सेठानी का जोहड़ा चूरू: थार मरुस्थल के बीच छुपा वास्तुकला और करुणा का एक जादुई अजूबा

सेठानी का जोहड़ा चूरू का इतिहास जानें। सन 1899 के भयंकर छप्पनिया अकाल में बने इस ऐतिहासिक जलकुंड की बेजोड़ वास्तुकला, कलात्मक छतरियों और इसके निर्माण की पूरी कहानी यहाँ पढ़ें।

सेठानी का जोहड़ा किसने बनवाया था?

सेठानी का जोहड़ा का निर्माण चूरू के प्रसिद्ध मारवाड़ी उद्योगपति राय बहादुर सेठ भगवानदास बागला की विधवा पत्नी (जिन्हें स्थानीय लोग आदर से ‘सेठानी जी’ कहते थे) ने करवाया था। ईस्वी सन् 1899 में सेठ भगवानदास बागला के निधन के बाद जब क्षेत्र में भयंकर अकाल पड़ा, तो सेठानी जी ने समाज कल्याण के लिए अपने परिवार की परोपकार की परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्होंने स्थानीय लोगों को भुखमरी से बचाने और उन्हें रोजगार देने के उद्देश्य से इस विशाल और कलात्मक जलाशय की खुदाई करवाई थी।

सेठानी का जोहड़ा चूरू और छप्पनिया अकाल का इतिहास

छप्पनिया अकाल’ राजस्थान के इतिहास का सबसे विनाशकारी त्रिकाल था, जो ईस्वी सन् 1899-1900 में पड़ा था। लोग अक्सर इसके वर्ष को लेकर भ्रमित रहते हैं, लेकिन इसका सीधा संबंध हिंदू पंचांग से है। उस समय विक्रम संवत 1956 चल रहा था, जिसके अंत में ’56’ (छप्पन) आने के कारण स्थानीय ग्रामीणों ने इसे ‘छप्पनिया अकाल’ नाम दिया। इस दौरान अन्न, पानी और चारे की भीषण कमी (त्रिकाल) की वजह से लाखों इंसानों और मवेशियों ने अपनी जान गंवा दी थी। इसी खौफनाक मानवीय त्रासदी से निपटने, लोगों को रोजगार देने और पानी सहेजने के लिए चूरू में ऐतिहासिक ‘सेठानी का जोहड़ा’ खोदा गया था।

इंस्टाग्राम रील्स और फोटोग्राफी के लिए सेठानी का जोहड़ा के बेस्ट पॉइंट्स कौन-से हैं? (Photography Points

सेठानी का जोहड़ा में बेहतरीन तस्वीरें और वायरल इंस्टाग्राम रील्स बनाने के लिए तीन परफेक्ट फोटोग्राफी पॉइंट्स हैं। पहला है ‘द रिफ्लेक्शन पॉइंट’, जहाँ सुबह शांत पानी के बिल्कुल पास कैमरा ले जाकर नक्काशीदार छतरियों का शीशे जैसा उल्टा (Mirror) रिफ्लेक्शन मिलता है, जो सिनेमैटिक शॉट्स के लिए बेस्ट है। दूसरा है ‘छतरी फ्रेम शॉट’, जहाँ शाम को मुख्य छतरी के मेहराब के पीछे से ढलते सूरज की नारंगी रोशनी में शानदार शेडो/सिल्हूट (Silhouette) शॉट लिया जा सकता है। तीसरा है ‘गौ घाट और बर्ड आई व्यू’, जहाँ घाट की सीढ़ियों या ड्रोन से सर्दियों के प्रवासी पक्षियों और सीढ़ियों के पैटर्न को एक साथ कैप्चर करके सुकून देने वाला स्लो-मोशन वीडियो तैयार होता है।

सर्दियों में सेठानी का जोहड़ा (चूरू) में कौन-से विदेशी प्रवासी पक्षी आते हैं? (Migratory Birds)

सेठानी का जोहड़ा मरुस्थल के बीच पानी का बड़ा स्रोत होने के कारण सर्दियों (अक्टूबर से मार्च) में प्रवासी पक्षियों के लिए एक नखलिस्तान (Oasis) बन जाता है। इस दौरान यहाँ साइबेरिया, मंगोलिया और यूरोप जैसे ठंडे इलाकों से हजारों किलोमीटर दूर से दुर्लभ पक्षी आते हैं, जिनमें लंबी पूंछ वाली उत्तरी सीखपर (Northern Pintail), शांत स्वभाव की यूरेशियन विजन (Eurasian Wigeon), आकर्षक गार्गनी (Garganey Teal) और पानी में डुबकी लगाने वाला कॉमन कूट (Common Coot) प्रमुख हैं। दिसंबर-जनवरी की कड़ाके की ठंड में यहाँ बड़े आकार के पेलिकन्स और सारस (Cranes) भी दिखाई देते हैं, जबकि स्थानीय मोर, किंगफिशर और बगुले सालभर यहाँ चहचहाते रहते हैं।

मालजी का कमरा (Malji Ka Kamra) क्या है और इसका इतिहास क्या है?

