“बाबा रामदेव जी के बड़े भाई वीरमदेव जी का रहस्य: क्यों अधूरी रहती है उनके बिना रामदेवरा की यात्रा?”

क्या आप जानते हैं बाबा रामदेव जी के बड़े भाई वीरमदेव जी कौन थे? जानिए उनकी चमत्कारी जन्म कथा, इतिहास और क्यों उनके दर्शन के बिना रामदेवरा की यात्रा अधूरी मानी जाती है!

वीरमदेव जी कौन थे? (Who was Viramdev Ji)

वीरमदेव जी पोकरण और रामदेवरा क्षेत्र के शासक अजमाल जी तंवर और माता मैणादे के बड़े पुत्र थे। वे लोक देवता बाबा रामदेव जी के सगे बड़े भाई थे। इतिहास और लोक मान्यताओं के अनुसार, वीरमदेव जी का स्वभाव बेहद शांत, गंभीर और न्यायप्रिय था। उन्होंने अपने छोटे भाई रामदेव जी के हर सामाजिक और धार्मिक कार्य में उनका पूरा साथ दिया था।

वीरमदेव जी की जन्म कथा: किसका अवतार थे?

राजस्थानी लोक कथाओं के अनुसार, राजा अजमाल जी संतानहीन थे, जिसके कारण उन्हें समाज के ताने सुनने पड़ते थे। वे संतान प्राप्ति की गुहार लेकर द्वारिका (गुजरात) गए और भगवान कृष्ण की भक्ति की।

भगवान कृष्ण ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें वचन दिया कि वे स्वयं उनके घर पुत्र रूप में जन्म लेंगे।

बलराम जी का अवतार: भगवान कृष्ण के आने से पहले, शेषनाग के अंश भगवान बलराम ने माता मैणादे के गर्भ से बड़े पुत्र के रूप में जन्म लिया, जिन्हें वीरमदेव नाम दिया गया।

बाबा रामदेव कृष्ण का अवतार: इसके कुछ समय बाद स्वयं भगवान कृष्ण छोटे भाई के रूप में अवतरित हुए, जिन्हें हम बाबा रामदेव जी (रामसा पीर) के नाम से पूजते हैं।यही कारण है कि भजनों में हमेशा गाया जाता है— “बड़ा वीरमदेव, छोटा रामदेव।”

रामदेव जी और वीरमदेव जी का अटूट भ्रातृ प्रेम

बचपन से ही दोनों भाइयों में अगाध प्रेम था। वीरमदेव जी उम्र में बड़े थे, लेकिन वे जानते थे कि रामदेव जी साक्षात ईश्वर का रूप हैं।भक्ति और साथ: वीरमदेव जी ने कभी छोटे भाई से ईर्ष्या नहीं की, बल्कि रामदेव जी द्वारा चलाए गए ‘कामड़िया पंथ’ और छुआछूत मिटाने के अभियानों में हमेशा उनके मार्गदर्शक और रक्षक बनकर साथ खड़े रहे।वीरता: वीरमदेव जी एक कुशल योद्धा भी थे। उन्होंने उस दौर में क्षेत्र के लोगों को लुटेरों और अत्याचारियों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

वीरमदेव जी का मंदिर (Viramdev Ji Temple, Ramdevra)

जब बाबा रामदेव जी ने जीवित समाधि लेने का निर्णय किया, तो वीरमदेव जी इस विछोह को सहन नहीं कर पाए। रामदेव जी के समाधि लेने के कुछ समय बाद ही वीरमदेव जी ने भी अपने प्राण त्याग दिए।

कहाँ है मंदिर?: मुख्य रामदेवरा मंदिर (जैसलमेर) के परिसर में ही बाबा रामदेव जी की समाधि के पास वीरमदेव जी का भी पवित्र स्थान (डेरु/समाधि) बना हुआ है।

दर्शन का नियम: रामदेवरा आने वाले श्रद्धालु जानते हैं कि बाबा रामदेव जी के दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाते, जब तक वे बड़े भाई वीरमदेव जी के चरणों में शीश नहीं नवाते।

वीरमदेव जी और बाबा रामदेव जी दड़ियो (गेंद) खेलने की कथा और भजन

दड़ियो रमवा (गेंद खेलने) का प्रसंग बाबा रामदेव जी और उनके बड़े भाई वीरमदेव जी के बचपन की एक दिव्य और अलौकिक घटना है। लोक कथाओं के अनुसार, एक बार दोनों भाई खेल-खेल में गेंद को एक गहरे और सुदूर कुएं (या बावड़ी) में गिरा देते हैं। वीरमदेव जी जब गेंद निकालने की चिंता करते हैं, तब बालक रामदेव जी अपने दिव्य रूप का परिचय देते हैं।

वे कुएं के भीतर जाकर न केवल गेंद वापस लाते हैं, बल्कि पाताल लोक में छिपे नागों का दमन कर अपनी चमत्कारी शक्तियों (परचा) का पहला आभास कराते हैं। इस घटना को दर्शाने वाला भजन “दड़ियो रमवा जावे रे, बड़ा वीरमदेव छोटा रामदेव” राजस्थान में अत्यंत लोकप्रिय है, जो दोनों भाइयों के अटूट प्रेम और उनकी ईश्वरीय शक्तियों (श्रीकृष्ण-बलराम अवतार) को जीवंत करता है।

लोक मान्यताओं के अनुसार, वीरमदेव जी और बाबा रामदेव जी का अपनी बहनों लाछा बाई और सुगना बाई से अगाध स्नेह था। तंवर राजवंश के इस परिवार में भाई-बहन का रिश्ता अटूट प्रेम, सम्मान और सुरक्षा की मिसाल माना जाता है।

जब सुगना बाई का विवाह पुंगलगढ़ के राव परिहार के साथ हुआ, तब दोनों भाइयों ने अपनी लाडली बहन को विदा किया था। लोक कथाओं के अनुसार, बहन सुगना के जीवन में आने वाले संकटों और दुखों को दूर करने के लिए दोनों भाइयों ने हमेशा अपनी चमत्कारी शक्तियों (परचा) से उनकी रक्षा की। आज भी मारवाड़ के लोक भजनों में वीरमदेव जी और रामदेव जी द्वारा अपनी बहनों के प्रति निभाए गए भाई के धर्म और स्नेह को बड़े चाव से गाया और सर्च किया जाता है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top