राजस्थान की मरुभूमि में थार रेगिस्तान के बीचो-बीच स्थित जैसलमेर का किला (Jaisalmer Fort) भारत के सबसे भव्य और ऐतिहासिक किलों में से एक है। इस किले को ‘सोनार किला’ या ‘गोल्डन फोर्ट’ भी कहा जाता है, क्योंकि पीले बलुआ पत्थरों (Yellow Sandstone) से बना यह किला सूरज की किरणें पड़ते ही सोने की तरह चमकने लगता है।
जैसलमेर के किले का इतिहास (History of Jaisalmer Fort)
इस किले की स्थापना 1156 ईस्वी में भाटी राजपूत राजा रावल जैसल ने की थी। इससे पहले भाटी वंश की राजधानी ‘लोद्रवा’ (Lodurva) में थी, जो सुरक्षा के लिहाज से कमजोर थी। राजा जैसल ने सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए 80 मीटर ऊंची त्रिकुटा पहाड़ी पर इस नए किले की नींव रखी और अपने नाम पर इस शहर का नाम ‘जैसलमेर’ रखा।यह किला दिल्ली, गुजरात और मध्य एशिया के व्यापारिक मार्गों के केंद्र में था, जिसके कारण इस पर कई आक्रमण भी हुए।
जैसलमेर के किले के तीन प्रसिद्ध जौहर (Three Jauhars of Jaisalmer)
पहला जौहर (13वीं सदी): अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय, जब राजपूत वीरांगनाओं ने अग्नि में आत्मदाह किया।
दूसरा जौहर (14वीं सदी): फिरोज शाह तुगलक के हमले के दौरान।
तीसरा अर्ध-जौहर (16वीं सदी): कंधार के अमीर अली के विश्वासघात के कारण हुआ। इसमें राजपूत वीरों ने केसरिया तो किया, लेकिन महिलाओं को जौहर (अग्नि कुंड) का समय नहीं मिला, इसलिए इसे ‘आधा जौहर’ कहा जाता है।
जैसलमेर किला का सोनार किला’ नाम कैसे पड़ा? (Why is it called Sonar Quila?)
दोपहर के समय जब थार रेगिस्तान की तेज धूप इन पीले पत्थरों पर पड़ती है, तो यह पूरा किला सोने (Gold) जैसा चमकता है। भारत के महान फिल्म निर्देशक सत्यजीत रे ने इस किले पर आधारित एक रहस्यमयी उपन्यास और फिल्म बनाई थी, जिसका नाम था ‘सोनार केल्ला’ (The Golden Fortress)। तब से यह नाम पूरी दुनिया में मशहूर हो गया।
जैसलमेर किले के प्रमुख आकर्षण (Top Places to See Inside Jaisalmer Fort)
अखो परोल (Akhey Prole): यह किले का मुख्य प्रवेश द्वार है। इसके अलावा हवा प्रोत, गणेश प्रोत और भूता प्रोत भी मुख्य द्वार हैं।
राज महल (Maharawal Palace): यह राजा और रानी का मुख्य निवास स्थान था। इसकी नक्काशीदार खिड़कियां और झरोखे बेहद खूबसूरत हैं। अब इसे एक म्यूजियम में बदल दिया गया है।
जैन मंदिर (Jain Temples): किले के अंदर 12वीं से 15वीं शताब्दी के बीच बने 7 शानदार जैन मंदिर हैं। ये मंदिर अपनी बारीक नक्काशी और दिलवाड़ा शैली की वास्तुकला के लिए जाने जाते हैं।
लक्ष्मीनाथ मंदिर (Laxminath Temple): यह मंदिर भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को समर्पित है, जो जैसलमेर के शासकों के कुलदेवता माने जाते हैं।
कैनन पॉइंट (Dashera Chowk & Cannon): यहाँ से पूरे जैसलमेर शहर का 360-डिग्री व्यू दिखाई देता है। यहाँ रखी प्राचीन तोप पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है।
जैसलमेर किला कहां स्थित है
जैसलमेर का किला भारत के राजस्थान राज्य के जैसलमेर शहर में स्थित है ।
सोनार किला (जैसलमेर का किला), जैसलमेर जिला, राजस्थान]। यह किला थार रेगिस्तान के बीचो-बीच ‘त्रिकुटा पहाड़ी’ (Trikuta Hill) पर बना हुआ है, जिसे स्थानीय स्तर पर ‘गोरहरा पहाड़ी’ भी कहा जाता है।
रेलवे स्टेशन से दूरी: यह जैसलमेर रेलवे स्टेशन से मात्र 2 से 3 किलोमीटर की दूरी पर है, जहाँ से ऑटो या टैक्सी आसानी से मिल जाती है।
सड़क मार्ग: यह जोधपुर से लगभग 280 किलोमीटर और जयपुर से करीब 570 किलोमीटर दूर है।
जैसलमेर फोर्ट हॉरर स्टोरी (Jaisalmer fort horror story): क्या जैसलमेर के किले में कोई भूतिया रहस्य है?
