महाभारत का सबसे रहस्यमयी योद्धा: बर्बरीक के रहस्य जो गूगल पर भी नहीं मिलेंगे।

महाभारत काल में एक से बढ़कर एक शक्तिशाली योद्धा हुए, लेकिन जब भी बर्बरीक के रहस्य की बात आती है, तो बड़े-बड़े विद्वान भी हैरान रह जाते हैं। इंटरनेट पर आपको उनकी ‘शीश दान’ और ‘तीन बाण’ की सामान्य कथाएँ तो हज़ारों ब्लॉग्स पर मिल जाएँगी।

लेकिन आज हम पौराणिक ग्रंथों, स्कंद पुराण और आधुनिक विज्ञान के दृष्टिकोण से महाबली बर्बरीक के उन अनछुए पहलुओं का विश्लेषण करेंगे, जो आज भी आम लोगों की पहुँच से दूर हैं।

स्कंद पुराण का कौमारिका खंड: कौमारिका खंड की गुप्त साधना

आम तौर पर माना जाता है कि घटोत्कच के पुत्र सिर्फ एक शक्तिशाली धनुर्धर थे, लेकिन स्कंद पुराण में छिपे बर्बरीक के रहस्य और उनके कौमारिका खंड के विवरण के अनुसार, उनकी शक्तियों का असली स्रोत उनकी कठिन तांत्रिक और गुप्त साधना थी।

गुप्त देवियों की सिद्धि: अपनी माता मौरवी (अहिलावती) के मार्गदर्शन में उन्होंने गुप्त क्षेत्रों और गुफाओं में जाकर नवदुर्गा और चंडी साधना की थी।

यक्ष रूप से मुक्ति का मार्ग: पौराणिक संदर्भों के अनुसार, वे पूर्व जन्म में ‘सूर्यवर्चा’ नाम के यक्ष थे। उन्हें ब्रह्मा जी से मिले श्राप से मुक्ति पाने के लिए इस कलयुग के अवतारी रूप में आना था। उनकी यह साधना केवल युद्ध जीतने के लिए नहीं, बल्कि अपनी आध्यात्मिक चेतना को उच्चतम स्तर पर ले जाने के लिए थी।

विशिष्ट पुराणों के अनुसार, माँ दुर्गा ने स्वयं प्रकट होकर उन्हें वो तीन अमोघ बाण दिए थे, जो ब्रह्मांड की किसी भी शक्ति को परास्त कर सकते थे।

हारे का सहारा’ प्रतिज्ञा: एक कूटनीतिक और रणनीतिक लूप (Strategic Loop)

उन्होंने अपनी माता को वचन दिया था कि युद्ध में जो भी पक्ष हारेगा, वह उसकी तरफ से लड़ेंगे। धार्मिक दृष्टिकोण से यह परम दयालुता का प्रतीक है, लेकिन अगर हम इसे आधुनिक कूटनीति (Diplomacy) और युद्ध रणनीति के नजरिए से देखें, तो यह एक अंतहीन चक्र (Loop) था।

श्री कृष्ण की कूटनीति: भगवान कृष्ण भली-भांति जानते थे कि अगर महाभारत के बर्बरीक के रहस्य और उनके वचन को न सुलझाया गया, तो धर्म की जीत असंभव हो जाएगी।

रणनीतिक चक्रव्यूह: यदि वे कौरवों को हारता देख उनकी तरफ से लड़ते, तो पांडव कमजोर हो जाते। प्रतिज्ञा के अनुसार, जैसे ही पांडव हारने की कगार पर आते, उन्हें पांडवों की तरफ मुड़ना पड़ता।

परिणाम: इस प्रकार वे अकेले ही दोनों सेनाओं को तब तक समाप्त करते रहते, जब तक कि युद्धभूमि में केवल वे स्वयं अकेले न बच जाते। यही कारण था कि धर्म की स्थापना के लिए श्री कृष्ण को उनसे उनका शीश मांगना पड़ा।

बर्बरीक के तीन बाण: प्राचीन अस्त्र या आधुनिक ‘लेज़र-गाइडेड’ तकनीक?

