मामा भांजा मंदिर डूंगरपुर का इतिहास, अद्भुत वास्तुकला और प्रसिद्ध रथोत्सव की पूरी जानकारी। वागड़ पर्यटन की अनमोल धरोहर का सच जानें।
मामा भांजा मंदिर डूंगरपुर इतिहास
राजस्थान के डूंगरपुर जिले में स्थित ‘मामा भांजा’ मंदिर एक ऐतिहासिक और पवित्र दिगंबर जैन मंदिर है, जो भगवान मल्लीनाथ और भगवान नेमिनाथ को समर्पित है। इस मंदिर की वास्तुकला अत्यंत अद्भुत है। लोक मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण एक मामा और उनके भांजे ने मिलकर मात्र एक ही रात में किया था, जिसके कारण इसका नाम ‘मामा भांजा मंदिर’ पड़ा। यह मंदिर डूंगरपुर के घाटी मोहल्ले में स्थित है और स्थापत्य कला की दृष्टि से अपनी अनूठी पहचान रखता है। हर वर्ष यहां आयोजित होने वाला पारंपरिक रथोत्सव और धार्मिक मेले दूर-दूर से पर्यटकों तथा जैन श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं।
डूंगरपुर रथोत्सव मामा भांजा मंदिर
डूंगरपुर का ऐतिहासिक रथोत्सव लगभग 400 से 700 वर्षों की प्राचीन परंपरा को समेटे हुए है। इस भव्य धार्मिक उत्सव में लकड़ी (काष्ठ) से निर्मित आकर्षक रथों के भ्रमण की अनूठी सांस्कृतिक परंपरा है। शहर में निकलने वाले कुल तीन प्राचीन रथों में से सबसे पहला और मुख्य रथ ऐतिहासिक ‘मामा-भांजा’ दिगंबर जैन मंदिर से ही प्रस्थान करता है। इस विशेष रथ में भगवान मल्लीनाथ और भगवान नेमीनाथ की पवित्र प्रतिमाएं विराजित होती हैं। धार्मिक भाईचारे और अगाध श्रद्धा के प्रतीक इस मेले में हजारों जैन श्रद्धालु भाग लेते हैं और भगवान की प्रतिमा के सम्मुख पारंपरिक रूप से आम की बौर (मंजरियां) अर्पित की जाती हैं।
“डूंगरपुर रथोत्सव कब मनाया जाता है?”:
डूंगरपुर का ऐतिहासिक जैन रथोत्सव प्रतिवर्ष भाद्रपद मास में दिगंबर जैन समाज के ‘दस लक्षण पर्व’ (पर्यूषण पर्व) के समापन पर मनाया जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, यह भव्य धार्मिक उत्सव मुख्य रूप से सितंबर महीने में आयोजित होता है।यह उत्सव लगातार तीन दिनों तक अत्यंत धूमधाम से चलता है। उत्सव के पहले दिन, प्रसिद्ध मामा-भांजा (घाटी) जैन मंदिर से भगवान मल्लीनाथ और नेमिनाथ का सदियों पुराना काष्ठ (लकड़ी) का ऐतिहासिक रथ सबसे पहले रवाना होता है। इसके बाद शहर के अन्य प्राचीन जैन रथ इसमें शामिल होते हैं। तीन दिनों तक पूरा डूंगरपुर शहर और मुख्य रूप से गेपसागर की पाल भक्तिमय सांस्कृतिक कार्यक्रमों, पारंपरिक गैर तथा गरबा-डांडिया नृत्य की गूंज से सराबोर रहता है।
डूंगरपुर के श्री मल्लीनाथ नेमिनाथ ‘मामा भांजा’ दिगंबर जैन मंदिर की वास्तुकला
डूंगरपुर का मामा-भांजा दिगंबर जैन मंदिर वागड़ शैली और नागर स्थापत्य कला का बेजोड़ संगम है। इसके पारंपरिक गर्भगृह में भगवान मल्लीनाथ और नेमिनाथ की पाषाण प्रतिमाएं विराजित हैं। मंदिर के भव्य स्तंभों और मेहराबों पर स्थानीय सफेद पत्थरों व संगमरमर से बारीक जैन प्रतीकों की उत्कृष्ट नक्काशी की गई है। इसके ऊंचे शिखर, हवादार सभा मंडप और सादगीपूर्ण प्रांगण की संरचना इस तरह की गई है कि वार्षिक रथोत्सव के समय विशाल लकड़ी के पारंपरिक रथों को यहाँ से आसानी से निकाला और घुमाया जा सके।
“मामा-भांजा की छतरी और मामा-भांजा की मजार कहां है?”
