों ने इस पारंपरिक गीत और कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान दी है।

चरी नृत्य की प्रसिद्ध नृत्यांगना फलकू बाई कौन थीं और उनका इस कला में क्या योगदान है?

फलकू बाई राजस्थान के अजमेर जिले में किशनगढ़ की रहने वाली एक बेहद प्रसिद्ध पारंपरिक लोक नृत्यांगना थीं। उनका जन्म गुर्जर समुदाय में हुआ था, जहाँ चरी लोक गीत और नृत्य को केवल महिलाओं के घरेलू उत्सवों या पानी लाने की खुशी तक ही सीमित रखा जाता था। फलकू बाई ने इस कला को रूढ़िवादिता और गाँव की चौपालों से बाहर निकालकर देश-विदेश के बड़े सांस्कृतिक मंचों तक पहुँचाया। उन्होंने चरी नृत्य और गीत (Chari Dance and Song) को एक विशिष्ट शास्त्रीय गरिमा और पहचान दिलाई। सिर पर कई जलते हुए कलशों को संतुलित करते हुए उनके अद्भुत और सधे हुए पद संचालन (Footwork) को देखकर बड़े-बड़े कला पारखी दंग रह जाते थे। उनके इसी अभूतपूर्व योगदान के कारण आज चरी कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजस्थान के गौरव के रूप में देखा जाता है।

फलकू बाई का चरी कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमकाने का सफर कैसा रहा?

फलकू बाई का कलात्मक सफर संघर्ष और लगन की एक अद्भुत मिसाल है। एक समय था जब ग्रामीण अंचलों में महिलाओं का मंच पर आकर परफॉर्म करना आसान नहीं था, लेकिन अपनी कला के प्रति उनके समर्पण ने सभी बाधाओं को तोड़ दिया। उन्होंने न केवल भारत के विभिन्न राज्यों में गणतंत्र दिवस परेड और राष्ट्रीय उत्सवों में राजस्थान का प्रतिनिधित्व किया, बल्कि वैश्विक मंचों (International Stages) पर भी इस पारंपरिक राजस्थानी चरी गीत की धुन पर जलती आग का हैरतअंगेज प्रदर्शन किया। उनके इस सफर ने फलकू बाई को चरी नृत्य का पर्याय बना दिया। आज जब भी कोई इंटरनेट पर ‘Traditional Chari Song’ या नृत्य सर्च करता है, तो फलकू बाई का नाम सबसे पहले आता है। उन्होंने आने वाली कई पीढ़ियों के लिए इस लोक कला को सहेजने और उसे एक बेहतरीन करियर विकल्प बनाने का मार्ग प्रशस्त किया।

गुर्जर समुदाय के पारंपरिक लोकगीतों (Traditional Gurjar Folk Songs) का सांस्कृतिक बैकग्राउंड क्या है और इनके मुख्य गाने कौन से हैं?

गुर्जर समुदाय के लोकगीत मुख्य रूप से प्रकृति, पशुपालन, भगवान देवनारायण की वीरता और उमंग से जुड़े होते हैं। यह समुदाय ऐतिहासिक रूप से गोपालक और वीर रहा है, इसलिए इनके गीतों में गोवर्धन पूजा, देव जी की फड़ और मरुधरा के लोक जीवन की गहरी झलक मिलती है। चरी गीत के अलावा इंटरनेट पर ‘बगड़ावत भारत’ (देवनारायण जी की महागाथा), ‘गुर्जर रसिया’ (होली और सावन के चंचल गीत), ‘राधा-कृष्ण के पद’ और ‘हीर-रांझा की तर्ज पर गाए जाने वाले लोकगीत’ सबसे ज्यादा तलाशे जाते हैं। ये गीत आज भी शादियों और गुर्जरों के पारंपरिक दंगलों (दंगल गायन) में बड़े उत्साह से गाए जाते हैं।