मालजी का कमरा’ चूरू शहर में स्थित एक 100 साल से भी पुरानी ऐतिहासिक हवेली है, जिसे अब एक भव्य हेरिटेज होटल में बदल दिया गया है। यह चूरू की सबसे अनोखी और खूबसूरत इमारतों में से एक है।

इतिहास और निर्माण: इसका निर्माण सन 1920 के आसपास चूरू के प्रसिद्ध ओसवाल जैन व्यापारी मालचंद कोठारी ने करवाया था। इसे मुख्य रूप से राजा-महाराजाओं और बीकानेर के नवाबों के ठहरने और उनके स्वागत के लिए एक आलीशान गेस्ट हाउस के रूप में बनाया गया था।

अनोखी वास्तुकला (Architecture): इसकी बनावट पारंपरिक राजस्थानी हवेलियों से बिल्कुल अलग है। इसमें इतालवी (Italian) और यूरोपीय स्थापत्य कला का प्रभाव देखने को मिलता है। इसकी दीवारों पर खूबसूरत खंभे, मेहराब और शानदार प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) की मूर्तियां बनी हुई हैं।

पर्यटन का केंद्र: आज के समय में यह चूरू आने वाले देश-विदेश के पर्यटकों के रुकने और हेरिटेज वॉक का आनंद लेने के लिए सबसे पसंदीदा जगह है। यहाँ की लाइटिंग और गार्डन शाम के समय देखने लायक होते हैं।

चूरू के किले का इतिहास क्या है और यहाँ चांदी के गोले क्यों दागे गए थे?

चूरू के किले (Churu Fort) का इतिहास दुनिया भर में इकलौता और बेजोड़ है, क्योंकि यह दुनिया का एकमात्र ऐसा किला है जहाँ युद्ध के दौरान दुश्मनों पर चांदी के गोले (Silver Cannonballs) दागे गए थे।

इतिहास और निर्माण: इस किले का निर्माण सन 1739 में ठाकुर कुशल सिंह ने करवाया था।चांदी के गोले दागने की ऐतिहासिक घटना: यह घटना सन 1814 की है। उस समय चूरू पर ठाकुर शिव सिंह का राज था। बीकानेर की सेना ने जयपुर रियासत के साथ मिलकर चूरू के किले को चारों तरफ से घेर लिया। कई दिनों तक चले इस भयंकर युद्ध में किले के भीतर तोप के गोले बनाने के लिए लोहा और सीसा (Lead) पूरी तरह खत्म हो गया।

जनता का अदम्य बलिदान: जब राजा और सेनापति परेशान थे, तब चूरू की देशभक्त जनता, सुनारों और व्यापारियों ने अपने देश की रक्षा के लिए अपने घरों के सोने-चांदी के गहने और सिक्के राजा के खजाने में लाकर रख दिए। इसके बाद लोहे की जगह चांदी के गोले बनाए गए। जब तोप से दुश्मनों पर चांदी के गोले बरसाए गए, तो दुश्मन सेना भी हैरान रह गई और जनता की इस अटूट देशभक्ति को देखकर उन्होंने सम्मानपूर्वक घेराबंदी हटा ली।

ताल छापर अभ्यारण्य (Tal Chhapar Sanctuary) में काले हिरण देखने का सही समय क्या है?

चूरू जिले में स्थित ताल छापर अभ्यारण्य भारत में काले हिरणों (Blackbucks) का सबसे प्रसिद्ध और खूबसूरत घर माना जाता है। यहाँ फैले विशेष ‘मोथिया घास’ के मैदान अफ्रीका के सवाना जैसे दिखाई देते हैं।

घूूमने का सबसे अच्छा मौसम (Months): ताल छापर घूमने का सबसे बेस्ट समय नवंबर से फरवरी (सर्दियों का मौसम) माना जाता है। इस दौरान यहाँ का मौसम बेहद सुहावना रहता है। इसके अलावा, सितंबर-अक्टूबर (मानसून के ठीक बाद) में यहाँ की घास हरी-भरी हो जाती है, जो फोटोग्राफी के लिए अद्भुत है।