उनके तीन बाणों की कार्यप्रणाली को समझना भी बर्बरीक के रहस्य की परतों को खोलने जैसा है, जो सीधे आधुनिक विज्ञान से जुड़ती हैं। इसे आज के विज्ञान के नजरिए से देखें, तो यह किसी आधुनिक टारगेट लॉकिंग और मिसाइल टेक्नोलॉजी से कम नहीं थी।

पहला बाण (टार्गेट लॉकिंग): पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह बाण नष्ट किए जाने वाले शत्रुओं को चिह्नित करता था। आधुनिक विज्ञान में इसे लेज़र डिज़िग्नेटर या जियो-फेंसिंग (Geo-Fencing) तकनीक कहा जाता है, जो सटीक निशाना लॉक करती है।

दूसरा बाण (सुरक्षा चक्र): यह बाण उन लोगों या संपत्तियों को चिह्नित करता था जिन्हें युद्ध में सुरक्षित बचाना हो। आधुनिक सैन्य विज्ञान में इसे IFF सिस्टम (Identification Friend or Foe) कहते हैं, जो मित्र और शत्रु की सटीक पहचान करता है।

तीसरा बाण (अचूक प्रहार): यह बाण पहले बाण द्वारा लॉक किए गए सभी लक्ष्यों को एक साथ नष्ट करके वापस आ जाता था। आधुनिक युग में यह स्मार्ट लेज़र-गाइडेड मिसाइल (Laser-Guided Missile) की तरह काम करता था।

शीश दान के बाद का वैराग्य: युद्ध के मैदान में मौन दृष्टा बर्बरीक के रहस्य

इंटरनेट पर यह कहानी तो प्रसिद्ध है कि उनका शीश एक ऊंचे स्थान पर रख दिया गया था जहाँ से उन्होंने पूरा युद्ध देखा। लेकिन मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक स्तर पर युद्ध के मैदान में मूक दर्शक बने रहना भी बर्बरीक के रहस्य का एक गहरा दार्शनिक पहलू है।

अहंकार का विनाश: जब युद्ध समाप्त हुआ और पांडव आपस में लड़ने लगे कि युद्ध किसने जीता, तब उनके शीश ने हंसकर कहा कि उन्हें केवल श्री कृष्ण का सुदर्शन चक्र और महाकाली का खप्पर दिखाई दे रहा था। यह उनके परम वैराग्य को दर्शाता है।

साक्षी भाव (The Witness Mode): 18 दिनों तक करोड़ों योद्धाओं का विनाश देखने के बाद भी उनका शीश शांत रहा। उन्होंने संसार की नश्वरता को समझ लिया था।

श्याम अवतार की प्राप्ति: उनके इसी परम त्याग और साक्षी भाव से प्रसन्न होकर श्री कृष्ण ने उन्हें कलयुग में अपने नाम “श्याम” से पूजे जाने का वरदान दिया।

“बर्बरीक ने किस गुफा में तपस्या की थी” (Barbarik Tapasya Sthal)

स्कंद पुराण के कौमारिका खंड के अनुसार, बर्बरीक के रहस्यमयी साधना स्थल का संबंध किसी आम गुफा से नहीं, बल्कि गुजरात में स्थित महीसागर संगम (जहाँ मही नदी का समुद्र से मिलन होता है) के पास गुप्त क्षेत्रों से है। उन्होंने गुप्त सिद्धियों के लिए गुप्त नवदुर्गा गुफा में कठिन तपस्या कर माँ कामाख्या (शक्ति) को प्रसन्न किया और अमोघ तीन बाण प्राप्त किए थे।

स्कंद पुराण के कौमारिका खंड में बर्बरीक के रहस्य

स्कंद पुराण के कौमारिका खंड में बर्बरीक का वर्णन उनके पूर्व जन्म के यक्ष रूप ‘सूर्यवर्चा’ से लेकर उनके घटोत्कच पुत्र बनने की पूरी यात्रा को उजागर करता है। इस खंड के अनुसार, वे कोई सामान्य योद्धा नहीं बल्कि देवी गुप्त चंडिका के परम भक्त थे। कौमारिका खंड में ही उनके तीन बाणों की प्राप्ति और महीसागर संगम तीर्थ पर की गई तांत्रिक साधना का सबसे प्रामाणिक पौराणिक विवरण मिलता है, जो बर्बरीक के रहस्य को उजागर करता है।

बर्बरीक की अपराजिता वैष्णवी विद्या का रहस्य”

“अपराजिता वैष्णवी विद्या” (या महाविद्या) बर्बरीक की अजेय शक्ति का असली आध्यात्मिक स्रोत थी। इंटरनेट पर लोग सिर्फ उनके “तीन बाणों” के बारे में जानते हैं, लेकिन वे तीन बाण किस मंत्र या विद्या से संचालित होते थे, वही ‘अपराजिता वैष्णवी विद्या’ है।