चरी नृत्य और गीत के बोल (Chari Song Lyrics) और उनका अर्थ

  • “छम्मक-छम्मक बाजे घुंघरा, जब चामलियो थिरके सा…सिर पर थारे चरी सोवे, बा में जोत जगे सा।””घड़लो पानी को भर लाई, म्हाने रस्ता में मिलग्या कान्हा सा…धीमे चालो री पणिहारी, थारी चरी झलके सा।””किशनगढ़ की सुघड़ नार, जब चरी उठावे सा…मेलां में धूम मचावे, सब थारो रूप निहारे सा।”

बोल का हिंदी अर्थ (Meaning of the Lyrics)

पहली पंक्तियाँ: जब नृत्यांगना (चामलियो) अपने पैरों को थिरकाती है, तो उसके पैरों के घुंघरू ‘छम्मक-छम्मक’ की सुरीली आवाज करते हैं। उसके सिर पर पानी की पीतल की चरी (कलश) बेहद सुंदर लग रही है और उस चरी के भीतर जलती हुई दीपक की लौ (जोत) पूरे माहौल को रोशन कर रही है।

दूसरी पंक्तियाँ: सखी कहती है कि मैं कुएं से पानी का घड़ा भरकर ला रही थी, तो मुझे रास्ते में नटखट कान्हा मिल गए। हे पणिहारी (पानी लाने वाली नारी)! जरा संभलकर और धीरे चलो, क्योंकि तेज चलने से तुम्हारी चरी का पानी छलक रहा है।

तीसरी पंक्तियाँ: किशनगढ़ की सुंदर और सलीकेदार महिलाएं जब अपने सिर पर इस गौरवमयी चरी को उठाती हैं, तो वे लोक मेलों और उत्सवों में अपनी कला से धूम मचा देती हैं। पूरा संसार उनके इस अद्भुत रूप और संतुलन को एकटक निहारता रहता है।

चरी नृत्य और चरी लोक गीत से जुड़े 10 जादुई और रोचक तथ्य (10 Interesting Facts)

सिर पर जलती आग का संतुलन (Balancing Flaming Pots): इस नृत्य की सबसे हैरान कर देने वाली बात यह है कि नृत्यांगनाएं अपने सिर पर पीतल या कांसे की चरी (मटका) रखती हैं, जिसमें काकड़े (कपास के बीज) तेल में डुबोकर जलाए जाते हैं। आग की लपटें उठने के बावजूद महिलाएं बिना हाथ लगाए अद्भुत संतुलन के साथ थिरकती हैं।

फलकू बाई ने दिलाया अंतरराष्ट्रीय सम्मान (Falku Bai’s Legacy): किशनगढ़ की फलकू बाई (Falku Bai) को इस नृत्य की जननी माना जाता है। उन्होंने न सिर्फ इस नृत्य को जीवित रखा, बल्कि इसे देश-विदेश के बड़े मंचों तक पहुंचाकर अंतरराष्ट्रीय पहचान (International Recognition) दिलाई।

केवल मांगलिक अवसरों पर प्रस्तुति (Performed on Auspicious Occasions): चरी मुख्य रूप से एक आनंद और उत्सव का लोक नृत्य (Celebration Dance) है। इसे परिवार में बेटे के जन्म होने पर, शादियों में या बड़े त्योहारों के स्वागत के दौरान ही गाया और नाचा जाता है।

पानी की कीमत और खुशी का प्रतीक (Symbol of Water & Joy): मरुभूमि राजस्थान में पानी की भारी किल्लत रही है। पुराने समय में जब महिलाएं मीलों दूर जाकर कुएं या बावड़ी से पानी भरकर लाती थीं, तो उस पानी को पाने की खुशी को व्यक्त करने के लिए ही इस लोक कला (Folk Art) का जन्म हुआ था।

कपड़ों पर भारी गोटा-पत्ती और आभूषण (Traditional Costumes & Jewelry): इस नृत्य के दौरान महिलाएं पारंपरिक भारी राजस्थानी वेशभूषा (जैसे घाघरा-चोली) और हंसली, तिमनिया, मोगरी तथा गजरे जैसे पारंपरिक गहने पहनती हैं, जो इसकी भव्यता को दोगुना कर देते हैं।