प्रवासी पक्षी (Harriers & Raptors): सर्दियों में यहाँ केवल काले हिरण ही नहीं, बल्कि यूरोप और मध्य एशिया से आए शिकारी पक्षी जैसे ‘हैरियर’ (Harriers), चील और बाज भी बड़ी संख्या में देखने को मिलते हैं।

दिन का सही समय: सुबह 6:30 से 9:30 बजे तक और शाम को 4:00 से 6:30 बजे तक। इस समय हिरण झुंड बनाकर घास के मैदानों में दौड़ते और कुलांचें भरते हुए आसानी से देखे जा सकते हैं।

चूरू रेलवे स्टेशन से सेठानी का जोहड़ा की दूरी कितनी है और कैसे पहुँचें ?

चूरू जंक्शन से सेठानी का जोहड़ा महज 5.2 किलोमीटर दूर है। यहाँ एनएच 703 (सरदारशहर रोड) द्वारा कार, बाइक या ऑटो से सिर्फ 10-12 मिनट में आसानी से पहुँचा जा सकता है। स्टेशन या बस स्टैंड से सीधे लोकल ई-रिक्शा और ऑटो मिल जाते हैं। वापसी में साधन मिलने की दिक्कत से बचने के लिए ऑटो चालक से राउंड-ट्रिप की बात पहले ही कर लें।

सेठानी का जोहड़ा चूरू की स्थापत्य कला और इंजीनियरिंग में क्या खास है?

सेठानी का जोहड़ा चूरू राजस्थानी वास्तुकला और प्राचीन जल-प्रबंधन इंजीनियरिंग का एक अद्भुत प्रतीक है। यह विशाल जलाशय पूरी तरह से स्थानीय पक्के बलुआ पत्थरों और चूने के गारे से एक बड़े आयताकार ढांचे में बनाया गया है। इसके चारों ओर बेहद खूबसूरत, नक्काशीदार और मेहराबदार कलात्मक छतरियां (डोम) बनी हैं, जो इसकी भव्यता बढ़ाती हैं। कुंड के भीतर उतरने के लिए पक्के घाट और सीढ़ियां बनी हैं, जिसमें मवेशियों के लिए विशेष ‘गौ घाट’ शामिल है। इसकी इंजीनियरिंग इतनी सटीक थी कि आसपास के बड़े कैचमेंट एरिया का वर्षा जल इसमें सालभर सुरक्षित रहता था।

सर्दियों में सेठानी का जोहड़ा चूरू में कौन-से मुख्य आकर्षण देखने को मिलते हैं?

सर्दियों के महीनों (अक्टूबर से मार्च) में सेठानी का जोहड़ा चूरू प्रकृति और पक्षी प्रेमियों के लिए एक सुरम्य नखलिस्तान (Oasis) में बदल जाता है। इस दौरान सुदूर साइबेरिया, मंगोलिया और यूरोप के ठंडे इलाकों से हजारों किलोमीटर का सफर तय करके कई दुर्लभ विदेशी प्रवासी पक्षी यहाँ आते हैं। पर्यटक यहाँ उत्तरी सीखपर (Northern Pintail), यूरेशियन विजन, गार्गनी बत्तख और कॉमन कूट जैसे जल-पक्षियों को देख सकते हैं। इसके अलावा, सुबह-सुबह शांत पानी में नक्काशीदार छतरियों का शीशे जैसा उल्टा रिफ्लेक्शन दिखता है, जो इंस्टाग्राम रील्स और फोटोग्राफी के लिए सबसे बेहतरीन सिनेमैटिक व्यू पॉइंट माना जाता है।

सेठानी का जोहड़ा किस जिले में स्थित है?

सेठानी का जोहड़ा राजस्थान के चूरू जिले में स्थित है। यह ऐतिहासिक जलकुंड मुख्य चूरू शहर से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर रतनगढ़-सरदारशहर मार्ग (NH 703) के बिल्कुल किनारे बना हुआ है। शेखावाटी पर्यटन सर्किट का हिस्सा होने के कारण यहाँ पहुँचने के लिए चूरू रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड से सीधे लोकल ई-रिक्शा और ऑटो मिल जाते हैं।

जोहड़ या जोहड़ा किसे कहते हैं?

राजस्थानी और शेखावाटी भाषा में ‘जोहड़’ या ‘जोहड़ा’ पारंपरिक वर्षा जल संचयन (Water Harvesting) के तालाब या कुंड को कहा जाता है। यह मरुस्थलीय इलाकों में इंसानों और मवेशियों के पीने के पानी के लिए पक्के या कच्चे पत्थरों से ढलानदार कैचमेंट एरिया के बीच बनाया जाता है, ताकि मानसून का पानी सालभर सुरक्षित रह सके।

क्या सेठानी का जोहड़ा चूरू में कोई एंट्री फीस, गाइड या प्री-बुकिंग की जरूरत होती है?