बर्बरीक ने भगवान कृष्ण के निर्देश पर गुजरात के महीसागर संगम तीर्थ पर जाकर कई वर्षों तक कठिन तपस्या की थी। वहाँ की अधिष्ठात्री देवियों (सिद्ध अंबिकाओं) को प्रसन्न करने के बाद उन्हें “सर्वसिद्धिदायक अपराजिता नामक वैष्णवी महाविद्या” प्राप्त हुई, जिसने उन्हें त्रिलोक में अजेय (कभी न हारने वाला) बना दिया।

बाणों का रिमोट कंट्रोल: बर्बरीक के पास जो तीन बाण थे, वे कोई साधारण लकड़ी के तीर नहीं थे। जब बर्बरीक इस ‘अपराजिता वैष्णवी विद्या’ के मंत्रों को पढ़ते थे, तो उनके बाणों में ब्रह्मांडीय ऊर्जा (Cosmic Energy) सक्रिय हो जाती थी।

महाभारत युद्ध से पहले जब श्री कृष्ण ने ब्राह्मण का रूप धरकर बर्बरीक की परीक्षा ली, तब बर्बरीक ने पीपल के पेड़ के सारे पत्तों को एक ही तीर से छेदने के लिए इसी अपराजिता वैष्णवी विद्या का आह्वान किया था। जब कृष्ण ने एक पत्ता अपने पैर के नीचे छुपा लिया, तो इस महाविद्या से संचालित बाण ने कृष्ण के पैर के पास जाकर चक्र काटना शुरू कर दिया, क्योंकि उसे हर हाल में अपना टारगेट पूरा करना था।

कथाओं के अनुसार, जब भगवान कृष्ण ने बर्बरीक का वध (शीश दान के प्रसंग में कूटनीति के तहत) करने का निर्णय लिया, तब बर्बरीक ने कहा था कि उन्होंने बचपन से इस ‘अपराजिता वैष्णवी महाविद्या’ की साधना केवल इसलिए की थी ताकि वे भगवान विष्णु के अवतार (श्री कृष्ण) के हाथों मुक्ति पा सकें।

हारे का सहारा” वचन का इतिहास

हारे का सहारा” वचन का इतिहास महाबली बर्बरीक की अपनी माता मौरवी (अहिलावती) को दी गई उस ऐतिहासिक प्रतिज्ञा से जुड़ा है, जो उन्होंने महाभारत युद्ध प्रस्थान के समय ली थी। जब उन्होंने युद्ध में जाने की आज्ञा मांगी, तब माता ने वचन लिया कि वे हमेशा कमजोर और हारने वाले पक्ष का साथ देंगे। यही प्रतिज्ञा आगे चलकर बर्बरीक के रहस्यमयी बलिदान और खाटू श्याम अवतार का आधार बनी।

बर्बरीक के रहस्य से प्रारंभ यह लेख महाबली की अद्भुत यात्रा, अस्त्र तकनीक और कूटनीति के छिपे पहलुओं को सामने लाता है। कलयुग के राजा खाटू श्याम जी का यह दिव्य इतिहास केवल एक युद्ध की गाथा नहीं, बल्कि सर्वोच्च त्याग और अध्यात्म का अमर प्रमाण है। अंततः, उनका चरित्र आज भी करोड़ों भक्तों का सच्चा संबल बना हुआ है।

बर्बरीक के प्रारंभिक गुरु महर्षि विजय सिद्धसेन

बहुत कम लोग जानते हैं कि घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक के प्रारंभिक गुरु महर्षि विजय सिद्धसेन थे। उन्होंने ही बर्बरीक को बाल्यकाल में अस्त्र-शस्त्र के संचालन की बुनियादी शिक्षा दी थी। इसके बाद ही बर्बरीक गुप्त नवदुर्गा साधना की ओर बढ़े। गुरु विजय सिद्धसेन से मिली इसी अद्भुत युद्ध कला और नीति ज्ञान के बल पर बर्बरीक ने त्रिलोक में सबसे शक्तिशाली योद्धा बनने की नींव रखी थी, जो बर्बरीक के रहस्यमयी जीवन का एक मुख्य अध्याय है।

अपराजिता वैष्णवी विद्या का मंत्र क्या है?