बांकिया वाद्य यंत्र का जादू (The Magic of Bankia Instrument): चरी गीत के दौरान बांकिया (Bankia) नामक एक खास पारंपरिक पीतल का वाद्य यंत्र बजाया जाता है। इसकी तेज और सुरीली आवाज सुनते ही दर्शकों के पैर अपने आप थिरकने लगते हैं।

पलक झपकते ही बदलती हैं चाल (Fast-Paced Footwork): चरी संभालते हुए नृत्यांगनाएं जमीन पर बैठकर, घुटनों के बल और चक्राकार घूमते हुए इतनी तेजी से अपनी चाल बदलती हैं कि देखने वाले दांतों तले उंगली दबा लेते हैं।

गुर्जर और सैनी समुदाय की अनमोल धरोहर (Heritage of Gujjar and Saini Community): यह मुख्य रूप से राजस्थान के गुर्जर और सैनी समाज की महिलाओं द्वारा संजोकर रखी गई एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर (Cultural Heritage) है।

किशनगढ़ शैली का प्रभाव (Influence of Kishangarh Style): इस नृत्य की भाव-भंगिमाओं में प्रसिद्ध किशनगढ़ की बनी-ठनी पेंटिंग (Bani Thani Art) की झलक साफ देखने को मिलती है, जो आंखों और हाथों के इशारों को बेहद आकर्षक बनाती है।

. बिना किसी सुरक्षा के लाइव स्टंट (Live Action Stunt): बिना किसी आधुनिक सेफ्टी गियर या सुरक्षा के, सिर पर असली आग लेकर डांस करना किसी हैरतअंगेज स्टंट से कम नहीं है। यह आज के समय में भी पूरी तरह लाइव और प्रामाणिक रूप से किया जाता है।

चरी नृत्य किस क्षेत्र/जिले का प्रसिद्ध है? (Chari Dance Which District/Region)

चरी नृत्य मुख्य रूप से राजस्थान के अजमेर (Ajmer) जिले का प्रसिद्ध है। अजमेर जिले के अंतर्गत आने वाला किशनगढ़ (Kishangarh) शहर इस नृत्य का मुख्य केंद्र (Main Hub) माना जाता है।यह नृत्य मूल रूप से इसी क्षेत्र के गांवों और कस्बों की चौपालों से शुरू हुआ था। मरुभूमि में जब महिलाएं दूर-दूर से पानी भरकर लाती थीं, तो घर लौटने पर पानी मिलने की खुशी में वे अपने सिर पर घड़े (चरी) को संतुलित करते हुए आनंद में थिरक उठती थीं, जिसने आगे चलकर एक भव्य लोक नृत्य का रूप ले लिया।

चरी नृत्य किस जाति या समुदाय का है? (Chari Dance Caste/Community)

यह पारंपरिक लोक नृत्य मुख्य रूप से राजस्थान के गुर्जर (Gujjar) और सैनी (Saini) समुदाय की महिलाओं द्वारा किया जाता है।प्राचीन समय से ही इस समुदाय की महिलाओं ने इस कला को अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाकर संजोया है। मांगलिक अवसरों पर समाज की महिलाएं एकत्रित होकर यह सामूहिक नृत्य करती हैं। हालांकि, आज के समय में इसकी लोकप्रियता और व्यावसायिक महत्व को देखते हुए राजस्थान के अन्य समुदायों के कलाकार भी इस विधा को बड़े चाव से सीख और प्रदर्शित कर रहे हैं।

प्रसिद्ध चरी नृत्यांगना कौन है? (Famous Chari Dancer Name)

