अकबर भी कांप उठा था! रानी फूल कंवर का जौहर और 8000 वीरांगनाओं के महा-बलिदान की अमर कहानी

रानी फूल कंवर का जौहर: जानिए चित्तौड़गढ़ दुर्ग के तीसरे और अंतिम जौहर (1568) का पूरा इतिहास. जब मुगल सम्राट अकबर के आक्रमण के समय रानी फूल कंवर ने 8,000 वीरांगनाओं के साथ अपनी मर्यादा और स्वाभिमान की रक्षा के लिए धधकती अग्नि को गले लगा लिया था. पूरी कहानी यहाँ पढ़ें.

कौन थीं रानी फूल कंवर?

चित्तौड़गढ़ के इस तीसरे साके की मुख्य नायिका रानी फूल कंवर थीं. उनका जन्म मारवाड़ (जोधपुर) के प्रतापी शासक राव मालदेव के राजघराने में हुआ था. वह मेड़ता के प्रसिद्ध वीर राव जयमल राठौड़ की सगी बहन थीं. रानी फूल कंवर का विवाह आमेट के रावत पत्ता चूँडावत से हुआ था.इस प्रकार, रानी फूल कंवर का नाता राजपूताना के दो सबसे वीर कुलों (राठौड़ और चूँडावत) से था. उनमें न केवल राजपूती संस्कार कूट-कूट कर भरे थे, बल्कि वे एक कुशल रणनीतिकार और साहसी महिला भी थीं.

रानी फूल कंवर का जौहर ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: अकबर की विस्तारवादी नीति और चित्तौड़ की घेराबंदी

सन् 1567 तक मुगल सम्राट अकबर अपनी सल्तनत का विस्तार पूरे उत्तर भारत में कर चुका था, लेकिन राजपूताना का सबसे शक्तिशाली राज्य ‘मेवाड़’ अभी भी उसके नियंत्रण से बाहर था. मेवाड़ के शासक महाराणा उदय सिंह (महाराणा प्रताप के पिता) ने अकबर की अधीनता स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया था.अकबर भली-भांति जानता था कि यदि पूरे राजपूताना को जीतना है, तो मेवाड़ के गौरव और उसकी शक्ति के केंद्र चित्तौड़गढ़ दुर्ग को जीतना अनिवार्य था. इसी उद्देश्य के साथ, अक्टूबर 1567 में अकबर एक विशाल आधुनिक सेना, तोपखाने और बारूद के साथ चित्तौड़गढ़ के सामरिक किले को घेरने पहुंच गया.

महाराणा उदय सिंह का पहाड़ों में जाना और किले की सुरक्षा का जिम्मा

जब अकबर की विशाल मुगल सेना ने चित्तौड़गढ़ को चारों ओर से घेर लिया, तब मेवाड़ के सामंतों ने राज्य के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए महाराणा उदय सिंह को गोगुंदा भेजने का निर्णय लिया। किले की रक्षा की जिम्मेदारी वीर सेनापति राव जयमल राठौड़ और रावत पत्ता चूँडावत को सौंपी गई। इन दोनों योद्धाओं ने केवल लगभग 8,000 राजपूत सैनिकों के साथ अकबर की 60,000 से अधिक सैनिकों वाली सेना का चार महीने से भी अधिक समय तक डटकर मुकाबला किया और अद्भुत शौर्य का परिचय दिया।

वह काली रात: जब वीर जयमल घायल हुए

22–23 फरवरी 1568 की रात, जब वीर जयमल राठौड़ किले की टूटी दीवार की मरम्मत करवा रहे थे, तभी अकबर ने अपनी बंदूक ‘संग्राम’ से उन पर निशाना साधा। गोली उनके पैर में लगी और वे गंभीर रूप से घायल हो गए। सेनापति के घायल होते ही राजपूतों की स्थिति बेहद कठिन हो गई। रसद और बारूद की कमी के बीच अब उनके सामने केवल दो विकल्प थे—या तो मुगलों की अधीनता स्वीकार करें या फिर मातृभूमि की रक्षा के लिए अंतिम सांस तक वीरतापूर्वक युद्ध करें।