नहीं, सेठानी का जोहड़ा एक ऐतिहासिक और सार्वजनिक विरासत है, इसलिए यहाँ जाने के लिए कोई प्रवेश शुल्क (Entry Fee) या टिकट नहीं लगता, यह पूरी तरह मुफ्त है। यहाँ घूमने या अपने मोबाइल व कैमरे से सामान्य फोटोग्राफी/वीडियोग्राफी करने के लिए किसी प्री-बुकिंग की आवश्यकता नहीं होती है। यहाँ आधिकारिक तौर पर कोई सरकारी गाइड उपलब्ध नहीं है, लेकिन मुख्य हाईवे के किनारे होने के कारण आप इसे स्वयं आसानी से देख सकते हैं। इसके इतिहास की जानकारी देने वाले बोर्ड परिसर में स्थानीय भाषा में लगे हुए हैं।

चूरू को ‘थार मरुस्थल का प्रवेश द्वार’ क्यों कहा जाता है?

भौगोलिक स्थिति के कारण चूरू को ‘Gateway to the Thar Desert’ (थार मरुस्थल का प्रवेश द्वार) कहा जाता है। राष्ट्रीय राजमार्गों और रेलवे लाइनों द्वारा जब आप हरियाणा या दिल्ली की तरफ से आगे बढ़ते हैं, तो चूरू जिला पहला ऐसा क्षेत्र आता है जहाँ से रेगिस्तान के बड़े-बड़े रेतीले धोरे (Sand Dunes) और मरुस्थलीय वनस्पति (जैसे खेजड़ी और बबूल) शुरू हो जाते हैं। यही कारण है कि सेठानी का जोहड़ा जैसी ऐतिहासिक जल-संरक्षण प्रणालियों का महत्व इस मरुस्थलीय प्रवेश द्वार पर प्राचीन काल से ही बहुत अधिक रहा है।

सेठानी का जोहड़ा चूरू का निर्माण कार्य कुल कितने समय में पूरा हुआ था?

ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, सेठानी का जोहड़ा का मुख्य निर्माण कार्य लगभग एक से डेढ़ साल (1899-1900 ईस्वी) के भीतर पूरा कर लिया गया था। चूँकि इस जलाशय का निर्माण एक ‘अकाल राहत परियोजना’ (Famine Relief Scheme) के तहत किया जा रहा था, इसलिए सेठानी जी का मुख्य उद्देश्य काम की गति को तेज रखना था ताकि अधिक से अधिक पीड़ित मजदूरों को प्रतिदिन रोजगार और अनाज मिल सके। सैकड़ों स्थानीय कारीगरों (चेजारों) और हजारों मजदूरों ने दिन-रात लगकर इस विशाल कुंड, इसके पक्के घाटों और इसके किनारों पर बनी खूबसूरत अष्टकोणीय (Octagonal) छतरियों को बहुत ही कम समय में तराश कर खड़ा कर दिया था।

क्या सेठानी का जोहड़ा का पानी आज भी पीने योग्य या उपयोग के लायक है?

प्राचीन काल में इस जोहड़े का पानी प्राकृतिक रूप से शुद्ध रहता था क्योंकि इसके निर्माण में चूने (Lime) का उपयोग किया गया था, जो पानी को साफ रखता था। उस समय इसका उपयोग इंसानों और मवेशियों के पीने के लिए होता था। वर्तमान में, भूजल स्तर में बदलाव और उचित रखरखाव के अभाव में इसका पानी सीधे पीने योग्य नहीं रह गया है। हालाँकि, आज भी मानसून के दौरान इसमें भारी मात्रा में वर्षा जल एकत्र होता है, जिसका उपयोग आसपास के आवारा पशु, वन्यजीव (जैसे नीलगाय) और सर्दियों में आने वाले हजारों विदेशी प्रवासी पक्षी अपनी प्यास बुझाने के लिए करते हैं। यह अब एक महत्वपूर्ण स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) बन चुका है।

सेठानी का जोहड़ा के निर्माण से जुड़े ‘बागला परिवार’ का चूरू के इतिहास में क्या योगदान है?