चरी नृत्य को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने वाली और इसकी सबसे प्रसिद्ध नृत्यांगना फलकू बाई (Falku Bai) हैं।फलकू बाई किशनगढ़ क्षेत्र की रहने वाली थीं। उन्होंने उस दौर में इस नृत्य को अपनी साधना बनाया जब लोक कलाओं को बड़े मंच आसानी से नहीं मिलते थे। उन्होंने अपनी अद्भुत संतुलन कला और भाव-भंगिमाओं के दम पर चरी नृत्य को देश-विदेश के बड़े-बड़े सांस्कृतिक उत्सवों तक पहुँचाया। फलकू बाई के इस अद्वितीय योगदान के कारण ही उन्हें इस नृत्य की ‘नक्षत्र’ या ‘जननी’ के रूप में सम्मान से याद किया जाता है।

चरी नृत्य में कौन सा वाद्य यंत्र बजाया जाता है? (Chari Dance Musical Instruments)

बांकिया (Bankia): यह इस नृत्य का मुख्य और सबसे महत्वपूर्ण वाद्य यंत्र है। यह पीतल या कांसे से बना एक मुड़ा हुआ बिगुल जैसा यंत्र होता है, जिसे मुंह से फूंक मारकर बजाया जाता है। इसकी तेज और सुरीली तान सुनते ही नृत्यांगनाओं के पैर तेजी से थिरकने लगते हैं।

ढोलक (Dholak): नृत्य की बुनियादी ताल और थाप को बनाए रखने के लिए ढोलक का इस्तेमाल मुख्य रूप से किया जाता है।

नगाड़ा (Nagada) और थाली (Thali): संगीत की गूंज को और अधिक भव्य तथा पारंपरिक राजस्थानी रंग देने के लिए ढोलक के साथ नगाड़े और कांसे की थाली को डंडे से बजाया जाता है।

चरी नृत्य में आग कैसे जलाई जाती है? (How is Fire Lit in Chari Dance)

विशेष ईंधन का चयन (काकड़े): चरी (पीतल या कांसे का मटका) के अंदर साधारण लकड़ी या कागज नहीं जलाया जाता। इसके लिए कपास के बीजों (Cotton Seeds) का उपयोग किया जाता है, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘काकड़े’ कहा जाता है।

तेल का मिश्रण: इन कपास के बीजों (काकड़ों) को नृत्य शुरू होने से काफी देर पहले कड़वे तेल (सरसों के तेल या तिल के तेल) में अच्छी तरह भिगोकर रख दिया जाता है। कपास के बीज तेल को पूरी तरह सोख लेते हैं।

लंबे समय तक जलना: जब नृत्य प्रस्तुति शुरू होती है, तो चरी के अंदर इन तेल में डूबे काकड़ों को रखकर आग सुलगाई जाती है। तेल और कपास के संयोजन के कारण यह आग बहुत धीमी और लगातार जलती है, जिससे एक समान और ऊंची लपटें (Flaming Pots) निकलती हैं। यह आग पूरी प्रस्तुति के दौरान बिना बुझे लगातार जलती रहती है और इससे कोई हानिकारक धुआं भी नहीं निकलता जो नृत्यांगनाओं की आंखों में लगे।

चरी नृत्य की मुख्य विशेषताएं (Main Features of Chari Dance)

अद्भुत शारीरिक संतुलन (Extraordinary Balance): इस नृत्य की सबसे पहली विशेषता संतुलन कला है। नृत्यांगनाएं अपने सिर पर एक या एक से अधिक जलती हुई चरियों को रखकर बिना हाथ लगाए थिरकती हैं। इस दौरान वे जमीन पर बैठती हैं, घुटनों के बल चलती हैं और चक्राकार चक्कर (Fast Spins) काटती हैं, लेकिन चरी टस से मस नहीं होती।

केवल महिलाओं द्वारा प्रदर्शन (Female Group Dance): यह पारंपरिक रूप से केवल महिलाओं द्वारा किया जाने वाला एक सामूहिक लोक नृत्य है। हालांकि, पृष्ठभूमि में संगीत बजाने और गाने का काम पुरुष कलाकारों द्वारा किया जाता है।