नहीं, जैसलमेर का किला बिल्कुल भी भूतिया या डरावना नहीं है।यह दुनिया का एकमात्र ‘लिविंग फोर्ट’ है, जहाँ आज भी 4,000 से अधिक लोग चौबीसों घंटे रहते हैं। यहाँ कैफे, होटल और बाजार हमेशा गुलजार रहते हैं।
जैसलमेर के किले में रात को आवाजें
जैसलमेर के किले में रात को सुनाई देने वाली तथाकथित रहस्यमयी आवाजें पूरी तरह से थार की हवाओं का भूगोल, तापमान का उतार-चढ़ाव और इंसान के मन का डर हैं। इनका किसी भी तरह की आत्मा या अदृश्य सैनिकों से कोई लेना-देना नहीं है।
‘टिलोन-की-पोल’ का शाप और जैसलमेर का किला (The Legend of Tilon-ki-Pol)
किले के द्वारों में से एक, टिलोन-की-पोल, को लेकर एक कहानी है। टिलोन एक प्रसिद्ध शाही नर्तकी (वेश्या) थी, जिसने राजा की अनुमति के बिना इस भव्य गेट का निर्माण करवाया था। राजा इस बात से बेहद नाराज हुए और उन्होंने इसे तोड़ने का आदेश दिया। खुद को बचाने के लिए टिलोन ने गेट के शीर्ष पर एक मंदिर स्थापित करवा दिया, जिससे राजा उसे तोड़ न सके। माना जाता है कि इस द्वार से गुजरते समय एक अजीब, रहस्यमयी सम्मोहन या खिंचाव महसूस होता है
यह सम्मोहन असल में वास्तुकला का मनोवैज्ञानिक प्रभाव है। गेट की विशालता, बारीक नक्काशी और तंग रास्ता पर्यटकों को एकाग्र (Focus) कर देता है। शाही नर्तकी की अनूठी कहानी जानने के बाद हमारा दिमाग वहां रहस्य तलाशने लगता है, जिसे लोग सम्मोहन समझ लेते हैं। यह कोई जादुई खिंचाव नहीं है।
क्या जैसलमेर किले को देखने के लिए टिकट (Ticket) लेना अनिवार्य है?
जैसलमेर किले के भीतर प्रवेश करने, इसकी मुख्य गलियों में घूमने, बाज़ारों को देखने और कैफे में जाने के लिए कोई टिकट नहीं लगता है, क्योंकि यह एक खुला हुआ आवासीय शहर है। हालांकि, यदि आप किले के भीतर स्थित मुख्य राज महल (Royal Palace Museum) को करीब से देखना चाहते हैं, तो भारतीयों के लिए ₹50 और विदेशी नागरिकों के लिए ₹250 का टिकट अनिवार्य है। इसके अलावा, किले के भीतर बने ऐतिहासिक जैन मंदिरों को देखने के लिए भी स्थानीय ट्रस्ट द्वारा एक छोटा सा अलग प्रवेश शुल्क लिया जाता है।
जैसलमेर फोर्ट रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड से कितनी दूर है और वहाँ कैसे पहुँचें?
जैसलमेर किला मुख्य शहर के केंद्र में स्थित है। यह जैसलमेर रेलवे स्टेशन से लगभग 2 किलोमीटर और मुख्य बस स्टैंड से महज 1.5 किलोमीटर की दूरी पर है। रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड से उतरते ही आपको किले के लिए आसानी से स्थानीय ऑटो-रिक्शा, ई-रिक्शा या प्राइवेट टैक्सियाँ मिल जाती हैं, जो आपको 5 से 10 मिनट में किले के पहले मुख्य प्रवेश द्वार (अखे पोल) तक पहुँचा देती हैं। किले के पास पर्याप्त पार्किंग स्पेस भी है, जहाँ आप अपनी गाड़ियाँ पार्क कर सकते हैं।
जैसलमेर किले के संरक्षण के लिए काम करने वाला ‘फॉलो द गोल्डन फोर्ट’ (Save the Fort) अभियान क्या है?
किले की गिरती हुई दीवारों और पानी के रिसाव से होने वाले नुकसान को देखते हुए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई संरक्षण अभियान चलाए गए हैं। इनमें ‘इंटरनेशनल वर्ल्ड मॉन्यूमेंट्स फंड’ (WMF) और स्थानीय नागरिक समितियों द्वारा चलाया गया ‘सेव द फोर्ट’ अभियान सबसे प्रमुख है। इसके तहत दुनिया भर के पर्यटकों और विशेषज्ञों से फंड जुटाकर किले की सबसे कमजोर दीवारों की मरम्मत की गई और स्थानीय लोगों को पानी के विवेकपूर्ण इस्तेमाल के लिए जागरूक किया गया। यूनेस्को की गाइडलाइंस के तहत इस अमूल्य धरोहर को बचाने के लिए वर्तमान में भी कई कड़े नियम लागू हैं।
जैसलमेर किले के भीतर स्थित ‘गुप्त जल निकासी नलिकाएं’ (Secret Water Channels) क्या हैं?
प्राचीन काल में घेराबंदी या युद्ध के दौरान किले के भीतर पानी की बर्बादी को रोकने और गंदे पानी को बाहर निकालने के लिए पत्थरों के नीचे एक गुप्त और ढकी हुई ड्रेनेज प्रणाली (Underground Channels) बनाई गई थी। इन नलिकाओं को इस तरह तराशा गया था कि बारिश का साफ पानी अलग रास्तों से होकर सीधे भूमिगत कुओं में जमा होता था, जबकि रसोई और नहाने का इस्तेमाल किया हुआ पानी किले की ढलान से होता हुआ बिना दीवारों को नुकसान पहुँचाए नीचे चला जाता था। आज के समय में प्लास्टिक और आधुनिक कचरे के फंसने के कारण ये प्राचीन नलिकाएं बंद हो चुकी हैं, जो चिंता का विषय है।
क्या जैसलमेर किले की वास्तुकला का ‘खगोल विज्ञान’ (Astronomy) या दिशाओं से कोई संबंध है?
: हाँ, जैसलमेर किले का निर्माण प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला और खगोलीय गणनाओं को ध्यान में रखकर किया गया था। किले के मुख्य महलों और झरोखों की दिशा इस तरह तय की गई है कि साल के सबसे लंबे दिन (Summer Solstice) और सबसे छोटे दिन (Winter Solstice) पर सूरज की पहली किरण सीधे महाराजा के मुख्य सिंहासन कक्ष और कुलदेवी के मंदिर के गर्भगृह को स्पर्श करती है। इसके अतिरिक्त, किले के ऊंचे बुर्ज रात के समय थार रेगिस्तान के साफ आसमान में तारों, नक्षत्रों और ध्रुव तारे (Pole Star) की स्थिति देखने के लिए प्राचीन काल में वेधशाला (Observatory) के रूप में भी उपयोग किए जाते थे।
सत्यजीत रे के अलावा किन अन्य बड़ी फिल्मों की शूटिंग जैसलमेर किले में हुई है?
