बीकानेर की रम्मत संस्कृति: फक्कड़दाता की रम्मत और 250 साल पुरानी पाटा परंपरा

बीकानेर की रम्मत बीकानेर की सांस्कृतिक विरासत में सर्वोपरि है। फाल्गुन मास की मस्ती और लोक कला का ऐसा अनूठा संगम दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता। बीकानेर में रम्मतों का श्रीगणेश फक्कड़दाता की रम्मत (Phakkad Data ki Rammat) से होता है, जो पिछले 250 वर्षों से अविरल चली आ रही है।

फक्कड़दाता की रम्मत: परंपरा और इतिहास (History of Rammat)

यह रम्मत फाल्गुन सुदी अष्टमी की रात को आयोजित की जाती है, जिसका समय रात 8:00 बजे से लेकर देर रात 12:30 बजे तक रहता है। इस परंपरा की शुरुआत लगभग 250 वर्ष पूर्व बीकानेर के प्रसिद्ध कलाकार स्व. रंगाजी तंवर के मतानुसार हुई थी। रम्मत के सूत्रधार स्थानीय तनसुख दास रंगा रहे हैं, जिन्होंने इस लोक कला को घर-घर में लोकप्रिय बनाया।

रम्मत की अनूठी विशेषताएं (Key Features of Rammat)

  • पाटा संस्कृति (Paata Culture): रम्मतों का मंचन लकड़ी के बड़े तख्तों (पाटा) पर होता है। आजकल ये रम्मतें बीकानेर के विभिन्न मोहल्लों में स्थित पाटा पर आयोजित की जाती हैं।
  • पात्रों का प्रवेश: रम्मत की शुरुआत भगवान गणेश के पदार्पण के साथ होती है। इसके बाद ‘बोहवा-बोहरी’ का स्वांग आता है, जो नए कपड़े पहनकर मंच पर मनोरंजन करते हैं।
  • लोक गायन: इसमें लावणी, चौमासा और ख्याल जैसे लोक गीतों का गायन होता है। ये गीत नए-नए लोक राग-रागिनियों में गाए जाते हैं।
  • गणेश वंदना: रम्मत शुरू होने से पहले भगवान श्रीगणेश की पूजा की जाती है और उन्हें रेवड़ी का प्रसाद चढ़ाया जाता है।

बीकानेर में रम्मतों का श्रीगणेश किस रम्मत से होता है?

बीकानेर में रम्मतों का औपचारिक श्रीगणेश ‘फक्कड़दाता की रम्मत’ से होता है। यह रम्मत फाल्गुन सुदी अष्टमी की रात को आयोजित की जाती है।

फक्कड़दाता की रम्मत कितने साल पुरानी परंपरा है?

यह परंपरा लगभग 250 वर्षों से निरंतर चली आ रही है। इसकी शुरुआत कलाकार स्व. रंगाजी तंवर के समय से मानी जाती है।

रम्मतों का मंचन किस स्थान पर किया जाता है?

रम्मतों का मंचन लकड़ी के विशाल तख्तों पर होता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘पाटा’ कहा जाता है। बीकानेर के पुराने शहर में आज भी यह ‘पाटा संस्कृति’ जीवंत है।

रम्मत शुरू होने से पहले किसकी पूजा की जाती है?

किसी भी रम्मत के प्रारंभ में भगवान श्रीगणेश के पदार्पण की पूजा की जाती है और उन्हें रेवड़ी का प्रसाद चढ़ाया जाता है।

फक्कड़दाता की रम्मत में मुख्य रूप से क्या गाया जाता है?

इसमें लावणी, चौमासा और ख्याल जैसे लोक गीतों का गायन नए-नए राग-रागिनियों में किया जाता है।

‘बोहवा-बोहरी’ का स्वांग क्या होता है?

रम्मत के दौरान कलाकारों द्वारा ‘बोहवा-बोहरी’ का रूप धरा जाता है, जिसमें वे नए कपड़े पहनकर मंच पर आते हैं और अपनी कला से दर्शकों का मनोरंजन करते हैं।

बीकानेर की रम्मतों का समय क्या रहता है?

आमतौर पर रम्मतें रात को शुरू होती हैं। फक्कड़दाता की रम्मत रात 8:00 बजे से देर रात 12:30 बजे तक चलती है।

फक्कड़दाता कौन थे जिनकी याद में रम्मत होती है?

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार फक्कड़दाता (पुखराज जी) बिस्सा जाति के थे, जो अपने दयालु और फक्कड़ स्वभाव के लिए प्रसिद्ध थे। उनके इसी स्वभाव के कारण उन्हें ‘फक्कड़दाता’ कहा गया।

क्या रम्मत देखने के लिए कोई टिकट लगता है?

नहीं, बीकानेर की रम्मतें सामुदायिक आयोजन हैं जो मोहल्लों के चौक में आयोजित होती हैं। यहाँ आप लोकल ढाबे/दुकान के एक्सपीरियंस के साथ मुफ्त में इस लोक कला का आनंद ले सकते हैं।

रम्मत का समापन कैसे होता है?

रम्मत का समापन शीतला माता के गीत गाकर और सभी कलाकारों द्वारा सामूहिक वंदना के साथ किया जाता है।

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