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, बर्बरीक की अजेय शक्ति का आधार “ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अपराजितायै नमः” और वैष्णवी गायत्री मंत्र था। महीसागर संगम पर नवदुर्गा की कठिन साधना के दौरान सिद्ध अम्बिकाओं ने उन्हें इस परम गुप्त तांत्रिक मंत्र की दीक्षा दी थी। इस मंत्र के उच्चारण मात्र से उनके तीनों बाणों में ब्रह्मांडीय ऊर्जा सक्रिय हो जाती थी, जो **बर्बरीक के रहस्य**मयी अस्त्रों को अचूक और अजेय बनाती थी।

बर्बरीक को सिद्ध चंडिका मंत्र किसने दिया?

अस्त्र विद्या सीखने के बाद बर्बरीक को सिद्ध चंडिका मंत्र की दीक्षा स्वयं उनके प्रारंभिक गुरु महर्षि विजय सिद्धसेन और उनकी माता मौरवी (अहिलावती) ने दी थी। माता मौरवी स्वयं भगवान शिव और नागवंश की तांत्रिक विद्याओं की ज्ञाता थीं। उनके मार्गदर्शन में ही बर्बरीक ने गुप्त चंडिका मंत्र का अनुष्ठान पूरा किया, जिससे प्रसन्न होकर आदि शक्ति ने उन्हें अमोघ शक्ति के तीन बाण वरदान में दिए थे।

यक्ष सूर्यवर्चा को ब्रह्मा जी का श्राप क्या था?

पूर्व जन्म में बर्बरीक ‘सूर्यवर्चा’ नाम के एक अत्यंत पराक्रमी यक्ष थे। जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ा, तो देवताओं की बैठक में सूर्यवर्चा ने अहंकार में आकर कह दिया कि वे अकेले ही पृथ्वी के सभी राक्षसों का संहार कर सकते हैं और इसके लिए उन्हें भगवान विष्णु के अवतार की कोई आवश्यकता नहीं है। इस अहंकार से क्रोधित होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें श्राप दिया कि धर्म स्थापना के महायुद्ध (महाभारत) में स्वयं भगवान विष्णु के अवतार (श्री कृष्ण) के हाथों उनका शीश धड़ से अलग कर दिया जाएगा। यही श्राप आगे चलकर महाभारत में उनके शीश दान की कथा का मुख्य कारण बना।

“सुदर्शन चक्र बनाम बर्बरीक के बाण”

सुदर्शन चक्र बनाम बर्बरीक के बाण का मुकाबला महाभारत का सबसे बड़ा अनसुना रहस्य है। बर्बरीक के बाण कोई साधारण अस्त्र नहीं थे, बल्कि वे गुप्त चंडिका शक्तियों और अपराजिता वैष्णवी विद्या से पूरी तरह संचालित थे।

जब भगवान श्री कृष्ण ने परीक्षा ली, तब एक पीपल के पत्ते को अपने पैर के नीचे छुपाने पर भी बर्बरीक के बाण ने श्री कृष्ण के पैर के चारों ओर चक्कर काटना शुरू कर दिया था।

यदि युद्धभूमि में दोनों के बीच सीधा मुकाबला होता, तो बर्बरीक का बाण भगवान विष्णु के परम शक्तिशाली सुदर्शन चक्र को कभी भेद तो नहीं पाता, क्योंकि सुदर्शन चक्र स्वयं ब्रह्मांड का सर्वोच्च अस्त्र है

परंतु, बाण में समाहित वैष्णवी ऊर्जा के कारण वह सुदर्शन चक्र से टकराकर उसे कुछ समय के लिए निष्प्रभावी (Neutralize) करने की क्षमता जरूर रखता था, जो **बर्बरीक के रहस्य**मयी अस्त्र विज्ञान को दर्शाता है।

बर्बरीक के भाइयों के नाम क्या थे?

घटोत्कच के ज्येष्ठ पुत्र बर्बरीक (खाटू श्याम जी) के दो भाई थे—अंजनपर्व और मेघवर्ण। अंजनपर्व ने महाभारत के भीषण युद्ध में कौरव सेना का सामना करते हुए महापराक्रमी अश्वत्थामा के हाथों वीरगति प्राप्त की थी। वहीं, मेघवर्ण के पास अपनी माता और ननिहाल पक्ष से मिली अद्भुत मायावी शक्तियाँ थीं, जिनका उपयोग करके वह युद्धक्षेत्र में अचानक घने बादलों और भयानक आंधी-तूफान का भ्रम पैदा कर देता था। ये दोनों ही गदाधारी भीम के प्रतापी पौत्र थे।

बर्बरीक का बाल्यकाल और नागलोक से संबंध क्या है?