अपनी भव्यता और सुनहरी वास्तुकला के कारण जैसलमेर का किला बॉलीवुड और हॉलीवुड निर्देशकों का पसंदीदा स्पॉट रहा है। यहाँ प्रसिद्ध बंगाली फिल्म ‘सोनार केल्ला’ के अलावा, बॉलीवुड की ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘बॉर्डर’ (Border), ‘कच्चे धागे’ (Kachche Dhaage), और मरुस्थलीय पृष्ठभूमि पर बनी हॉलीवुड फिल्म ‘द फॉल’ (The Fall) के कई महत्वपूर्ण दृश्य फिल्माए गए हैं। किले की संकरी गलियां, दशहरा चौक और ऊंचे बुर्ज फिल्मों में पारंपरिक राजपूताना संस्कृति और रहस्यमयी माहौल दिखाने के लिए सबसे बेहतरीन लाइव सेट का काम करते हैं, जिससे यहाँ का फिल्म पर्यटन भी काफी बढ़ा है।
1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध (Indo-Pak Wars) के दौरान जैसलमेर किले की क्या भूमिका थी?
भारत-पाकिस्तान सीमा के करीब होने के कारण, 1965 और 1971 के युद्धों के दौरान जैसलमेर किले का सामरिक महत्व एक बार फिर बढ़ गया था। हवाई हमलों और बमबारी के खतरे को देखते हुए भारतीय सेना और स्थानीय प्रशासन ने सुरक्षा रणनीति के तहत पूरे किले को गीली मिट्टी और सूखी घास की मोटी परतों से ढक दिया था (Camouflage)। थार रेगिस्तान की मिट्टी से मेल खाने के कारण आसमान से उड़ने वाले दुश्मन के लड़ाकू विमानों को यह विशाल किला एक साधारण रेत का टीला दिखाई देता था। इस चतुर और पारंपरिक मरुस्थलीय तकनीक के कारण किला दुश्मनों की नजरों से पूरी तरह सुरक्षित रहा।
जैसलमेर रियासत के प्राचीन सिक्कों ‘अखेशाही’ (Akheshahi Coins) का जैसलमेर किले के व्यापार से क्या संबंध था
सिल्क रूट के सोने के व्यापारिक केंद्र के रूप में प्रसिद्ध जैसलमेर किले के भीतर ही शाही टकसाल (Mint) स्थित थी, जहाँ रियासत के अपने सिक्के ढाले जाते थे। इन सिक्कों को ‘अखेशाही सिक्के’ कहा जाता था, जिनकी शुरुआत महाराजा अखै सिंह के शासनकाल में हुई थी। ये सिक्के शुद्ध सोने, चांदी और तांबे के होते थे, जिन पर विशेष राजस्थानी और फारसी भाषा में राजचिह्न अंकित होते थे। मध्यकाल में मध्य-एशिया, फारस (ईरान) और भारत के अन्य राज्यों से आने वाले व्यापारी किले के भीतर बने व्यापारिक केंद्रों में इन्हीं अखेशाही सिक्कों के जरिए लेन-देन और कर (Tax) का भुगतान करते थे।
लिविंग फोर्ट इन इंडिया (Living Fort in India)
जैसलमेर का किला भारत का सबसे प्रसिद्ध और दुनिया का सबसे बड़ा कामकाजी ‘लिविंग फोर्ट’ है।आबादी: किले के भीतर आज भी शहर की लगभग 25 से 30 प्रतिशत आबादी (करीब 4,000 लोग) स्थायी रूप से निवास करती है।इतिहास: ये लोग मुख्य रूप से भाटी राजपूत शासकों के दरबारियों, ब्राह्मणों और सेवादारों के वंशज हैं, जिन्हें सदियों पहले किले के अंदर रहने की जगह दी गई थी। पीढ़ी-दर-पीढ़ी वे आज भी वहीं रह रहे हैं।
जैसलमेर किले के अंदर रुकना (Hotels & Stay Inside Fort)
जैसलमेर किले (लिविंग फोर्ट) के भीतर सदियों पुरानी हवेलियों और प्राचीन घरों को आज खूबसूरत हेरिटेज होटलों, गेस्ट हाउस और होमस्टे में बदल दिया गया है, जहाँ पर्यटकों के लिए रुकने की उत्तम व्यवस्था है। आप Agoda, MakeMyTrip या Booking.com जैसी लोकप्रिय ट्रैवल वेबसाइट्स पर जाकर “Jaisalmer Fort Inside” का फ़िल्टर चुनकर ऑनलाइन बुकिंग कर सकते हैं। यहाँ ₹1,500 प्रति रात वाले बजट होमस्टे से लेकर ₹10,000+ वाले आलीशान हेरिटेज कमरे आसानी से उपलब्ध हैं।
हालाँकि किले के अंदर रुकना एक लाइफटाइम एक्सपीरियंस है, लेकिन पर्यावरणविदों और पुरातत्व विभाग (ASI) का मानना है कि किले का 850 साल पुराना सीवरेज सिस्टम आधुनिक पानी की भारी खपत का दबाव नहीं झेल पा रहा है। पानी के इसी रिसाव के कारण किले की नींव और दीवारों को नुकसान पहुँच रहा है। इसलिए, इस ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित रखने के लिए जिम्मेदार पर्यटन (Responsible Tourism) के नाते विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि पर्यटक दिन में किले की खूबसूरती को निहारें, लेकिन ठहरने के लिए किले के ठीक बाहर स्थित होटलों को प्राथमिकता दें।
जैसलमेर किले की अंदर की लाइफस्टाइल (Inside Jaisalmer Fort Life)
जैसलमेर किले में आधुनिकता और राजस्थानी परंपरा का अनूठा संगम दिखता है। सुबह यहाँ की संकरी गलियाँ मंदिरों की घंटियों और स्कूली बच्चों की चहल-पहल से जाग उठती हैं। स्थानीय लोग रंग-बिरंगे बाज़ारों में हस्तशिल्प, चमड़े के बैग और आभूषण बेचते हैं। किले के बुर्जों पर बने रूफटॉप कैफे में पर्यटक इटैलियन पिज्जा और पारंपरिक दाल-बाटी-चूरमा का स्वाद लेते हुए थार मरुस्थल का खूबसूरत सनसेट निहारते हैं। 850 साल पुराना होने के बावजूद इस जीवित किले में बिजली, पानी और वाई-फाई जैसी सभी आधुनिक सुविधाएँ सुचारू रूप से मिलती हैं।
जैसलमेर के किले को ‘लिविंग फोर्ट’ क्यों कहा जाता है?