रानी फूल कंवर का जौहर और ऐतिहासिक नेतृत्व

24 फरवरी 1568 की अलसुबह, जब राजपूत वीरों ने केसरिया का संकल्प लिया, तब किले की महिलाओं ने अपनी आन-बान और सतीत्व की रक्षा के लिए जौहर का मार्ग चुना। रानी फूल कंवर के नेतृत्व में रावत पत्ता की माता, पुत्रियों सहित लगभग 8,000 राजपूत वीरांगनाओं ने जौहर कुंड की प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश कर सर्वोच्च बलिदान दिया। उनके साहस और त्याग ने चित्तौड़गढ़ के इतिहास में अमर अध्याय जोड़ दिया।

चित्तौड़गढ़ का तीसरा साका और जयमल-पत्ता का ‘केसरिया’

जौहर की लपटें देख राजपूतों का खून खौल उठा. जीवन का मोह छोड़, सैनिकों ने केसरिया बाना पहना. पैर में गोली लगने के कारण वीर जयमल खड़े नहीं हो पा रहे थे. तब उनके भतीजे कल्ला जी राठौड़ ने उन्हें अपने कंधों पर बिठाया. दोनों ने दोनों हाथों में तलवारें थाम लीं. चार हाथों वाले इस अद्भुत योद्धा को देख मुगल सेना उन्हें ‘चतुर्भुज देव’ समझकर डर गई. दूसरी ओर, युवा रावत पत्ता चूँडावत भूखे शेर की तरह मुगलों पर टूट पड़े. अदम्य साहस दिखाते हुए जयमल, पत्ता और कल्ला जी सैकड़ों मुगलों को काटकर वीरगति को प्राप्त हुए.

चित्तौड़गढ़ किले में हुए तीसरे जौहर को ‘जन जौहर’ (Mass Jauhar) क्यों कहा जाता है?

सन 1568 ई. में अकबर के आक्रमण के समय चित्तौड़गढ़ किले में हुए तीसरे जौहर को ‘जन जौहर’ (Mass Jauhar) इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें किसी शासक या राजा की अनुपस्थिति में किले की आम जनता, सैनिकों के परिवारों और नागरिकों ने स्वयं आगे बढ़कर सामूहिक आत्मदाह का फैसला लिया था। पहले के दो जौहरों (रानी पद्मिनी और राजमाता कर्णावती) का नेतृत्व राजपरिवार के हाथों में था, लेकिन तीसरे जौहर की पूरी कमान और लड़ाई जनसाधारण व सेनानायकों के कंधों पर थी।

समिद्धेश्वर मंदिर के पास मिले पुरातात्विक प्रमाणरानी फूल कंवर का जौहर और अन्य वीरांगना

खुदाई में मिली राख और हड्डियां: भारत सरकार के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) ने जब किले के भीतर महान समाधीश्वर (समिद्धेश्वर) महादेव मंदिर और विजय स्तंभ के पास के विशाल मैदान (जौहर स्थली) की सफाई और आंशिक खुदाई की थी, तब वहां से गहरे रंग की राख और मानवीय हड्डियों के अवशेष मिले थे।

वैज्ञानिक साक्ष्य: यह वही स्थान है जहां रानी फूल कंवर के नेतृत्व में लगभग 8,000 महिलाओं और बच्चों ने अग्नि स्नान किया था। मिट्टी की परतों के नीचे दबी यह राख सदियों बाद भी उस ‘जन जौहर’ की प्रामाणिकता को अकाट्य रूप से सिद्ध करती है।