किशनगढ़ और अजमेर का मुख्य केंद्र: यह नृत्य संपूर्ण राजस्थान में लोकप्रिय है, लेकिन इसका मुख्य गढ़ अजमेर जिले का किशनगढ़ (Kishangarh, Ajmer) क्षेत्र है। यह मूल रूप से गुर्जर और सैनी समुदाय की सांस्कृतिक धरोहर है।

मांगलिक अवसरों का प्रतीक: यह कोई शोक या उदासी का नृत्य नहीं है। चरी नृत्य को केवल खुशी और उमंग के अवसरों जैसे—शादी-विवाह, बच्चे के जन्म (पुत्र जन्मोत्सव), गणगौर या तीज जैसे बड़े त्योहारों और विशेष अतिथियों के स्वागत (Welcome Dance) के समय ही प्रदर्शित किया जाता है।

पारंपरिक वेशभूषा और भारी आभूषण: नृत्य के दौरान महिलाएं चटकीले रंगों के राजस्थानी घाघरा-चोली और ओढ़नी पहनती हैं। इसके साथ ही वे सोने-चांदी के पारंपरिक गहने जैसे हंसली, तिमनिया, बोरला, मोगरी और गजरे से पूरा श्रृंगार करती हैं। इसकी भाव-भंगिमाओं में प्रसिद्ध ‘बनी-ठनी’ चित्रकला की झलक मिलती है।

बांकिया वाद्य यंत्र की प्रधानता: इस नृत्य की गति और लय पूरी तरह से बांकिया (Bankia) नामक पीतल के वाद्य यंत्र पर निर्भर करती है। ढोलक, थाली और नगाड़े की थाप जैसे-जैसे तेज होती है, नृत्य की गति भी उतनी ही रोमांचक होती जाती है।

चरी लोक गीत के मुख्य बोल (Chari Lok Geet Lyrics in Hindi)

  • (स्थाई – मरुभूमि में पानी लाने की सुंदर अभिव्यक्ति)”घूमर घालूं री माई, चरी म्हारी चमके,सिर पर बलती दीवला री जोत, नथनी म्हारी दमके।हो जी हो राज, चरी म्हारी चमके…”
  • (अंतरा 1 – पानी की किल्लत और कुएं का दृश्य)”पनघट ऊपर भीड़ घनेरी, पानी कूं मैं आई,रेशम को म्हारो इंडोणी, ऊपर पीतल री चरी सजाई।घड़लो उठा कूं चाली गोरी, पायल बाजे छमके,हो जी हो राज, चरी म्हारी चमके…”
  • (अंतरा 2 – पारंपरिक आभूषण और श्रृंगार का वर्णन)”बांकिया बाजे, ढोलक बाजे, बाजे कांसे री थाली,घूंघट की ओट से चमके, म्हारो रूप नखराली।हंसली, तिमनिया और बोरलो, चमके धीमे झमके,हो जी हो राज, चरी म्हारी चमके…”
  • (अंतरा 3 – जलती आग और संतुलन की कला)”तेल में भीगा काकड़ा बलती, आग उगलती जाए,बिना हाथ लगाए गोरी, धीमे-धीमे बलखाए।किशनगढ़ री धरती ऊपर, लोक कला ये दमके,हो जी हो राज, चरी म्हारी चमके…”

चरी लोक गीत के शब्दों का सरल अर्थ (Meaning of the Chari Lok Geet )

चरी म्हारी चमके: नृत्यांगना कहती है कि जब मैं गोल-गोल घूमकर (घूमर) नृत्य करती हूँ, तो मेरे सिर पर रखी पीतल की चरी रोशनी में चमक उठती है।

बलती दीवला री जोत: चरी के अंदर जल रहे कपास के बीजों (काकड़ों) की लपटें किसी दिए की ज्योति की तरह चारों ओर प्रकाश फैला रही हैं, जिससे चेहरे की नथनी भी दमक रही है।

रेशम को म्हारो इंडोणी: सिर पर घड़े का संतुलन बनाने के लिए कपड़े या रेशम से बनी जो गद्दी रखी जाती है, उसे ‘इंडोणी’ (Indoni) कहते हैं। महिला कहती है कि मेरी इंडोणी रेशम की है और उस पर पीतल का चमचमाता घड़ा रखा है।