इसे ‘लिविंग फोर्ट’ इसलिए कहते हैं क्योंकि यह केवल देखने की जगह नहीं है। इस 850 साल पुराने किले के अंदर आज भी जैसलमेर की लगभग 25-30% आबादी (करीब 4,000 लोग) स्थायी रूप से रहती है, जिनकी यहाँ दुकानें, घर और होटल हैं।
जैसलमेर किला घूमने का सबसे अच्छा महीना कौन सा है?
यहाँ घूमने का सबसे बेस्ट समय अक्टूबर से मार्च के बीच का होता है। गर्मियों में (अप्रैल से सितंबर) यहाँ की गर्मी बहुत भयंकर होती है और तापमान 45°C के पार चला जाता है।
जैसलमेर के किले की अनूठी वास्तुकला (Architecture) की क्या विशेषताएं हैं?
जैसलमेर किले की सबसे बड़ी वास्तुकला विशेषता यह है कि इसके निर्माण में कहीं भी सीमेंट, चूने या गारे (Mortar) का उपयोग नहीं किया गया है। यह पूरा विशाल ढांचा पीले बलुआ पत्थरों को आपस में इंटरलॉकिंग सिस्टम (जिग-सॉ पजल की तरह) से जोड़कर खड़ा किया गया है। किले की दीवारें तीन परतों में बनी हैं, जिससे यह दुश्मनों के तोप के गोलों को आसानी से झेल सकता था। इसके अलावा, किले की छतों पर गर्मी से बचने के लिए मिट्टी की मोटी परत बिछाई गई है, जो थार की भयंकर गर्मी में भी अंदर के कमरों को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखती है।
जैसलमेर के किले में हुए ‘आधे जौहर’ (Half Jauhar) की ऐतिहासिक कहानी क्या है?
यह घटना 16वीं शताब्दी (लगभग 1550 ईस्वी) की है, जब कंधार के पठान अमीर अली ने विश्वासघात करके जैसलमेर पर आक्रमण कर दिया था। युद्ध में भाटी राजपूत वीरों को लगा कि वे हारने वाले हैं। नियमानुसार, हार की स्थिति में महिलाएं जौहर (अग्नि कुंड में आत्मदाह) करती थीं, लेकिन अचानक हुए इस हमले के कारण राजपूतों को जौहर की अग्नि तैयार करने का समय ही नहीं मिला। ऐसे में राजा रावल लूणकरण ने अपनी महिलाओं को दुश्मनों के हाथ लगने से बचाने के लिए खुद अपने हाथों से उनके सिर काट दिए और युद्ध में शहीद हो गए। इसे इतिहास का ‘आधा जौहर’ कहा जाता है।
पर्यावरणविद (Environmentalists) जैसलमेर किले के अंदर रुकने से क्यों मना करते हैं?
जैसलमेर का किला 850 साल पुराना है और इसे इतने बड़े पैमाने पर आधुनिक जीवन जीने के लिए नहीं बनाया गया था। आज जब हजारों पर्यटक और स्थानीय लोग किले के अंदर रहते हैं, तो भारी मात्रा में पानी का उपयोग होता है। किले का प्राचीन सीवरेज और ड्रेनेज (निकासी) सिस्टम इस दबाव को नहीं झेल पा रहा है। पानी के लगातार रिसाव के कारण किले की नींव और त्रिकुटा पहाड़ी की मिट्टी कमजोर हो रही है, जिससे किले के कुछ हिस्से ढहने भी लगे हैं। इसलिए पर्यावरण को बचाने के लिए विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि पर्यटक किले के बाहर ठहरें।
जैसलमेर के किले के अंदर स्थित जैन मंदिरों का क्या महत्व और इतिहास है?
जैसलमेर किले के भीतर 12वीं से 15वीं शताब्दी के बीच बने सात अत्यंत सुंदर और प्राचीन जैन मंदिर स्थित हैं। ये मंदिर भगवान पार्श्वनाथ, भगवान संभवनाथ और अन्य तीर्थंकरों को समर्पित हैं। इनकी वास्तुकला प्रसिद्ध दिलवाड़ा शैली से मिलती-जुलती है। इन मंदिरों की दीवारों, खंभों और गुंबदों पर की गई बारीक इंसानी और पशु आकृतियों की नक्काशी देखकर दुनिया भर के पर्यटक हैरान रह जाते हैं। इन मंदिरों के नीचे एक गुप्त भूमिगत पुस्तकालय भी है, जिसे ‘ज्ञान भंडार’ कहा जाता है, जहाँ सदियों पुरानी दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियाँ और प्राचीन ग्रंथ आज भी सुरक्षित रखे हुए हैं।
जैसलमेर किले के चारों तरफ बने 99 बुर्जों (Bastions) का क्या इतिहास और महत्व है?