बर्बरीक का बाल्यकाल और नागलोक से संबंध उनकी अद्भुत अभेद्य शक्तियों का सबसे बड़ा आधार था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भीम के पुत्र घटोत्कच का विवाह नागराज बासुकी की रूपवती पुत्री मौरवी (जिन्हें अहिलावती भी कहा जाता है) से हुआ था। इस प्रकार, ननिहाल पक्ष से बर्बरीक का सीधा संबंध नागलोक से स्थापित हुआ।

बचपन में ही उनकी माता ने उन्हें नागलोक के परम गुप्त विष-प्रतिरोधक विज्ञान, दिव्य मायावी युद्ध कलाओं और अस्त्र-शस्त्र संचालन की कठिन शिक्षा दी थी। यही कारण है कि **बर्बरीक के रहस्य**मयी बचपन, उनके शरीर की वज्र जैसी बनावट और अजेय यौधेय गुणों के पीछे नागलोक की दैवीय और पराक्रमी शक्तियों का अमूल्य योगदान माना जाता है।

बर्बरीक ने नागलोक की राजकुमारी (माता मौरवी) से युद्ध कला सीखी और नागराज वासुकि के आशीर्वाद से अपार बल पाया।

बर्बरीक का मरना क्यों जरूरी था

महाभारत युद्ध में बर्बरीक का वध (शीश दान) धर्म स्थापना के लिए अनिवार्य था, जिसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

बर्बरीक ने हमेशा हारने वाले पक्ष का साथ देने की प्रतिज्ञा की थी। उनके पास तीन अमोघ बाण थे। यदि वे युद्ध में उतरते, तो जो भी पक्ष कमजोर पड़ता, वे उसकी ओर हो जाते। इस चक्र में वे दोनों ओर की सेनाओं का विनाश कर देते।

युद्ध अधर्म के खिलाफ था और पांडवों की विजय आवश्यक थी। बर्बरीक के जीवित रहने से अधर्म की जीत या पूरी सृष्टि के विनाश का खतरा था, जिससे श्रीकृष्ण का अवतार-उद्देश्य विफल हो जाता।

रणभूमि की पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ क्षत्रिय की बलि अनिवार्य थी, जिसके लिए बर्बरीक योग्य थे। साथ ही, पूर्वजन्म में ब्रह्मा जी द्वारा मिले श्राप की मुक्ति के लिए भी श्रीकृष्ण द्वारा उनका वध निश्चित था।

बर्बरीक नाम के पीछे का सबसे बड़ा रहस्य! क्यों कहा जाता है उन्हें ‘सिंह के बालों वाला’?

बर्बरीक को ‘बर्बरीक’ नाम उनके माता-पिता यानी महाबली घटोत्कच और माता मौरवी (अहिलावती) ने उनके जन्म के समय दिया था। इसके पीछे एक बेहद अनूठी और रोचक पौराणिक कथा है।

जब इस प्रतापी बालक का जन्म हुआ, तब उनके सिर के बाल सामान्य बच्चों की तरह नहीं थे। उनके बाल बब्बर शेर के अयाल (गर्दन के घने बालों) की तरह बहुत घने, घुंघराले और चारों तरफ बिखरे हुए थे। उनके इस अद्भुत सिंह जैसे स्वरूप और तेजस्वी मुख को देखकर माता-पिता ने उनका नाम ‘बर्बरीक’ रखा, जिसका शाब्दिक अर्थ ही ‘बब्बर शेर जैसे बालों वाला योद्धा’ होता है। यह नामकरण उनके पराक्रम और अजेय शक्तियों का प्रतीक बना, जो आगे चलकर बर्बरीक के रहस्यमयी श्याम अवतार की पहली पहचान बना।

“बर्बरीक के शीश दान के समय भीम की क्या प्रतिक्रिया थी”

बर्बरीक के शीश दान के समय भीम की प्रतिक्रिया अत्यंत दुखद और भावुक थी। अपने परम प्रतापी पौत्र का यह महान बलिदान देखकर महाबली भीम युद्धभूमि में फूट-फूटकर रो पड़े थे। भीम को गर्व था कि उनका पौत्र पल भर में युद्ध समाप्त कर सकता है, लेकिन नियति ने उन्हें तोड़ दिया। उन्होंने रोते हुए पूछा कि धर्म के लिए उनके ही परिवार को इतना बड़ा त्याग क्यों करना पड़ रहा है, जो **बर्बरीक के रहस्य**मयी बलिदान का सबसे मार्मिक क्षण था।

शीश दान के बाद बर्बरीक की माता मौरवी का क्या हुआ?

