क्या आपने कभी सोचा है कि 300 साल पहले खाटू श्याम का मेला कैसे लगता था? जब न गाड़ियां थीं, न पक्की सड़कें, और न ही आज जैसी सुख-सुविधाएं; तब पुराने जमाने में खाटू श्याम की निशान यात्रा कैसे होती थी?आइए इतिहास के पन्नों को पलटते हैं और जानते हैं रींगस से खाटू का पुराना रास्ता कौन सा था और हमारे पूर्वज किन कठिन परिस्थितियों में बाबा श्याम के दर पर हाजिरी लगाते थे।
300 साल पहले खाटू श्याम का मेला कैसे लगता था?
17वीं और 18वीं शताब्दी का खाटू धाम आज के आधुनिक कस्बे जैसा बिल्कुल नहीं था। उस दौर में खाटू धाम के चारों ओर शेखावाटी के ऊंचे-ऊंचे रेतीले टीले (धोरे), कँटीली झाड़ियाँ और घना जंगल हुआ करता था।
मिट्टी के दीयों और मशालों की चकाचौंध: आज की तरह मेला क्षेत्र में दूधिया रोशनी या रंग-बिरंगी लाइट्स नहीं होती थीं। रात के समय पूरा मेला क्षेत्र मिट्टी के दीयों, कँपीली मशालों और लकड़ियों के अलाव (धूनी) से रोशन होता था।
झांझ-मंजीरों और चंग की गूंज: चकाचौंध वाले लाउडस्पीकर्स की जगह कलयुग के अवतारी बाबा श्याम का गुणगान विशुद्ध रूप से पारंपरिक वाद्य यंत्रों जैसे चंग, झांझ, मंजीरे और ढोलक की थाप पर होता था। भक्त रात भर अलाव के चारों ओर बैठकर लोक-भजनों के जरिए बाबा को रिझाते थे।
बंजारों और व्यापारियों का पड़ाव: उस दौर में असम, बंगाल, बिहार और दिल्ली जैसे सुदूर इलाकों से आने वाले मारवाड़ी सेठ और स्थानीय बंजारे मेले से हफ्तों पहले खाटू पहुंच जाते थे। वे अपने साथ ऊंटों और घोड़ों पर राशन और तंबू (डेरे) लेकर आते थे। पूरा मेला रेत के धोरों पर लगे इन्हीं तंबुओं के बीच सजता था, जहां सादगी और अटूट भक्ति का अनूठा संगम देखने को मिलता था।
पुराने जमाने में खाटू श्याम की निशान यात्रा कैसे होती थी?
आज निशान यात्रा में डीजे की धुन पर नाचते-गाते भक्त और कुछ ही घंटों में रींगस से खाटू की दूरी तय कर लेने वाले श्रद्धालु दिखते हैं। लेकिन पुराने जमाने में यह यात्रा एक कठिन तपस्या जैसी थी।
सूरजगढ़ के निशान की ऐतिहासिक शुरुआत: खाटू धाम में निशान (विजय ध्वज) चढ़ाने की परंपरा का इतिहास बेहद गौरवशाली है। मान्यता है कि लगभग 350 साल से भी पहले अमरचंद जी अजमेरा (सूरजगढ़ वाले) द्वारा इस परंपरा की नींव रखी गई थी। उस दौर में सूरजगढ़ का सूर्य निशान लेकर चलना बेहद सम्मान की बात मानी जाती थी और आज भी मेले में सबसे पहला अधिकार इसी निशान का होता है।
कंटीली राहें और नंगे पैर का सफर: पुराने समय के श्याम भक्त (जिन्हें निशानबंद कहा जाता था) बिना पैरों में कुछ पहने, तपती रेत और नुकीले कंकड़-पत्थरों व कांटों के बीच मीलों पैदल चलते थे। हाथों में बांस की मजबूत लकड़ी से बंधा भारी-भरकम रेशमी निशान थामकर केवल ‘जय श्री श्याम’ और ‘हारे के सहारे की जय’ के जयकारों के दम पर वे आगे बढ़ते थे। पैरों में छाले पड़ जाने के बाद भी भक्तों के कदम नहीं रुकते थे।