चित्तौड़गढ़ की मुख्य जौहर स्थली और वर्तमान स्थिति

विजय स्तंभ के पास का मैदान: आज जब पर्यटक किले पर जाते हैं, तो विजय स्तंभ के ठीक सामने एक बहुत बड़ा, गहरा और खुला हुआ मैदान दिखाई देता है। यही वह मुख्य जौहर कुंड / जौहर स्थली है, जहां तीनों ऐतिहासिक जौहर (1303 ई., 1335 ई., और 1568 ई.) हुए थे। सुरक्षा कारणों से अब इसके मुख्य हिस्से को घेर कर सुरक्षित कर दिया गया है।

जौहर ज्योति मंदिर: इस पावन भूमि पर वीरांगनाओं की स्मृति में एक छोटा मंदिर (जौहर ज्योति) बनाया गया है। यहां आने वाले लोग इस भूमि की मिट्टी को माथे से लगाते हैं। इंटरनेट पर लोग सबसे ज्यादा इसी स्थान की तस्वीरें और गूगल मैप्स लोकेशन सर्च करते हैं।

‘जौहर मेला चित्तौड़गढ़’: तारीख और राष्ट्रीय महत्व

कब आयोजित होता है: हर साल चैत्र कृष्ण एकादशी (मार्च-अप्रैल के महीने में) को चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर भव्य ‘जौहर मेले’ का आयोजन किया जाता है। देश-विदेश से लाखों लोग और इतिहास प्रेमी इस दिन किले पर जुटते हैं।

मुख्य आकर्षण: इस दिन जौहर स्मृति संस्थान द्वारा एक विशाल शौर्य यात्रा (जुलूस) निकाली जाती है, जिसमें राजपूत पारंपरिक वेशभूषा में तलवारबाजी और सांस्कृतिक कौशल का प्रदर्शन करते हैं। वीर क्षत्राणियों और योद्धाओं को श्रद्धांजलि देने के लिए जौहर कुंड पर विशेष यज्ञ और ‘जौहर ज्योति’ प्रज्वलित की जाती है।

अकबर का कत्लेआम की विभीषिका और जनेऊ (Janeu) की घटना

चित्तौड़गढ़ के तीसरे साके (1568 ई.) के बाद अकबर द्वारा करवाया गया नरसंहार बेहद क्रूर था। इतिहासकारों के अनुसार, मृत राजपूतों और नागरिकों के शरीरों से उतारे गए पवित्र जनेऊओं (धार्मिक सूत्रों) का कुल वजन साढ़े चौहत्तर (74.5) मण यानी कई सौ किलोग्राम था। इंसानों के खून से होली खेलने के साथ ही मुगलों ने किले के भीतर मौजूद प्राचीन और भव्य मंदिरों, मूर्तियों तथा अमूल्य कलाकृतियों को भी पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया था। इस रक्तरंजित ऐतिहासिक सत्य को अब स्कूली शिक्षा में भी स्थान दिया गया है; हाल ही में NCERT की नई इतिहास की किताबों में अकबर की इस क्रूरता और चित्तौड़गढ़ के ‘जन जौहर’ के बलिदान की पूरी सच्चाई को बिना किसी लाग-लपेट के शामिल किया गया है ताकि आने वाली पीढ़ियां देश के इस वास्तविक इतिहास से रूबरू हो सकें।

अकबर ने चित्तौड़गढ़ में कत्लेआम का आदेश क्यों दिया?

