बुड्ढा जोहड़ गुरुद्वारा इतिहास की उस महान घटना का गवाह है जब 1740 में भाई सुक्खा सिंह और मेहताब सिंह ने मस्सा रंगहर को सजा देकर सिखों के स्वाभिमान की रक्षा की थी। जानिए इसका पूरा सच।
बुड्ढा जोहड़ गुरुद्वारा का इतिहास
बुड्ढा जोहड़ गुरुद्वारा का इतिहास वर्ष 1740 की एक युगांतकारी घटना से जुड़ा है, जब अमृतसर के हरिमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) पर क्रूर मुगल चौधरी मस्सा रंगहर ने कब्जा कर लिया था। उसने पवित्र परिसर के भीतर शराब, कबाब और मुजरे का आयोजन कर सिखों की धार्मिक भावनाओं को गहरी ठेस पहुँचाई। इस अपवित्रता की खबर जब बीकानेर के जंगलों (बुड्ढा जोहड़ क्षेत्र) में शरण लिए सिख जत्थों तक पहुँची, तो वीर योद्धा भाई सुक्खा सिंह और भाई मेहताब सिंह ने पापी को दंड देने का प्रण लिया। दोनों जांबाज भेष बदलकर अमृतसर पहुँचे और टैक्स जमा करने के बहाने प्रवेश कर फुर्ती से मस्सा रंगहर का सिर धड़ से अलग कर दिया। वे उसका कटा हुआ सिर वापस इसी बुड्ढा जोहड़ क्षेत्र में लेकर आए और सिख संगत को दिखाया, जिसने पूरे सिख पंथ के मनोबल और स्वाभिमान को फिर से ऊँचा कर दिया।
नाम के पीछे की कहानी: ‘बुड्ढा जोहड़’ क्यों कहा जाता है?
बुड्ढा (Budha): पंजाबी और हिंदी में इसका अर्थ ‘बुजुर्ग’ या ‘पुराना’ होता है। मुगलों के अत्याचार के समय सिख सेना के बुजुर्ग जत्थेदार (जैसे बाबा शमशेर सिंह और पंथ के अन्य वरिष्ठ मार्गदर्शक) इस सुरक्षित स्थान पर डेरा डालते थे।
जोहड़ (Johad): मरुस्थलीय इलाकों में पानी के प्राकृतिक तालाब या पोखर को ‘जोहड़’ कहा जाता है। चूंकि यहाँ पानी का एक बड़ा प्राकृतिक स्रोत (तालाब) था, जो घने जंगलों से घिरा हुआ था, इसलिए यह छिपने और युद्ध की रणनीतियां बनाने के लिए सबसे सुरक्षित स्थान था।
बुजुर्ग सिखों (बुड्ढा दल) के ठहरने और इस जोहड़ (तालाब) के कारण ही इस स्थान का नाम हमेशा के लिए “बुड्ढा जोहड़” पड़ गया।
बुड्ढा जोहड़ गुरुद्वारा :आधुनिक गुरुद्वारा परिसर और आकर्षण
बुड्ढा जोहड़ गुरुद्वारा आज एक भव्य परिसर है, जहाँ लाखों श्रद्धालु आते हैं। यह मुख्य भवन अपनी श्वेत संगमरमर की नक्काशी, ऊंचे गुंबदों और शांत वातावरण के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के ऐतिहासिक संग्रहालय में भाई सुक्खा सिंह, भाई मेहताब सिंह के शौर्य और सिख इतिहास को दर्शाते सजीव तैलचित्र मौजूद हैं। परिसर में स्थित प्राचीन जोहड़ को अब एक विशाल पवित्र सरोवर का रूप दे दिया गया है, जहाँ श्रद्धालु स्नान करते हैं। इसके साथ ही, यहाँ सिख परंपरा के अनुसार बिना किसी भेदभाव के चौबीसों घंटे अटूट लंगर सेवा चलती है।
बुड्ढा जोहड़ गुरुद्वारा का मुख्य त्यौहार और मेला
यूं तो यहाँ रोज़ ही श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है, लेकिन हर महीने की अमावस्या को यहाँ विशेष धार्मिक समागम होता है।
भादों की अमावस्या का मेला: साल में एक बार (आमतौर पर अगस्त-सितंबर के महीने में) यहाँ ‘भादों की अमावस्या’ पर बहुत बड़ा सालाना मेला लगता है। इस मेले में राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और विदेशों से भी लाखों सिख और गैर-सिख श्रद्धालु मत्था टेकने आते हैं। इस दौरान यहाँ विशाल दीवान (धार्मिक सभाएं) सजते हैं और ढाडी जत्थे सिख इतिहास के शौर्य की गाथाएं सुनाते हैं।
मस्सा रंगहर का वध किसने किया था? लो