कच्ची छाछ का विश्राम और स्थानीय ग्रामीणों का प्रेम: रास्ते में आज की तरह भव्य पंडाल या फाइव-स्टार सुविधाएं नहीं थीं। स्थानीय राजस्थानी ग्रामीण श्रद्धालुओं की सेवा के लिए पेड़ों की छांव में मटके लेकर बैठते थे। भक्तों को पीने के लिए पानी, कच्ची छाछ, राबड़ी और बाजरे की रोटी का भोग लगाया जाता था। भक्त कुछ देर पेड़ों के नीचे विश्राम करते और फिर अपनी मंजिल की ओर बढ़ जाते थे।
रींगस से खाटू का पुराना रास्ता कौन सा था? (The Ancient Route)
जब देश में रेलवे का नेटवर्क इतना मजबूत नहीं था और रींगस में बड़ा जंक्शन नहीं बना था, तब खाटू जाने वाले मार्ग की भौगोलिक स्थिति आज से बिल्कुल अलग थी।
रेतीली पगडंडियों और कुओं का मार्ग: रींगस से खाटू का पुराना रास्ता आज के डामर (पक्के) हाईवे जैसा सीधा और सुगम नहीं था। वह रास्ता छोटे-छोटे गांवों, ढाणियों और गहरे रेतीले धोरों के बीच से होकर गुजरने वाली कच्ची पगडंडियों का एक नेटवर्क था। इस पूरे 18-20 किलोमीटर के लंबे रास्ते में पानी पीने के लिए केवल कुछ चुनिंदा प्राचीन कुएं, बावड़ियां या पनघट ही एकमात्र सहारा हुआ करते थे।
जंगली जानवरों और डाकुओं का भय: पुराने समय में इस रास्ते पर घने जंगल होने के कारण जंगली जानवरों का खतरा हमेशा बना रहता था। साथ ही सुनसान रास्तों पर डाकुओं और लुटेरों का डर भी रहता था। इसी वजह से पुराने जमाने में श्रद्धालु कभी भी अकेले यात्रा नहीं करते थे। वे हमेशा 50 से 100 लोगों के बड़े-बड़े ‘जत्थों’ (समूहों) में ढोल-नगाड़े बजाते हुए एक साथ चलते थे ताकि सुरक्षा भी बनी रहे और कीर्तन करते हुए रास्ता भी आसानी से कट जाए।
खाटू का लक्खी मेला कितने साल पुराना है?
खाटू का लक्खी मेला कोई 50 या 100 साल पुराना नहीं है। मान्यता के अनुसार, जब विक्रम संवत 1027 (लगभग 1000 वर्ष से भी पहले) में बाबा श्याम का शीश कुंड से प्रकट हुआ था और राजा रूप सिंह चौहान ने मंदिर बनवाया था, तभी से फाल्गुन शुक्ल एकादशी और द्वादशी को मुख्य उत्सव और मेले का आयोजन किया जा रहा है।
पुराने जमाने में खाटू श्याम की निशान यात्रा की शुरुआत किसने की थी?
: खाटू श्याम जी की निशान यात्रा की शुरुआत का श्रेय सूरजगढ़ (झुंझुनू) के अमरचंद जी अजमेरा को जाता है। उन्होंने लगभग 350 साल से भी पहले पहली बार सूरजगढ़ से खाटू धाम तक पैदल चलकर बाबा श्याम को निशान (विजय ध्वज) अर्पित किया था। आज भी मेले में सबसे पहला निशान चढ़ाने का विशेष अधिकार सूरजगढ़ के इसी प्राचीन निशान को है।
खाटू मेले को ‘लक्खी मेला’ क्यों कहा जाता है?