जैसलमेर किले की सबसे बड़ी पहचान इसके चारों ओर बने 99 विशाल बुर्ज हैं, जो दूर से देखने पर किले को एक मुकुट जैसा आकार देते हैं। इतिहास के अनुसार, इनमें से अधिकांश बुर्जों का निर्माण मूल राजा रावल जैसल के समय नहीं हुआ था। बाद में भाटी राजा रावल भीम और राजा मोहनपाल के शासनकाल (1610 से 1640 ईस्वी के बीच) में किले की सैन्य सुरक्षा को मजबूत करने के लिए इन बुर्जों को बनवाया गया था। इन बुर्जों का उपयोग सैनिक दुश्मनों पर नजर रखने और वहां से तोपें या गर्म तेल नीचे गिराने के लिए करते थे।
जैसलमेर किले के भीतर स्थित ‘ज्ञान भंडार’ (Gyan Bhandar) पुस्तकालय क्यों इतना रहस्यमयी और अमूल्य है
किले के प्रसिद्ध जैन मंदिरों के ठीक नीचे एक प्राचीन भूमिगत पुस्तकालय है, जिसे ‘ज्ञान भंडार’ कहा जाता है। यह भारत के सबसे दुर्लभ और प्राचीनतम निजी पुस्तकालयों में से एक है। यहाँ ताड़ के पत्तों (Palm Leaves) और हाथ से बने विशेष कागजों पर लिखी गई हजारों अमूल्य पांडुलिपियां (Manuscripts) सुरक्षित हैं, जिनमें से कुछ तो 10वीं और 11वीं शताब्दी की हैं। इस भंडार में न केवल जैन धर्म, बल्कि खगोल विज्ञान, व्याकरण, इतिहास और आयुर्वेद से जुड़े दुर्लभ ग्रंथ मौजूद हैं, जिन्हें देखने के लिए दुनिया भर से बड़े शोधकर्ता यहाँ आते हैं।
जैसलमेर किले के पास होने वाला ‘डेजर्ट फेस्टिवल’ (Desert Festival) क्या है और यह कब आयोजित होता है?
जैसलमेर का विश्व प्रसिद्ध मरु महोत्सव (Desert Festival) हर साल जनवरी या फरवरी के महीने में आयोजित किया जाता है। इस तीन दिवसीय उत्सव के दौरान पूरा जैसलमेर किला और इसके आस-पास के थार के रेतीले धोरे (Sand Dunes) लोक संगीत, कालबेलिया नृत्य और रंग-बिरंगी सांस्कृतिक झांकियों से जीवंत हो उठते हैं। यहाँ पर्यटकों के लिए मूंछ प्रतियोगिता, पगड़ी बांधने का कॉम्पिटिशन और ऊंटों के अनोखे करतब दिखाए जाते हैं। इस दौरान किले की भव्यता दोगुनी हो जाती है क्योंकि पूरी रात किला विशेष रोशनी से जगमगाता है और चारों तरफ लोक कलाकारों की गूंज होती है।
जैसलमेर किले के भीतर पेयजल (Drinking Water) की ऐतिहासिक व्यवस्था क्या थी?
थार रेगिस्तान की झुलसाती गर्मी और चारों तरफ पानी की कमी के बीच इस विशाल किले में रहने वाले हजारों लोगों के लिए पानी की व्यवस्था करना एक बड़ी चुनौती थी। इसके समाधान के लिए किले के भीतर ‘धाट कूप’ (Dhat Koop) नामक कई कुएं खोदे गए थे। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कुआं ‘जीवल कुआं’ माना जाता है, जिसके बारे में पौराणिक मान्यता है कि इसे भगवान कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से अर्जुन की प्यास बुझाने के लिए बनाया था। इसके अतिरिक्त, किले की ढलान को इस तरह डिजाइन किया गया था कि बारिश का पानी बहकर सीधे किले के नीचे बनी ऐतिहासिक गडसीसर झील (Gadisar Lake) में इकट्ठा हो जाता था।
जैसलमेर किले के मुख्य द्वार के पास ‘हाथों के निशान’ (Sati Handprints) का क्या रहस्य है?
जब आप जैसलमेर किले के मुख्य द्वारों (जैसे गणेश पोल या रंग पोल) से गुजरते हैं, तो दीवारों पर लाल रंग के हाथों के कई निशान (हथेली के छापे) दिखाई देते हैं। ये निशान इतिहास की उन राजपूत वीरांगनाओं के हैं, जिन्होंने युद्ध में अपने पतियों की वीरगति के बाद सती प्रथा या जौहर को अपनाया था। महल की चौखट छोड़ते समय ये स्त्रियाँ अपने हाथों को सिंदूर या मेंहदी में डुबोकर दीवार पर छाप लगा देती थीं। स्थानीय लोग आज भी इन निशानों को बहुत पवित्र मानते हैं और किले में आने वाले इतिहास प्रेमी इन प्रतीकों को देखकर राजपूत काल के बलिदान और कठोर इतिहास को महसूस करते हैं।
क्या जैसलमेर किले के भीतर खरीदारी (Shopping) करना सही है या बाहर के बाजार बेहतर हैं?
किले की संकरी गलियों में घूमते समय आपको रंग-बिरंगे पारंपरिक हस्तशिल्प, चमड़े की कलाकृतियां, राजस्थानी रजाई और चमकीले पत्थरों के आभूषणों की सैकड़ों दुकानें दिखेंगी। यहाँ खरीदारी का अनुभव बेहद जादुई होता है, लेकिन पर्यटकों की भारी भीड़ के कारण कीमतें अक्सर बहुत ज्यादा (Overpriced) होती हैं। इसके अलावा, कई अनधिकृत गाइड आपको उन दुकानों पर ले जाते हैं जहाँ उन्हें भारी कमीशन मिलता है। यदि आप मोलभाव (Bargaining) करने में माहिर हैं, तो आप किले के अंदर से यादगार चीजें खरीद सकते हैं; अन्यथा किले के ठीक बाहर स्थित सदर बाजार और मानक चौक से खरीदारी करना ज्यादा किफायती और सुरक्षित माना जाता है।
यूनेस्को (UNESCO) ने जैसलमेर किले को विश्व धरोहर सूची में क्यों शामिल किया और इसकी वर्तमान स्थिति क्या है?
