राव चंद्रसेन: मारवाड़ का भूला-बिसरा नायक (The Forgotten Hero of Marwar)

राजस्थान की वीर धरा पर जब भी स्वतंत्रता और स्वाभिमान (Self-respect) की बात आती है, तो मेवाड़ के महाराणा प्रताप का नाम सबसे पहले आता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मारवाड़ (Marwar) की धरती पर एक ऐसा योद्धा हुआ जिसने प्रताप से पहले अकबर की सत्ता को चुनौती दी थी? आज हम बात करेंगे राव चंद्रसेन राठौड़ (Rao Chandrasen Rathore) की, जिन्हें ‘मारवाड़ का प्रताप’ और ‘प्रताप का अग्रगामी’ कहा जाता है । हमारी टीम ने जब मारवाड़ के किलों और रेतीले धोरों की खाक छानी, तो हमें राव चंद्रसेन के संघर्ष की जो कहानियाँ मिलीं, वे रोंगटे खड़े कर देने वाली थीं।

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राव चंद्र सेन की जीवनी के फैक्ट Rao Chandrasen biography

  • नाम राव चंद्रसेन राठौड़ (Rao Chandrasen Rathore)
  • जन्म 16 जुलाई 1541
  • उपाधि राजस्थान का दूसरा प्रताप (Second Pratap of Rajasthan)
  • राज्याभिषेक 1562 ईस्वी (जोधपुर)
  • निधन 11 जनवरी 1581 (सारण की पहाड़ियां)

पिता: राव मालदेव (मारवाड़ के शक्तिशाली शासक)

  • मारवाड़ का भूला-बिसरा राजा: इतिहास के पन्नों में कम जगह मिलने के कारण।
  • द फॉरगॉटन हीरो (The Forgotten Hero): आधुनिक इतिहासकारों द्वारा दी गई संज्ञा।
  • लोहावट का युद्ध (Battle of Lohawat): अपने भाई उदय सिंह के खिलाफ जीत।
  • नागौर दरबार (1570): अकबर की अधीनता ठुकराकर स्वाभिमान का परिचय दिया।
  • सिवाणा का घेरा (Siege of Siwana): मुगलों के खिलाफ पहाड़ी क्षेत्रों में लंबा संघर्ष।
  • छापामार रणनीति (Guerrilla Tactics): जंगलों और पहाड़ों का उपयोग कर मुगलों को थकाया।
  • भाद्राजून (Bhadrajun): संघर्ष के दौरान पहला मुख्य केंद्र।
  • सिवाणा किला (Siwana Fort): संकटकालीन राजधानी और सुरक्षित शरणस्थली।
  • सारण की पहाड़ियों में इनकी अश्वारूढ़ प्रतिमा (Statue) और पांच रानियों के सती होने के स्मारक बने हुए हैं।
  • निधन:: सचियाप (पाली) 1581

5 जगहें जहाँ आप आज भी राव चंद्रसेन के इतिहास को महसूस कर सकते हैं (5 Places to Experience History)

मेहरानगढ़ किला, जोधपुर (Mehrangarh Fort, Jodhpur): यहाँ से राव चंद्रसेन ने अपने शासन की शुरुआत की। हालांकि बाद में मुगलों के कब्जे के कारण उन्हें यहाँ से निकलना पड़ा, लेकिन इस किले की दीवारों में आज भी उनकी वीरता की गूँज है।

भाद्राजून का किला (Bhadrajun Fort): मुगलों से बचने और अपनी सेना को संगठित करने के लिए उन्होंने जालौर के भाद्राजून को अपना केंद्र बनाया। यह एक बेहद दुर्गम और पहाड़ी इलाका है

सिवाणा का किला (Siwana Fort): बाड़मेर स्थित यह किला राव चंद्रसेन की शरणस्थली बना। यहाँ की पहाड़ी घेराबंदी (Mountain Siege) के किस्से आज भी स्थानीय लोग सुनाते हैं।

सारण की पहाड़ियाँ (Saran Hills, Pali): पाली जिले में स्थित इन पहाड़ियों में राव चंद्रसेन ने अपना अंतिम समय बिताया। यहीं पर उनकी अश्वारूढ़ प्रतिमा (Statue on Horse) बनी हुई है।