पुराने समय में जब इस मेले में पहली बार आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या एक लाख (1 लाख) को पार कर गई थी, तब से भक्तों और स्थानीय लोगों ने इसे आदरपूर्वक ‘लक्खी मेला’ कहना शुरू कर दिया। आज इस मेले में देश-विदेश से 30 से 40 लाख से भी अधिक श्रद्धालु पहुँचते हैं, लेकिन इसका नाम आज भी लक्खी मेला ही प्रसिद्ध है।
सूरजगढ़ के निशान और अमरचंद जी अजमेरा का प्रामाणिक इतिहास”
लगभग 350 साल पहले झुंझुनू के सूरजगढ़ निवासी अमरचंद जी अजमेरा ने खाटू धाम की पहली ऐतिहासिक पदयात्रा शुरू की थी। वे बाबा श्याम के परम भक्त थे, जिन्होंने समाज में भक्ति की अलख जगाने के लिए हाथों में पवित्र ध्वज (निशान) थामकर रींगस से खाटू की पैदल राह पकड़ी थी। उनके इसी अटूट विश्वास से खाटू धाम में ‘निशान यात्रा’ की पावन परंपरा का जन्म हुआ।
लक्खी मेले में पहला निशान चढ़ाने का विशेष अधिकार :आज खाटू के लक्खी मेले में करोड़ों निशान आते हैं, लेकिन सबसे पहला निशान चढ़ाने का गौरवशाली अधिकार आज भी केवल सूरजगढ़ के सूर्य निशान को ही है। फाल्गुन शुक्ल एकादशी के दिन जब तक अमरचंद जी अजमेरा के वंशजों द्वारा लाया गया यह प्राचीन निशान मंदिर के शिखर पर नहीं लहराता, तब तक मेले की मुख्य रस्में पूरी नहीं मानी जातीं।
पुराने समय में जब डाकुओं और जंगली जानवरों का खौफ था, तब अमरचंद जी अजमेरा ने घने जंगलों और तपते रेतीले धोरों के बीच यह यात्रा की थी। लोक-मान्यताओं के अनुसार, उनकी इस निस्वार्थ भक्ति से प्रसन्न होकर बाबा श्याम ने उन्हें राह में कई दिव्य चमत्कार दिखाए थे। यही कारण है कि आज भी हर श्याम भक्त उनके नाम और इस प्राचीन निशान के प्रति गहरी आस्था रखता है।
अमरचंद जी अजमेरा की श्याम भक्ति की कहानी और 300 साल पहले खाटू श्याम का मेला
लगभग 350 साल पहले सूरजगढ़ के अमरचंद जी अजमेरा को बाबा श्याम ने सपने में दर्शन देकर खाटू आने का आदेश दिया। उस दौर में रेडीमेड ध्वज नहीं होते थे, इसलिए उन्होंने एक मजबूत बांस की लाठी पर सूर्य की आकृति वाला रेशमी कपड़ा बांधकर पहला निशान खुद तैयार किया। घने जंगलों, डाकुओं और हिंसक जानवरों के डर से समाज ने उन्हें रोका, लेकिन अटूट विश्वास के साथ वे अकेले ही पैदल यात्रा पर निकल पड़े।
कच्चे रास्तों पर चलते हुए अमरचंद जी के पैरों में छाले पड़ गए। रात के अंधेरे में जब डाकुओं ने उन्हें घेरा, तो भक्त की पुकार पर स्वयं बाबा श्याम दिव्य घुड़सवार बनकर प्रकट हुए और डाकू भाग गए ऐसी मान्यता है । जब वे खाटू पहुँचे, तो उनकी निस्वार्थ भक्ति देख पुजारियों ने उन्हें गले लगाया। बाबा श्याम ने वरदान दिया कि जब तक सूरजगढ़ का यह सूर्य निशान शिखर पर नहीं लहराएगा, तब तक लक्खी मेले की पूजा अधूरी रहेगी। यह परंपरा आज भी जारी है।
300 साल पहले खाटू श्याम का मेला इस बात का प्रमाण है कि सच्ची आस्था और विश्वास है तो बाधाएं मायने नहीं रखती है। खाटू श्याम की महिमा अपरंपार है और बोलो खाटू श्याम जी की जय।
300 साल पहले खाटू श्याम का मेला पर FAQ
सूरजगढ़ के निशान का रंग कैसा होता है?
सूरजगढ़ के प्राचीन निशान का रंग मुख्य रूप से गहरा लाल या केसरिया रेशमी होता है। इस पवित्र ध्वज पर भगवान सूर्य देव की आकृति (आंखें और मूंछों के साथ सूर्य मंडल) और ‘जय श्री श्याम’ अंकित होता है। यह निशान तेज, ऊर्जा और धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है।
पुराने जमाने में रींगस से खाटू धाम की दूरी तय करने में कितना समय लगता था?
आज भक्त रींगस से खाटू धाम की 18 किलोमीटर की दूरी 4 से 6 घंटे में पैदल तय कर लेते हैं। लेकिन 300 साल पहले गहरे रेतीले धोरों और कच्चे रास्तों के कारण भक्तों को यह दूरी तय करने में 12 से 15 घंटे या उससे भी अधिक का समय लग जाता था। भक्त बीच-बीच में ढाणियों में विश्राम करते हुए आगे बढ़ते थे।
ब्रिटिश काल (अंग्रेजों के समय) में खाटू श्याम मंदिर की क्या स्थिति थी?