साल 2013 में यूनेस्को ने राजस्थान के छह पहाड़ी किलों के साथ जैसलमेर के किले को भी विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) घोषित किया था। यूनेस्को ने इसकी अनूठी सैन्य वास्तुकला, राजपूत और इस्लामी कला के संगम, बिना गारे के केवल पत्थरों की इंटरलॉकिंग की तकनीक और थार रेगिस्तान के बीच इसके ऐतिहासिक व्यापारिक महत्व को देखते हुए यह दर्जा दिया। वर्तमान में, वैश्विक पहचान मिलने के बाद इसके संरक्षण (Conservation) के लिए कड़े नियम बनाए गए हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) लगातार इसकी दीवारों और बुर्जों की मरम्मत करता है ताकि इस ऐतिहासिक अमूल्य धरोहर को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जा सके।
जैसलमेर किले की अनूठी ‘दशहरा चौक’ (Dashera Chowk) परंपरा क्या है और इसका क्या महत्व है?
किले के ठीक बीच में स्थित दशहरा चौक यहाँ का सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और सांस्कृतिक केंद्र है राजाओं के समय में इसी बड़े चौक पर मुख्य शाही दरबार, त्यौहार और महत्वपूर्ण घोषणाएं होती थीं। आज भी यहाँ हर साल विजयादशमी (दशहरा) के मौके पर जैसलमेर के पूर्व राजपरिवार के सदस्य पारंपरिक वेशभूषा में आते हैं और शस्त्र पूजा (हथियारों की पूजा) की प्राचीन रस्म निभाते हैं। पर्यटकों के लिए यह चौक एक बेहतरीन लैंडमार्क है क्योंकि इसके चारों ओर खूबसूरत नक्काशीदार महल (राज महल), पुराने झरोखे और कई हेरिटेज कैफे स्थित हैं जहाँ से किले की रौनक दिखती है।
क्या जैसलमेर किले के अंदर कोई पुराना सीक्रेट रास्ता या सुरंग (Secret Tunnels) भी है?
हाँ, राजस्थान के अन्य किलों की तरह जैसलमेर के किले में भी आपातकाल और सुरक्षा के लिए गुप्त रास्ते बनाए गए थे। स्थानीय गाइडों और इतिहासकारों के अनुसार, किले के राज महल के भीतर से कुछ संकरी गुप्त सुरंगें निकलती थीं जो किले के बाहर दूर वीरान रेगिस्तान या गुप्त ठिकानों पर जाकर खुलती थीं। इनका मुख्य उद्देश्य युद्ध या घेराबंदी के समय राजा, राजपरिवार की महिलाओं और बेशकीमती खजाने को सुरक्षित बाहर निकालना था। वर्तमान में सुरक्षा कारणों, मिट्टी धंसने और मरम्मत के अभाव के कारण इन गुप्त रास्तों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा बंद कर दिया गया है।
क्या जैसलमेर का किला दिव्यांगों (Physically Challenged) या व्हीलचेयर यूजर्स के लिए सुलभ है?
जैसलमेर का किला एक पहाड़ी (त्रिकुटा पहाड़ी) पर बना है और इसके मुख्य प्रवेश द्वार (अखे पोल) से लेकर अंदर के रास्तों तक की चढ़ाई काफी खड़ी और घुमावदार है। इसके अलावा, किले की अंदरूनी गलियां सदियों पुरानी हैं जो उबड़-खाबड़ पत्थरों से बनी हैं और बहुत संकरी हैं। इसलिए, यह किला व्हीलचेयर यूजर्स या गंभीर घुटने के दर्द से पीड़ित बुजुर्गों के लिए पूरी तरह सुलभ (Accessible) नहीं है। हालांकि, राज महल म्यूजियम के कुछ हिस्सों को छोड़कर मुख्य बाजारों और मंदिरों तक रैंप की कमी के कारण दिव्यांगों को घूमने के लिए लोकल गाइड या तिपहिया ऑटो की मदद लेनी पड़ती है।
जैसलमेर किले के घरों के बाहर बनी ‘पीली नक्काशीदार खिड़कियों’ (Jharokhas) का क्या रहस्य है?
किले की संकरी गलियों में चलते हुए आपको हर घर और हवेली पर बेहद खूबसूरत, जालीदार और बारीक नक्काशी वाली खिड़कियां दिखाई देंगी, जिन्हें ‘झरोखा’ कहा जाता है। बलुआ पत्थर को तराश कर बनाई गई इन जालियों का केवल सौंदर्य ही महत्व नहीं था, बल्कि यह थार रेगिस्तान की वास्तुकला का एक बेहतरीन उदाहरण हैं। ये बारीक छेद वैज्ञानिक रूप से काम करते हैं; ये बाहर से आने वाली गर्म और रेतीली हवा को अंदर ठंडी हवा (Venturi Effect) में बदल देते थे। साथ ही, राजपूताना काल की पर्दा प्रथा के कारण घर की महिलाएं इन झरोखों के पीछे छिपकर बिना किसी की नजर में आए बाहर की पूरी हलचल आसानी से देख सकती थीं।
जैसलमेर किले पर सत्यजीत रे की फिल्म ‘सोनार केल्ला’ (Sonar Kella) का क्या प्रभाव पड़ा?