मामा-भांजा की छतरी: यह जोधपुर के प्रसिद्ध मेहरानगढ़ दुर्ग में स्थित है। इसे ‘धन्ना-भींवा की छतरी’ के नाम से भी जाना जाता है। यह धन्ना और भींवा नाम के दो वीर मामा-भांजा की वीरता और बलिदान की याद में बनाई गई थी।
मामा-भांजा की मजार: यह हनुमानगढ़ जिले के पल्लू नामक स्थान पर स्थित है। इसके अतिरिक्त, हनुमानगढ़ के ही ऐतिहासिक भटनेर दुर्ग में मामा-भांजा की प्रसिद्ध दरगाह/मजार भी बनी हुई है।
क्या मामा भांजा मंदिर डूंगरपुर में दोनों तीर्थंकरों (मल्लीनाथ जी और नेमिनाथ जी) की मूर्तियां अलग-अलग हैं?
हाँ, श्री मल्लीनाथ नेमिनाथ-मामा भंज दिगंबर जैन मंदिर के गर्भगृह में जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर भगवान मल्लीनाथ जी और 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी की अलग-अलग और अत्यंत मनमोहक प्रतिमाएं स्थापित हैं।
कलात्मक दृष्टि से इन दोनों मूर्तियों को मामा और भांजा के प्रतीक स्वरूप एक ही परिसर में पूजनीय स्थान दिया गया है। दिगंबर जैन परंपरा के अनुसार इन प्रतिमाओं का निर्माण बेहद शुद्ध संगमरमर या विशेष पत्थरों से शांत ध्यान मुद्रा (पद्मासन या कायोत्सर्ग) में किया गया है। मंदिर आने वाले श्रद्धालु इन दोनों वेदियों के समक्ष अलग-अलग दर्शन कर अपनी आध्यात्मिक मन्नतें मांगते हैं और जैन दर्शन के अहिंसा और त्याग के मार्ग की प्रेरणा लेते हैं।
स्थानीय लोक मान्यताओं के अनुसार मामा भांजा मंदिर के साथ ‘मामा और भांजे’ के रिश्ते की क्या कहानी जुड़ी है?
स्थानीय वागड़ अंचल की लोककथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में इस क्षेत्र में दो बेहद कुशल और सिद्ध हस्तशिल्पी (कारीगर) रहा करते थे, जो रिश्ते में आपस में सगे मामा और भांजे थे। इन दोनों को इस भव्य जैन मंदिर के निर्माण की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मंदिर के निर्माण के दौरान दोनों कारीगरों के बीच अपनी कला को सर्वश्रेष्ठ साबित करने की एक स्वस्थ और कलात्मक प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई। दोनों ने मिलकर मंदिर के विभिन्न हिस्सों, जैसे स्तंभों और तोरण द्वारों पर अपनी सर्वश्रेष्ठ नक्काशी उकेरी। उनके इसी अद्भुत पारिवारिक सहयोग और कलात्मक समर्पण के कारण स्थानीय समाज ने इस धार्मिक स्थल का नाम हमेशा के लिए ‘मामा भांजा मंदिर’ रख दिया।
मामा भांजा मंदिर अटरू बारां और डूंगरपुर
राजस्थान के अटरू (बारां) और बड़ोद (डूंगरपुर) दोनों स्थानों पर प्रसिद्ध “मामा-भांजा मंदिर” स्थित हैं, जो राज्य की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर का अहम हिस्सा हैं:
अटरू (बारां) का मामा भांजा मंदिर: यह ऐतिहासिक मंदिर बारां जिले के अटरू कस्बे में स्थित है। यह अपनी प्राचीन नागर शैली की उत्कृष्ट वास्तुकला और पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी के लिए जाना जाता है।