वर्ष 1740 में भाई सुक्खा सिंह और भाई मेहताब सिंह ने हरिमंदिर साहिब के अपमान का बदला लेने के लिए अमृतसर के प्रशासक मस्सा रंगहर का वध कर दिया। वे भेष बदलकर अमृतसर पहुंचे और दोनों ने मिलकर मस्सा का सिर काट दिया। इस वीरगाथा के अनुसार, वे कटे हुए सिर को भाले पर रखकर राजस्थान ले गए। वहां, सिखों ने न्याय के प्रतीक के रूप में उस सिर को बुड्ढा जोहड़ के पास एक जंड (खेजड़ी) के पेड़ पर लटका दिया था। यह घटना सिख समुदाय के अदम्य साहस और आस्था की रक्षा के लिए उनके अटूट समर्पण को दर्शाती है, जिसे आज भी याद किया जाता है।
श्रीगंगानगर से बुड्ढा जोहड़ गुरुद्वारा की दूरी
श्रीगंगानगर से बुड्ढा जोहड़ गुरुद्वारा की दूरी सड़क मार्ग से लगभग 66 से 85 किलोमीटर है, जो आपके द्वारा चुने गए रूट पर निर्भर करती है। सबसे मुख्य रास्ता पदमपुर-जैतसर रोड से होकर जाता है, जिससे कार या बस द्वारा यहाँ पहुँचने में करीब 1.5 घंटे का समय लगता है। श्रद्धालु इस मार्ग से आसानी से यात्रा कर सकते हैं।
बुड्ढा जोहड़ गुरुद्वारा का लाइव स्थान
बुड्ढा जोहड़ गुरुद्वारा की लाइव लोकेशन और सटीक रूट जानने के लिए आप सीधे गूगल मैप्स लिंक (Google Maps) का उपयोग कर सकते हैं। यह पवित्र ऐतिहासिक स्थल राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले की रायसिंहनगर तहसील के डाबला गाँव (6 एनपी) में स्थित है।श्रीगंगानगर शहर से यहाँ पहुँचने के लिए सबसे प्रसिद्ध और सुगम रास्ता पदमपुर-जैतसर रोड से होकर जाता है। श्रद्धालु अपनी निजी कार, टैक्सी या पंजाब रोडवेज बसों के माध्यम से सीधे बुड्ढा जोहड़ बस स्टैंड तक आसानी से पहुँच सकते हैं।
बुड्ढा जोहड़ गुरुद्वारा की टाइमिंग
बुड्ढा जोहड़ गुरुद्वारा श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए चौबीसों घंटे (24 घंटे) खुला रहता है। मुख्य दरबार साहिब में सुबह का प्रकाश (अमृत वेला) और शाम का सुखासन समय के अनुसार होता है। गुरुघर में अटूट लंगर सेवा भी दिन-रात निरंतर चलती है, जहाँ श्रद्धालु कभी भी प्रसाद ग्रहण कर सकते हैं।
बुड्ढा जोहड़ गुरुद्वारा लंगर
बुड्ढा जोहड़ गुरुद्वारा में सिख परंपरा के अनुसार चौबीसों घंटे अटूट लंगर सेवा चलती है। यहाँ आने वाले लाखों श्रद्धालुओं के लिए दिन-रात शुद्ध और ताजा भोजन तैयार किया जाता है। बिना किसी जाति, धर्म या अमीर-गरीब के भेदभाव के सभी लोग एक साथ पंगत में बैठकर पूरी श्रद्धा से प्रसाद ग्रहण करते हैं।
बुड्ढा जोहड़ गुरुद्वारा किस तहसील और गाँव के अंतर्गत आता है?
प्रशासनिक और भौगोलिक दृष्टि से यह पावन गुरुद्वारा श्रीगंगानगर जिले की रायसिंहनगर तहसील के अंतर्गत आने वाले डाबला गाँव (राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार 6 एन.पी.) में स्थित है। यह क्षेत्र पदमपुर और जैतसर मुख्य सड़क मार्ग के पास एक शांत, ग्रामीण और प्राकृतिक परिवेश से घिरा हुआ है, जो श्रद्धालुओं को एक अनूठा आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है।
बुड्ढा जोहड़ गुरुद्वारा राजस्थान के किस जिले में स्थित है?
: प्रसिद्ध बुड्ढा जोहड़ गुरुद्वारा राजस्थान के सुदूर उत्तरी भाग में स्थित श्रीगंगानगर जिले में आता है। श्रीगंगानगर को ‘राजस्थान का अन्न भंडार’ भी कहा जाता है। यह जिला पंजाब और पाकिस्तान की सीमा के अत्यंत निकट होने के कारण यहाँ सिख संस्कृति और पंजाबी भाषा का गहरा प्रभाव है। जिला मुख्यालय (श्रीगंगानगर शहर) से इस ऐतिहासिक धार्मिक स्थल की कुल दूरी सड़क मार्ग द्वारा लगभग 66 से 85 किलोमीटर है।
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