: साल 1971 में ऑस्कर विजेता निर्देशक सत्यजीत रे ने एक जासूसी उपन्यास लिखा और 1974 में उस पर एक बंगाली फिल्म बनाई, जिसका नाम था ‘सोनार केल्ला’ (द गोल्डन फोर्ट)। इस फिल्म की पूरी कहानी जैसलमेर किले के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसमें एक बच्चा अपने पिछले जन्म के किले और छिपे हुए खजाने को याद करता है। इस फिल्म के सुपरहिट होने के बाद, पश्चिम बंगाल और दुनिया भर के पर्यटकों के बीच जैसलमेर का किला देखने का एक जबरदस्त क्रेज पैदा हो गया। आज भी बंगाली पर्यटक इस किले को देखने के लिए बड़ी संख्या में आते हैं और स्थानीय पर्यटन को इस फिल्म से एक नया जीवन मिला ।
जैसलमेर के पूर्व राजपरिवार (Royal Family) के सदस्य वर्तमान में कहाँ रहते हैं?
हालाँकि जैसलमेर का किला (राज महल) सदियों तक भाटी राजपूत शासकों का मुख्य निवास स्थान रहा है, लेकिन वर्तमान में जैसलमेर के पूर्व महाराजा और उनका परिवार किले के भीतर नहीं रहते हैं। आधुनिक सुख-सुविधाओं और निजता को ध्यान में रखते हुए, पूर्व राजपरिवार अब किले से थोड़ी दूरी पर स्थित ‘मंदिर पैलेस’ (Mandir Palace) में निवास करता है। मंदिर पैलेस वास्तुकला का एक आधुनिक और बेहद खूबसूरत उदाहरण है, जिसका एक हिस्सा अब हेरिटेज होटल में बदल दिया गया है। इसके बावजूद, दशहरा या अन्य बड़े सांस्कृतिक त्योहारों के दौरान राजपरिवार के सदस्य आज भी परंपराओं को निभाने के लिए किले के भीतर आते हैं।
जैसलमेर किले के भीतर स्थित ‘कैनन पॉइंट’ या ‘सनसेट व्यू पॉइंट’ (Sunset Viewpoints) कौन से हैं?
जैसलमेर का किला अपनी ऊंचाई के कारण पूरे शहर का विहंगम दृश्य प्रदान करता है। फोटोग्राफी और सूर्यास्त देखने के लिए किले के भीतर दो जगहें सबसे प्रसिद्ध हैं। पहला है ‘दसहरा चौक’ के पास स्थित बुर्ज, जहाँ प्राचीन तोपें रखी हुई हैं। यहाँ से नीचे फैले पीले रंग के ‘गोल्डन सिटी’ का शानदार नजारा दिखता है। दूसरा सबसे लोकप्रिय स्पॉट किले के पश्चिमी छोर पर बने रूफटॉप कैफे हैं। शाम के समय जब सूरज थार रेगिस्तान के क्षितिज में डूबता है, तो यहाँ से आसमान के बदलते रंग और सोने की तरह चमकते किले की प्राचीर को कैमरे में कैद करना एक जादुई अनुभव होता है।
रात के समय जैसलमेर किले (Jaisalmer Fort at Night) का नजारा कैसा होता है और क्या रात में जाना सुरक्षित है?
रात के समय जैसलमेर का किला एक पूरी तरह से अलग और अलौकिक रूप ले लेता है। सरकार द्वारा किले की बाहरी दीवारों पर विशेष गोल्डन फ्लड लाइट्स (Floodlights) लगाई गई हैं, जिससे रात के अंधेरे में यह किला थार रेगिस्तान के बीच चमकते हुए एक विशाल सोने के मुकुट जैसा दिखाई देता है। जहाँ तक सुरक्षा की बात है, किला रात में पूरी तरह सुरक्षित है क्योंकि यह एक जीवित शहर है। रात 9-10 बजे तक यहाँ के मुख्य बाज़ार और रेस्टोरेंट खुले रहते हैं। शांत रातों में किले के नीचे बने रास्तों पर टहलना और इसकी रोशनी को निहारना पर्यटकों को बेहद पसंद आता है।
जैसलमेर किले के पत्थरों को ‘हबूर पत्थर’ या ‘जोधपुरी पत्थर’ से कैसे अलग किया जाता है?
जैसलमेर किला जिस बलुआ पत्थर से बना है, उसे स्थानीय भाषा में ‘पीला पत्थर’ या ‘गोल्डन सैंडस्टोन’ कहा जाता है, जो मुख्य रूप से जैसलमेर के पास कनोई और मूलसागर गाँवों की खदानों से आता है। यह जोधपुर के गहरे लाल-भूरे पत्थरों से पूरी तरह अलग है। इसके अलावा, जैसलमेर क्षेत्र में एक और जादुई पत्थर पाया जाता है जिसे ‘हबूर पत्थर’ (Habur Stone) या जीवाश्म पत्थर कहा जाता है। हबूर पत्थर गहरे भूरे रंग का होता है जिसमें कुदरती तौर पर बायो-केमिकल बैक्टीरिया होते हैं, जिससे बने बर्तनों में दूध रखने मात्र से वह दही में बदल जाता है। किला बनाने में केवल पीले बलुआ पत्थर का उपयोग हुआ है।
जैसलमेर किले के निर्माण से जुड़ी ‘ऋषि इंसाल’ (Sage Insaal) की पौराणिक भविष्यवाणी क्या थी?
: स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, त्रिकुटा पहाड़ी पर किले के निर्माण का निर्णय एक प्राचीन भविष्यवाणी से प्रेरित था। माना जाता है कि भाटी राजपूतों के आगमन से सदियों पहले, यहाँ ऋषि इंसाल नामक एक सिद्ध संत रहते थे। जब भगवान कृष्ण और अर्जुन इस क्षेत्र से गुजरे, तो कृष्ण ने भविष्यवाणी की थी कि भविष्य में यदुवंश (भाटी वंश) का एक प्रतापी राजा इसी त्रिकुटा पहाड़ी पर अपना अजेय किला बनाएगा। जब राजा रावल जैसल ने 1156 ईस्वी में अपनी नई राजधानी की तलाश शुरू की, तब उन्हें ऋषि इंसाल के मिले शिलालेखों और इसी पौराणिक कथा से इस सुरक्षित पहाड़ी पर किला बनाने की प्रेरणा मिली।
ब्रिटिश काल (British Raj) के दौरान जैसलमेर किले का व्यापारिक महत्व अचानक क्यों कम हो गया?