: अंग्रेजों के जमाने में खाटू धाम जयपुर रियासत (Jaipur State) के अधीन एक स्वायत्त और पवित्र क्षेत्र था। ब्रिटिश सरकार ने कभी भी मंदिर की आंतरिक व्यवस्था या मेले में हस्तक्षेप नहीं किया। हालांकि, तत्कालीन ब्रिटिश गजेटियर (Gazetteer) में शेखावाटी के इस मेले को कानून-व्यवस्था और स्थानीय व्यापार के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण माना गया था।
पुराने समय में कोलकाता और मुंबई के मारवाड़ी व्यापारी खाटू कैसे पहुँचते थे?
आज़ादी से पहले, जब सड़कों का विकास नहीं था, तब कोलकाता, मुंबई और असम में रहने वाले मारवाड़ी व्यापारी पहले ट्रेन (स्टीम इंजन) द्वारा रींगस जंक्शन पहुँचते थे। रींगस स्टेशन पर उतरने के बाद वे स्थानीय बंजारों या जमींदारों से ऊंट-गाड़ियां या बैलगाड़ियां किराए पर लेते थे और जत्थों में भजन गाते हुए रेतीले रास्तों से खाटू धाम पहुँचते थे।
सूरजगढ़ के निशान के साथ ‘लोहे की लाठी’ या गुप्त नियमों की क्या मान्यता है?
सूरजगढ़ के निशान को ले जाने के बेहद कड़े नियम हैं। पुराने समय में सुरक्षा के लिहाज से निशान के साथ चलने वाले मुख्य सेवादार अपने पास रक्षात्मक अस्त्र रखते थे। मान्यता है कि यह निशान कभी भी जमीन को नहीं छूना चाहिए। यात्रा के दौरान यदि मुख्य निशानधारी विश्राम भी करता है, तो निशान को दूसरे सेवादार के हाथों में सौंप दिया जाता है, लेकिन इसे भूमि पर नहीं रखा जाता।
पुराने जमाने में खाटू श्याम मेले के दौरान पीने के पानी की क्या व्यवस्था होती थी?
आज की तरह पहले वाटर कूलर्स या पानी की बोतलें नहीं होती थीं। पुराने मेले में पेयजल का एकमात्र साधन ‘श्याम कुंड’ और मंदिर के आस-पास बने कुएं व प्राचीन बावड़ियां थीं। स्थानीय ग्रामीण और स्वयंसेवक बड़े-बड़े मिट्टी के मटकों (प्याऊ) में पानी भरकर रखते थे। इसके अलावा, पैदल यात्रियों को रास्ते में ‘राबड़ी’ और ‘कच्ची छाछ’ पिलाई जाती थी, जो गर्मी में डिहाइड्रेशन से बचाती थी।
आज़ादी से पहले खाटू मेले में सुरक्षा और कानून-व्यवस्था कौन संभालता था?
अंग्रेजों के जमाने में खाटू धाम का क्षेत्र जयपुर रियासत (Jaipur State) के प्रशासनिक नियंत्रण में आता था। मेले के दौरान सुरक्षा की जिम्मेदारी जयपुर के महाराजा के सैनिकों, स्थानीय जागीरदारों और राजपूत योद्धाओं की होती थी। वे घोड़ों और ऊंटों पर सवार होकर पूरे मेला क्षेत्र और रींगस से खाटू के रास्ते पर गश्त (पहरा) करते थे ताकि चोर-डाकुओं से श्रद्धालुओं की रक्षा की जा सके।
पुराने समय में खाटू श्याम जी के भोग (प्रसाद) में क्या चढ़ाया जाता था?
आज बाबा श्याम को आधुनिक मिठाइयां, मावे के पेड़े और छप्पन भोग चढ़ाए जाते हैं। लेकिन 200-300 साल पहले मेले में बाबा श्याम को मुख्य रूप से शुद्ध गाय के घी से बना चूरमा, मिश्री-माखन और बाजरे की रोट (रोटी) का भोग लगाया जाता था। शेखावाटी के स्थानीय लोग अपने घरों से बाजरे का रोट और घी-बूरा बनाकर लाते थे और बाबा को अर्पित करते थे।
पुराने लक्खी मेले में ‘चंग और धमाल’ परंपरा का क्या महत्व था?
पुराने जमाने में मनोरंजन या लाउडस्पीकर नहीं होते थे, इसलिए होली और फाल्गुन मेले के दौरान ‘चंग’ (एक प्रकार का वाद्य यंत्र) बजाकर ‘धमाल’ (पारंपरिक होली गीत) गाने की परंपरा शुरू हुई। शेखावाटी के पुरुष टोलियां बनाकर रात भर मिट्टी के धोरों पर अलाव जलाकर धमाल गाते थे। इन गीतों में बाबा श्याम की महिमा और उनके कलयुग के राजा बनने का वर्णन होता था, जो आज भी मेले का मुख्य आकर्षण है।
पुराने समय में खाटू मेले के दौरान रात को श्रद्धालु कहाँ ठहरते थे?