शीश दान के बाद बर्बरीक की माता मौरवी गहरे शोक में डूब गईं और उन्होंने युद्धभूमि में आकर भगवान श्री कृष्ण से इस क्रूर नियति का कारण पूछा था। जब कृष्ण ने उन्हें बर्बरीक के पूर्व जन्म (यक्ष सूर्यवर्चा के श्राप) का रहस्य समझाया, तब उनका क्रोध शांत हुआ। महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद, मौरवी ने राजसी ठाट-बांट और संसार को पूरी तरह त्याग दिया। वे गुजरात में महीसागर संगम तीर्थ के पास उसी गुप्त नवदुर्गा गुफा क्षेत्र में लौट गईं जहाँ उनके पुत्र ने कठिन साधना की थी, और अपना शेष जीवन पूरी तरह ईश्वर भक्ति और कठिन तपस्या में समर्पित कर दिया।

श्री कृष्ण ने बर्बरीक का शीश काटने के लिए किस अस्त्र का प्रयोग किया?

श्री कृष्ण ने बर्बरीक का शीश काटने के लिए अपने परम शक्तिशाली और अचूक सुदर्शन चक्र का प्रयोग किया था। फाल्गुन मास की द्वादशी तिथि को भगवान कृष्ण ने सुदर्शन चक्र के एक ही वार से उनका शीश धड़ से अलग कर दिया था। शीश कटते ही कृष्ण ने उस पर अमृत छिड़का ताकि वह महाभारत युद्ध का अंत देख सके, जो **बर्बरीक के रहस्य**मयी बलिदान की सबसे दिव्य कथा है।

“बर्बरीक ने 9 करोड़ पलासी दैत्यों का संहार किया

महाभारत के महायोद्धा बर्बरीक की असीम शक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण स्कन्द पुराण की एक गुप्त कथा में मिलता है। युद्ध से ठीक पहले, उन्होंने पाताल लोक (महीसागर संगम) जाकर अकेले ही नौ करोड़ मांसभक्षी पलासी राक्षसों का सर्वनाश किया था। दरअसल, विजय नामक एक ब्राह्मण वहां गुप्त तंत्र साधना कर रहे थे, जिसमें ये दैत्य बार-बार विघ्न डाल रहे थे। बर्बरीक ने रक्षक बनकर सभी राक्षसों को मार गिराया। इस अदम्य साहस से प्रसन्न होकर वहां प्रकट हुईं चंडिका सहित सिद्ध देवियों ने उन्हें अजय होने का वरदान दिया और तीन अमोघ बाण तथा दिव्य भस्म प्रदान की।

पलाशी दैत्य और विजय पंडित की कथा और बर्बरीक

विजय पंडित नाम के एक विद्वान ब्राह्मण थे, जो सिद्धियां प्राप्त करने के लिए महीसागर संगम (गुजरात) पर माता चंडिका और नौ देवियों की अत्यंत कठिन गुप्त तंत्र साधना कर रहे थे। लेकिन पाताल लोक के राजा के अधीन रहने वाले पलाशी दैत्य (मांसभक्षी राक्षस) हर बार उनकी साधना में विघ्न डाल देते थे।

अपनी साधना की रक्षा के लिए विजय पंडित ने महाबली घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक से सहायता मांगी। बर्बरीक अपने गुरु और माता के संस्कारों के कारण ब्राह्मणों की रक्षा को अपना परम धर्म मानते थे, इसलिए उन्होंने सहर्ष रक्षक बनना स्वीकार किया।

जब विजय पंडित की गुप्त साधना पर नौ करोड़ पलाशी दैत्यों ने हमला किया, तब बर्बरीक ने सुरक्षा कवच बनाकर अकेले मोर्चा संभाला। उन्होंने अपनी दिव्य शक्तियों से भीषण संहार करते हुए पाताल लोक को लहूलुहान कर दिया और एक-एक कर सभी राक्षसों का अंत कर दिया।

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