मध्यकाल में जैसलमेर का किला ‘सिल्क रूट’ (Silk Road) के व्यापारिक मार्ग का एक प्रमुख केंद्र था, जिससे यहाँ के राजाओं और व्यापारियों को टैक्स के रूप में भारी कमाई होती थी। हालांकि, 19वीं सदी में ब्रिटिश शासन के दौरान जब भारत में बॉम्बे (मुंबई) और कलकत्ता जैसे आधुनिक समुद्री बंदरगाहों (Sea Ports) का विकास हुआ, तब थार रेगिस्तान से होने वाला थल-व्यापार धीरे-धीरे पूरी तरह बंद हो गया। व्यापारिक मार्ग बदलने के कारण किले की आर्थिक रीढ़ टूट गई। आजादी के बाद भारत-पाकिस्तान विभाजन के कारण सीमाएं सील होने से यह पारंपरिक व्यापार हमेशा के लिए खत्म हो गया और किला केवल सैन्य व सांस्कृतिक केंद्र बनकर रह गया।
जैसलमेर किले की वास्तुकला में इस्तेमाल होने वाली ‘शिलावट’ (Silawat) कम्युनिटी का क्या योगदान है?
जैसलमेर किले और इसके अंदर बनी भव्य हवेलियों की अविश्वसनीय नक्काशी का असली श्रेय ‘शिलावट’ (Silawat) नामक स्थानीय मूर्तिकार और कारीगर समुदाय को जाता है। ये मुस्लिम और हिंदू कारीगर पत्थर तराशने की कला में इतने निपुण थे कि वे बिना किसी आधुनिक मशीन के, केवल छैनी और हथौड़ी से बलुआ पत्थर को कपड़े या मखमल जैसी कोमल और बारीक जालीदार आकृतियों में बदल देते थे। शिलावटों की इसी कलात्मक बुद्धिमत्ता के कारण किले की खिड़कियां, छज्जे और झरोखे आज 800 साल बाद भी दुनिया भर के आर्किटेक्ट्स के लिए एक अनसुलझी पहेली और रिसर्च का विषय बने हुए हैं।
वर्तमान में क्या जैसलमेर किले की संपत्तियों की खरीद-बिक्री (Buying & Selling Property) कानूनी रूप से संभव है?
चूंकि जैसलमेर का किला एक ‘लिविंग फोर्ट’ है, इसलिए इसके अंदर मौजूद अधिकांश घर, दुकानें और प्राचीन हवेलियां निजी तौर पर स्थानीय निवासियों की मरुस्थलीय संपत्ति हैं। कानूनी रूप से, अंदर रहने वाले लोग अपने हिस्से की निजी संपत्तियों को बेच या लीज (किराए) पर दे सकते हैं, और कई पुरानी हवेलियों को बाहरी व्यवसायियों ने खरीदकर होटलों में बदला भी है। हालांकि, साल 2013 में यूनेस्को विश्व धरोहर (UNESCO World Heritage Site) की सूची में शामिल होने और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के कड़े नियमों के बाद, अब किले की मूल ऐतिहासिक बनावट में किसी भी प्रकार का नया कंक्रीट निर्माण या तोड़फोड़ करना पूरी तरह से प्रतिबंधित और दंडनीय अपराध है।
जैसलमेर किले की ‘त्रिकुटा पहाड़ी’ (Trikuta Hill) की भू-वैज्ञानिक (Geological) खासियत क्या है?
: जैसलमेर का किला जिस त्रिकुटा पहाड़ी पर खड़ा है, वह भू-वैज्ञानिक दृष्टि से बेहद प्राचीन और महत्वपूर्ण है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह पहाड़ी मुख्य रूप से जुरासिक काल (Jurassic Period) के बलुआ पत्थरों और समुद्री जीवाश्मों (Marine Fossils) से बनी है, जो करीब 16 से 18 करोड़ साल पुराने हैं। मरुस्थल के बीच में यह त्रिकोणीय आकार की पहाड़ी एक प्राकृतिक पठार की तरह उभरी हुई है, जिसकी ऊंचाई लगभग 80 मीटर (260 फीट) है। इसी भू-वैज्ञानिक मजबूती के कारण यह पहाड़ी सदियों से इस भारी-भरकम और विशाल किले के वजन को अपने ऊपर बिना धंसे संभाले हुए है।
जैसलमेर किले के भीतर स्थित ‘स्वांगिया माता मंदिर’ (Swanghiya Mata Temple) और ‘मुड़ती लाठी’ का क्या रहस्य है?
किले के भीतर स्थित स्वांगिया माता (आवर माता) का मंदिर भाटी राजवंश की कुलदेवी को समर्पित है। इस मंदिर से जुड़ी एक बेहद रोचक लोककथा है, जिसके कारण माता के हाथ में ‘मुड़ी हुई लाठी’ (स्वांग/भाला) दिखाई देती है। मान्यता है कि प्राचीन काल में जब राक्षसों का आतंक बढ़ा, तब माता ने अपने दिव्य भाले (स्वांग) से उनका संहार किया था, जिससे वह भाला मुड़ गया था। भाटी राजपूत शासक अपने राज्य के प्रतीक और झंडे में आज भी इस मुड़ी हुई लाठी के चिह्न का उपयोग करते हैं, और युद्ध पर जाने से पहले इसी मंदिर में विजय का आशीर्वाद लेते थे।
जैसलमेर का किला आपको कैसा लगा और आपको खास आकर्षण क्या लगा?
स्वांगिया माता की जय।