आज की तरह पहले आलीशान होटल, धर्मशालाएँ या गेस्ट हाउस नहीं हुआ करते थे। पुराने मेले में आने वाले श्रद्धालु खुले आसमान के नीचे रेत के धोरों (टीलों) पर, पेड़ों की छाँव में या अपने साथ लाए गए कपड़ों के तंबुओं (डेरों) में ठहरते थे। मारवाड़ी सेठ और संपन्न यात्री स्थानीय जागीरदारों की हवेलियों के खुले आँगनों या मंदिर परिसर के आस-पास की खुली जगहों पर अपना पड़ाव डालते थे।
आजादी से पहले खाटू श्याम मेले में व्यापार और हाट-बाज़ार का स्वरूप कैसा था?
पुराने जमाने का लक्खी मेला सिर्फ भक्ति का ही नहीं, बल्कि शेखावाटी के सबसे बड़े व्यापारिक केंद्रों में से एक था। मेले में ‘हाट-बाज़ार’ (साप्ताहिक बाज़ार) लगता था, जहाँ ऊंटों और घोड़ों का व्यापार होता था। इसके अलावा पीतल के बर्तन, हाथ से बुने हुए पारंपरिक वस्त्र, राजस्थानी कसीदाकारी का सामान और खेती-किसानी के औजार बेचने दूर-दराज से व्यापारी आते थे। लोग सालभर की ज़रूरतों का सामान इसी मेले से खरीदते थे।
पुराने लक्खी मेले में ‘नारियल चढ़ाने’ की परंपरा क्यों और कैसे शुरू हुई?
खाटू श्याम जी को नारियल (श्रीफल) अर्पित करने की परंपरा सदियों पुरानी है। पुराने समय में जब भक्त कठिन और जोखिम भरे रास्तों से अपनी यात्रा पूरी करके सकुशल मंदिर पहुँचते थे, तो वे बाबा के चरणों में कृतज्ञता और समर्पण के रूप में नारियल चढ़ाते थे। नारियल को ‘शीश’ (सिर) का प्रतीक भी माना जाता है, जो बर्बरीक के महान शीश-दान की याद दिलाता है। पुराने समय में मन्नत पूरी होने पर लाल कपड़े में लपेटकर नारियल चढ़ाने का विशेष नियम था।
आज़ादी से पहले खाटू मेले में ‘भंडारे’ (लंगर) का स्वरूप कैसा होता था?
पुराने जमाने में आज की तरह आधुनिक टेंट, कैटरिंग या छप्पन भोग के विशाल लंगर नहीं चलते थे। उस दौर में मारवाड़ और शेखावाटी के बड़े-बड़े भामाशाह (सेठ) मेले में ‘सदाव्रत’ (कच्चा राशन वितरण) चलाते थे। दूर-दराज से आने वाले साधु-संतों और गरीब श्रद्धालुओं को आटा, दाल, घी और गुड़ जैसी सूखी भोजन सामग्री बांटी जाती थी। श्रद्धालु रेत के धोरों पर पत्थरों का चूल्हा बनाकर खुद लकड़ी की आग पर ‘बाटी और चूरमा’ तैयार करते थे, जिसे पूरा जत्था एक साथ बैठकर बड़े प्रेम से प्रसाद के रूप में ग्रहण करता था।
खाटू श्याम जी के प्राचीन मेले का ‘फाग उत्सव’ (होली मिलन) कैसे मनाया जाता था?
खाटू का लक्खी मेला फाल्गुन मास में होली के ठीक पहले आयोजित होता है। आज़ादी से पहले का फाग उत्सव पूरी तरह से प्राकृतिक और शुद्ध रंगों पर आधारित होता था। टेसू (पलाश) के फूलों को पानी में उबालकर केसरिया रंग तैयार किया जाता था। इसके अलावा शुद्ध चंदन के पाउडर और अबीर-गुलाल से होली खेली जाती थी। जयपुर रियासत के समय शाही दरबार के नर्तक और स्थानीय लोक कलाकार मंदिर के चौक में आकर बाबा श्याम के सामने विशेष राजस्थानी ‘गीदड़ नृत्य’ और ‘चंग-धमाल’ की प्रस्तुतियां देते थे।
खाटू श्याम की कृपा आप पर सदा बनी रहे सा। जय श्री श्याम।