अक्टूबर 1567 से शुरू हुई चित्तौड़गढ़ की घेराबंदी अकबर के लिए बेहद हताशाजनक रही थी। [NCERT की नई इतिहास की किताबों में इस बात का विशेष उल्लेख किया गया है कि] चार महीने के कड़े संघर्ष में वीर जयमल राठौड़ और पत्ता सिसोदिया के नेतृत्व में राजपूत रक्षकों ने मुगलों को भारी नुकसान पहुँचाया, जिससे अकबर के कई बड़े सेनापति मारे गए। इस असफलता और खीझ ने अकबर को प्रतिशोध की भावना से भर दिया। जब राजपूतों ने आत्मसमर्पण करने के बजाय अंतिम सांस तक लड़ने का फैसला किया, तो अकबर ने अपने गुस्से को शांत करने और अन्य राजपूत राज्यों (जैसे मारवाड़, बूंदी आदि) में दहशत फैलाने के लिए किले की निर्दोष आम जनता का कत्लेआम करवा दिया, ताकि वे बिना लड़े ही मुगलों की अधीनता स्वीकार कर लें।

चित्तौड़गढ़ के तीसरे साके (1568 ई.) में वीर जयमल राठौड़ और पत्ता सिसोदिया की वीरता

चित्तौड़गढ़ के तीसरे साके (1568 ई.) में वीर जयमल राठौड़ और पत्ता सिसोदिया की वीरता बेमिसाल थी [NCERT]। अकबर की बंदूक से पैर में गोली लगने के बाद भी जयमल जी शांत नहीं बैठे। वे वीर कल्ला जी राठौड़ के कंधों पर बैठकर दोनों हाथों में तलवारें लेकर मुगलों पर काल बनकर टूट पड़े। वहीं, मात्र 16 वर्ष की आयु में आमेट के रावत पत्ता सिसोदिया ने केसरिया बाना पहनकर अंतिम सांस तक अभूतपूर्व युद्ध लड़ा। इन दोनों वीरों के महाबलिदान से प्रभावित होकर स्वयं अकबर को भी आगरा किले के मुख्य द्वार पर उनकी हाथी पर सवार संगमरमर की मूर्तियां लगवानी पड़ी थीं।

साका क्या होता है?

साका राजपूत युद्ध परंपरा का सर्वोच्च बलिदान है, जो दो चरणों में पूरा होता था। जब दुश्मन सेना किले को चारों तरफ से घेर लेती थी और राजपूतों की जीत की कोई उम्मीद नहीं बचती थी, तब किले के भीतर आत्मसमर्पण करने के बजाय ‘साका’ का निर्णय लिया जाता था। इसके पहले भाग में महिलाएं अपनी अस्मिता और सम्मान की रक्षा के लिए धधकती आग में कूदकर ‘जौहर’ (आत्मदाह) करती थीं। इसके तुरंत बाद, पुरुष योद्धा अपने सिर पर केसरिया साफा या बाना पहनकर, भूखे शेरों की तरह अंतिम सांस तक दुश्मन को काटने के लिए मैदान में कूद पड़ते थे, जिसे ‘केसरिया करना’ कहा जाता था। जौहर और केसरिया के इस संयुक्त अनुष्ठान को ही इतिहास में ‘साका’ कहा गया है।यदि आप चित्तौड़गढ़ किले में हुए पहले और

जौहर और साका में क्या अंतर है?

जौहर और साका में मुख्य अंतर यह है कि जौहर महिलाओं का बलिदान था, जबकि साका महिलाओं और पुरुषों दोनों के संयुक्त बलिदान का नाम था

जौहर और केसरिया के संयुक्त अनुष्ठान को साका कहा जाता है। युद्ध में निश्चित पराजय देखकर सम्मान की रक्षा के लिए महिलाएं आग या पानी में कूदकर जौहर (आत्मदाह) करती थीं। इसके बाद पुरुष योद्धा मृत्यु का भय छोड़, सिर पर केसरिया साफा बांधकर अंतिम सांस तक लड़ने मैदान में कूदते थे, जिसे केसरिया कहते थे। जब यह दोनों घटनाएं पूरी होती थीं, तब वह ‘पूरा साका’ कहलाता था। यदि केवल पुरुष शहीद होते और महिलाएं जौहर नहीं कर पातीं, तो उसे ‘अर्ध-साका’ कहा जाता था, जैसा जैसलमेर दुर्ग में हुआ था।

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