बांकिया बाजे: राजस्थान के पारंपरिक पीतल के वाद्य यंत्र ‘बांकिया’ की गूंज और ढोलक की थाप इस लोक कला के उत्साह को बढ़ा रही है।

चरी नृत्य के 5 मुख्य स्टेप्स (5 Main Dance Steps)

स्टेप 1: स्टेज एंट्री और इंडोणी बैलेंस (The Entry Step)

कैसे करें: सबसे पहले अपने सिर पर ‘इंडोणी’ (कपड़े की गोल गद्दी) को अच्छे से सेट करें और उस पर पीतल की चरी (मटका) रखें।मूवमेंट: दोनों हाथों को अपनी कमर पर रखें या फिर एक हाथ से चरी को हल्का सा सहारा दें (शुरुआत में)। धीरे-धीरे छोटे और सधे हुए कदमों से घूंघट काढ़कर स्टेज के बीच में एंट्री लें। इस दौरान चेहरे पर मुस्कान होनी चाहिए

स्टेप 2: घूमर और चक्राकार मूवमेंट (The Spin Step)

कैसे करें: जब चरी लोक गीत की मुख्य लय “घूमर घालूं री माई…” शुरू हो, तो आपको गोल-गोल घूमना है।

मूवमेंट: अपने दोनों हाथों को कंधों के समानांतर (Parallel) फैलाएं। अब अपने दाहिने पैर को आगे बढ़ाते हुए क्लॉकवाइज (घड़ी की दिशा में) पूरा चक्कर काटें। ध्यान रहे, चक्कर काटते समय आपकी गर्दन बिल्कुल सीधी होनी चाहिए ताकि सिर का मटका न हिले।

स्टेप 3: पनघट की लचक (The Water-Waving Step)

कैसे करें: यह स्टेप कुएं से पानी भरने और घड़े को संभालने के अभिनय को दर्शाता है।मूवमेंट: अपने बाएं हाथ को हवा में ऊपर उठाएं (जैसे मटके को छू रहे हों) और दाहिने हाथ को लहर की तरह आगे-पीछे करें। अपने घुटनों को संगीत की थाप (Beat) पर हल्का-हल्का नीचे-ऊपर (Bounce) करें। यह स्टेप देखने में बेहद शालीन और राजस्थानी संस्कृति के अनुकूल लगता है।

स्टेप 4: जमीन पर बैठकर बैठकी लगाना (The Sitting & Balancing Step)

कैसे करें: गाने के अंत में जब बांकिया (Bankia) और नगाड़े की गति बहुत तेज हो जाती है, तब यह स्टेप किया जाता है।मूवमेंट: अब आपको दोनों हाथों से ताली बजाते हुए या हाथों को हवा में लहराते हुए बहुत तेजी से छोटे-छोटे कदम लेने हैं और स्टेज पर एक बड़ा घेरा (Circle) बनाना है। अंत में दर्शकों की तरफ मुंह करके, घूंघट ठीक करते हुए एक हाथ से चरी को थामकर झुककर प्रणाम (नमस्कार) करें।

स्टेप 5: बांकिया फास्ट फॉरवर्ड (The Grand Finale Step)

कैसे करें: गाने के अंत में जब बांकिया (Bankia) और नगाड़े की गति बहुत तेज हो जाती है, तब यह स्टेप किया जाता है।मूवमेंट: अब आपको दोनों हाथों से ताली बजाते हुए या हाथों को हवा में लहराते हुए बहुत तेजी से छोटे-छोटे कदम लेने हैं और स्टेज पर एक बड़ा घेरा (Circle) बनाना है। अंत में दर्शकों की तरफ मुंह करके, घूंघट ठीक करते हुए एक हाथ से चरी को थामकर झुककर प्रणाम (नमस्कार) करें।

चरी लोक गीत सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि पानी की अहमियत और महिलाओं के कड़े परिश्रम को दर्शाने का एक जरिया है।

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