चूरू के इतिहास में बागला परिवार का योगदान केवल सेठानी का जोहड़ा बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे इस क्षेत्र के सबसे बड़े दानवीर माने जाते थे। 19वीं सदी में जब इस मारवाड़ी परिवार ने कोलकाता और म्यांमार में अपना व्यापार फैलाया, तब उन्होंने अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा चूरू के विकास में लगाया। उन्होंने चूरू में विशाल ‘बागला हवेली’ बनवाई, जो अपनी अद्भुत फ्रेस्को पेंटिंग्स के लिए प्रसिद्ध है। इसके अलावा उन्होंने क्षेत्र में कई धर्मशालाएं, कुएं, प्याऊ और शिक्षण संस्थानों का निर्माण करवाया। उनके इसी जनहित के कार्यों के कारण ब्रिटिश हुकूमत ने परिवार के मुखिया भगवानदास बागला को ‘राय बहादुर’ की उपाधि दी थी।

सेठानी का जोहड़ा चूरू के पास ठहरने (Stay) और खाने-पीने के क्या विकल्प उपलब्ध हैं

सेठानी का जोहड़ा मुख्य राष्ट्रीय राजमार्ग (NH 703) के किनारे स्थित है, जहाँ सीधे तौर पर ठहरने की व्यवस्था नहीं है। हालाँकि, यह मुख्य चूरू शहर से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी पर है, इसलिए पर्यटक चूरू शहर में आसानी से ठहर सकते हैं। चूरू में आपको बजट होटलों से लेकर लग्जरी हेरिटेज होटल (जैसे मालजी का कमरा) तक के बेहतरीन विकल्प मिल जाएंगे। खाने-पीने के लिए हाईवे पर जोहड़े के आसपास कुछ स्थानीय ढाबे और चाय की दुकानें हैं, जहाँ राजस्थानी कड़क चाय और नाश्ता मिलता है। मुख्य भोजन के लिए चूरू शहर के रेस्टोरेंट्स सबसे अच्छे हैं, जहाँ आप प्रामाणिक राजस्थानी थाली (दाल-बाटी-चूरमा) का आनंद ले सकते हैं।

चूरू जिले का नाम ‘चूरू’ कैसे पड़ा और इसका इतिहास क्या है?

ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, चूरू शहर की स्थापना सन 1620 ईस्वी के आसपास ‘चूहड़ू’ (या चूहरू) नामक एक जाट शासक द्वारा की गई मानी जाती है। उन्हीं के नाम पर इस पूरे क्षेत्र और नगर का नाम “चूरू” पड़ा। बाद में यह क्षेत्र बीकानेर रियासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना और यहाँ मारवाड़ी व्यापारियों ने अपने बड़े-बड़े व्यापारिक साम्राज्य खड़े किए। रेतीले धोरों के बीच बसे होने के कारण ही इस जिले को ‘थार मरुस्थल का प्रवेश द्वार’ भी कहा जाता है, जहाँ सेठानी का जोहड़ा जैसी ऐतिहासिक धरोहरें स्थित हैं।

क्या सेठानी का जोहड़ा चूरू के पास कोई राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया गया है?

हाँ, यह स्थल अपनी जल-संरक्षण तकनीक और सामुदायिक इतिहास के लिए इतना महत्वपूर्ण है कि इसे “राष्ट्रीय पर्यटन दिवस” की विशेष थीम “ग्रामीण और सामुदायिक केंद्रित पर्यटन” (Rural and Community Centric Tourism) के तहत मुख्य आकर्षण के रूप में प्रदर्शित किया जा चुका है। यह इस बात का प्रमाण है कि 125 साल पहले स्थानीय समुदाय द्वारा अकाल राहत के लिए किया गया यह प्रयास आज भी आधुनिक दुनिया के लिए पर्यावरण, जल संरक्षण और संकट प्रबंधन (Disaster Management) का एक बहुत बड़ा और जीवंत उदाहरण है।

सेठानी का जोहड़ा में फिल्म शूटिंग

सेठानी जोहड़ अपनी शानदार स्थापत्य कला (वास्तुकला) और खूबसूरती के लिए जाना जाता है, जिसे निहारने लोग दूर-दूर से आते हैं। यह स्थान फिल्म निर्माताओं के लिए भी आकर्षण का केंद्र रहा है, जहाँ कई हिंदी और राजस्थानी फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है। यहाँ प्रसिद्ध हिंदी फिल्म ‘गुलामी’ का एक गाना फिल्माया गया था। इसके अलावा, लोकप्रिय राजस्थानी फिल्मों जैसे ‘रामू चनणा’, ‘लाडेसर भाभी’ और ‘आपन तो बेटी बचानी’ की शूटिंग भी इसी ऐतिहासिक जोहड़ पर की गई है।

क्या आपकी नजर में राजस्थान में ऐसे और जोहड़ा है?

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