नागौर का किला (Nagaur Fort): 1570 के नागौर दरबार (Nagaur Durbar) का गवाह, जहाँ राव चंद्रसेन ने अकबर की अधीनता ठुकराकर इतिहास रच दिया था।

मेवाड़ के महाराणा प्रताप और मारवाड़ के राव चंद्रसेन :तुलना

राव चंद्र सेन और महाराणा प्रताप समानताएँ (Similarities)

मुगल विरोध: दोनों ने अकबर (Akbar) की अधीनता स्वीकार करने के बजाय संघर्ष चुना।छापामार युद्ध: दोनों ने पहाड़ों और जंगलों का उपयोग कर छापामार युद्ध प्रणाली (Guerrilla Warfare) अपनाई।

राजसी सुख का त्याग: दोनों ने महलों के बजाय घास की रोटियां और जंगलों का कष्टपूर्ण जीवन चुना।नागौर दरबार: 1570 के नागौर दरबार के बाद दोनों ने स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखने का कड़ा निर्णय लिया।

महाराणा प्रताप और चंद्र सेन में असमानता

समय काल: राव चंद्रसेन (1562-1581) प्रताप के अग्रगामी थे, यानी उन्होंने प्रताप (1572-1597) से पहले मुगलों से लोहा लिया।

प्रसिद्धि: प्रताप को मेवाड़ के गौरव के रूप में वैश्विक पहचान मिली, जबकि चंद्रसेन को ‘भूला-बिसरा राजा’ कहा गया।

संसाधन: प्रताप के पास भामाशाह जैसा सहयोग था, जबकि चंद्रसेन ने अकेले दम पर और अपने गहने बेचकर सेना का खर्च चलाया।

राव चंद्र सेन का प्रारंभिक जीवन और राज्याभिषेक (Early Life and Coronation)

राव चंद्रसेन का जन्म मारवाड़ के प्रतापी शासक राव मालदेव के घर हुआ था। मालदेव के कई पुत्र थे, लेकिन उन्होंने चंद्रसेन की योग्यता को देखते हुए उन्हें अपना उत्तराधिकारी (Successor) चुना। 1562 में जब वे गद्दी पर बैठे, तो उनके अपने भाइयों (राम और उदय सिंह) ने ही उनके खिलाफ विद्रोह कर दिया और मदद के लिए मुगल सम्राट अकबर (Akbar) के पास चले गए।

नागौर दरबार और राव चंद्र सेन का अकबर से संघर्ष (Nagaur Durbar and Rao Chandrasen Conflict with Akbar)

इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ 1570 का नागौर दरबार था। अकबर ने राजस्थान के राजाओं को अपनी अधीनता (Subjugation) स्वीकार कराने के लिए यह दरबार लगाया था। राव चंद्रसेन भी वहां पहुंचे, लेकिन जब उन्होंने देखा कि अकबर राजपूत राजाओं को आपस में लड़ाकर अपना गुलाम बनाना चाहता है, तो वे बिना संधि किए वहां से निकल गए।यहीं से शुरू हुआ मुगलों और मारवाड़ के बीच आजीवन संघर्ष (Life-long Struggle)।

राव चंद्र सेन का छापामार युद्ध और पहाड़ों का जीवन (Guerrilla Warfare Rao Chandrasen)

जब मुगलों ने जोधपुर (Jodhpur) पर कब्जा कर लिया, तो राव चंद्रसेन ने हार नहीं मानी। उन्होंने:भाद्राजून (Bhadrajun) और सिवाणा (Siwana) के किलों को अपना केंद्र बनाया।रेगिस्तान और अरावली की पहाड़ियों (Aravalli Hills) में छिपकर मुगलों पर हमले किए ।वे भारत के पहले ऐसे शासक थे जिन्होंने छापामार युद्ध प्रणाली (Guerrilla Warfare) का व्यापक उपयोग किया, जिसे बाद में महाराणा प्रताप ने भी अपनाया।

राव चंद्र सेन को’दूसरा महाराणा प्रताप’ क्यों कहा जाता है? (5 Big Reasons)

अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की (Refusal to Submit): 1570 के नागौर दरबार (Nagaur Durbar) में जब राजस्थान के लगभग सभी राजाओं ने अकबर की अधीनता मान ली थी, तब राव चंद्रसेन वहां से बिना संधि किए निकल आए थे।

छापामार युद्ध प्रणाली (Guerrilla Warfare): उन्होंने पहाड़ों (विशेषकर भाद्राजून और सिवाणा) में रहकर मुगलों के खिलाफ छापामार युद्ध (Guerrilla Warfare) शुरू किया। यही तकनीक बाद में महाराणा प्रताप ने अपनाई।

राजपाट का त्याग (Sacrifice of Royalty): प्रताप की तरह ही चंद्रसेन ने भी महलों का सुख छोड़ दिया और जीवन भर जंगलों में भटकना स्वीकार किया, लेकिन स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया।

प्रताप के मार्गदर्शक (Pathfinder for Pratap): इतिहासकार मानते हैं कि चंद्रसेन ने मुगलों से लड़ने की जो नींव रखी थी, महाराणा प्रताप ने उसी पर स्वाभिमान की मीनार खड़ी की

स्वतंत्रता का प्रतीक (Symbol of Independence): जब जोधपुर (Jodhpur) पर मुगलों का कब्जा हो गया, तब भी उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी अंतिम सांस तक संघर्ष जारी रखा।

राव चंद्रसेन को ‘मारवाड़ का प्रताप’ क्यों कहा जाता है?

राव चंद्रसेन को ‘मारवाड़ का प्रताप’ (Pratap of Marwar) इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने महाराणा प्रताप की तरह ही मुगल सम्राट अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की और जीवन भर जंगलों एवं पहाड़ों में रहकर स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया।

‘प्रताप का अग्रगामी’ (Precursor of Pratap) किसे कहा जाता है?

राव चंद्रसेन राठौड़ को ‘प्रताप का अग्रगामी’ कहा जाता है क्योंकि उन्होंने महाराणा प्रताप से पहले ही मुगलों के खिलाफ छापामार युद्ध प्रणाली (Guerrilla Warfare) और पहाड़ों में रहकर लड़ने की रणनीति अपनाई थी।

1570 के नागौर दरबार का राव चंद्रसेन पर क्या प्रभाव पड़ा?

1570 के नागौर दरबार (Nagaur Durbar) में राव चंद्रसेन भी गए थे, लेकिन अकबर की साम्राज्यवादी नीति को देखकर वे वहां से लौट आए। इसके बाद अकबर ने जोधपुर पर आक्रमण कर उसे अपने अधीन कर लिया और चंद्रसेन को दर-दर भटकना पड़ा

राव चंद्रसेन की मृत्यु कहाँ हुई थी?

राव चंद्रसेन की मृत्यु 11 जनवरी 1581 को पाली जिले की सारण की पहाड़ियों (Saran Hills) में सचियाप नामक स्थान पर हुई थी। यहाँ आज भी उनकी अश्वारूढ़ प्रतिमा (Statue) मौजूद है।

राव चंद्रसेन को ‘भूला-बिसरा राजा’ (The Forgotten Hero) क्यों कहते हैं?

राव चंद्रसेन को ‘भूला-बिसरा राजा’ (The Forgotten King of Marwar) इसलिए कहा जाता है क्योंकि इतिहास के पन्नों में उन्हें वह स्थान और प्रसिद्धि नहीं मिली जो महाराणा प्रताप को मिली, जबकि उनका संघर्ष और बलिदान भी वैसा ही महान था।

राव चंद्रसेन के भाइयों के नाम क्या थे जिन्होंने उनका विरोध किया?

राव चंद्रसेन के बड़े भाई राम और उदय सिंह (मोटा राजा उदय सिंह) ने उनका विरोध किया था। वे दोनों अकबर की शरण में चले गए थे और मुगलों को मारवाड़ पर आक्रमण करने के लिए उकसाया था।

राव चंद्रसेन ने अपनी राजधानी कहाँ स्थानांतरित की थी?

जोधपुर पर मुगलों के कब्जे के बाद, राव चंद्रसेन ने भाद्राजून (Bhadrajun) को अपना केंद्र बनाया और बाद में सिवाणा (Siwana) के किले से अपना शासन चलाया।

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