बड़ोद (डूंगरपुर) का मामा भांजा मंदिर: यह डूंगरपुर जिले के बड़ोद में स्थित एक पवित्र दिगंबर जैन मंदिर है, जिसे “श्री मल्लीनाथ नेमिनाथ मामा-भांजा मंदिर” कहा जाता है। डूंगरपुर के पारंपरिक रथोत्सव में सबसे पहला रथ इसी मंदिर से रवाना करने की अनूठी धार्मिक परंपरा है।
मामा भांजा का महल झालावाड़
झालावाड़ का “मामा-भांजा महल” हाड़ौती अंचल की एक अनूठी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर है:यह महल अपनी बेहतरीन वास्तुकला, प्राचीन कारीगरों की बेजोड़ शिल्पकला और स्थानीय लोक-कथाओं के लिए प्रसिद्ध है। राजस्थान सामान्य ज्ञान (Rajasthan GK) की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण इस स्थल के पास ही झालावाड़ शहर में एक ‘मामा-भांजा सर्कल’ और ऐतिहासिक मजार (दरगाह) भी स्थित है, जहाँ हर साल भव्य उर्स का आयोजन होता है। यह पूरी जगह प्राचीन काल के दो कुशल कारीगरों (मामा और भांजे) के आपसी तालमेल और कलात्मक समर्पण की कहानी बयां करती है।
राजस्थान के प्रसिद्ध मामा भांजा स्थल
राजस्थान में ‘मामा’ और ‘मामा-भांजा’ से जुड़े कई महत्वपूर्ण स्थल एवं सांस्कृतिक तथ्य प्रसिद्ध हैं। मेहरानगढ़ (जोधपुर) में स्थित मामा भांजा की छतरी और भटनेर दुर्ग (हनुमानगढ़) में स्थित मामा भांजा की दरगाह ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अत्यंत प्रसिद्ध हैं। धार्मिक स्थलों की बात करें तो मामा भांजा का मंदिर फूलदेवरा (अटरू, बारां) में स्थित है, जबकि मामा देव कुण्ड व मामादेव मंदिर कुम्भलगढ़ किला (राजसमंद) में बना हुआ है।
लोक संस्कृति और आस्था के क्षेत्र में, जालौर के हरजी गाँव में मिट्टी से मामाजी के घोड़े बनाए जाते हैं। लोक देवता मामा देव को बरसात के देवता के रूप में पूजा जाता है; इनके पूजा स्थल पर कोई मूर्ति नहीं होती, बल्कि मूर्ति के स्थान पर लकड़ी का तोरण स्थापित होता है। इसके अलावा, धार्मिक तीर्थों में अजमेर के पुष्कर को ‘तीर्थों का मामा’ कहा जाता है।
मामा भांजा की डूंगरी
“मामा-भांजा की डूंगरी” राजस्थान के दौसा जिले में स्थित एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक और भौगोलिक पहाड़ी स्थल है:दौसा जिले में स्थित यह डूंगरी (स्थानीय भाषा में पहाड़ी) अपनी विशेष भौगोलिक बनावट और लोक-कथाओं के लिए जानी जाती है।
धन्ना भीयां की छतरी मेहरानगढ़ जोधपुर
जोधपुर के ऐतिहासिक मेहरानगढ़ दुर्ग में लोहापोल के पास स्थित “धन्ना भीयां की छतरी” शौर्य, त्याग और स्वामीभक्ति का एक अमर प्रतीक है:इसे राजस्थान के सांस्कृतिक इतिहास में “मामा-भांजा की छतरी” के नाम से भी जाना जाता है। लाल बलुआ पत्थर से निर्मित 10 खंभों की यह भव्य छतरी वीर धन्ना गहलोत और उनके भांजे भीयां चौहान की याद में बनाई गई थी। इन दोनों जांबाज योद्धाओं ने अपने राजा और मातृभूमि के प्रति अटूट निष्ठा दिखाते हुए युद्ध के मैदान में वीरगति प्राप्त की थी। उनकी इसी बेजोड़ स्वामीभक्ति और सर्वोच्च बलिदान से प्रभावित होकर, जोधपुर के तत्कालीन महाराजा अजीत सिंह ने इस सुंदर स्मारक का निर्माण करवाया था।
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