राजस्थान के ‘रॉबिन हुड’ और प्रथम स्वतंत्रता सेनानी: डूंगजी और जवाहरजी का संपूर्ण इतिहास

डूंगजी और जवाहरजी राजस्थान के स्वतंत्रता संग्राम के वे अमर पुरोधा और लोक देवता हैं, जिन्होंने सन 1857 की क्रांति की औपचारिक शुरुआत से लगभग एक दशक पहले ही अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दी थीं। शेखावाटी की वीर प्रसूता भूमि से उठकर इन दोनों वीरों ने न केवल फिरंगियों के नाक में दम किया, बल्कि उनके पिट्ठू स्थानीय सामंतों, राजाओं और धनी साहूकारों को भी यह अहसास कराया कि देश की जनता गुलामी को स्वीकार नहीं करेगी।

इतिहास में उन्हें ‘राजस्थान का रॉबिन हुड’ कहा जाता है क्योंकि वे अंग्रेजों और अमीरों के राजकोषों को लूटकर उस धन को गरीब, बेसहारा और शोषित वर्ग में बांट देते थे। प्रस्तुत लेख में हम डूंगजी और जवाहरजी के प्रारंभिक जीवन, उनकी वैचारिक पृष्ठभूमि, विद्रोही गतिविधियों, आगरा किले की ऐतिहासिक फरारी, नसीराबाद छावनी पर साहसिक हमले और राजस्थान के जनमानस पर उनके अमिट प्रभाव का एक बेहद विस्तृत और शोधपूर्ण विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं।

डूंगजी और जवाहरजी:पारिवारिक पृष्ठभूमि और प्रारंभिक जीवन

डूंगजी और जवाहरजी का जन्म राजस्थान के शेखावाटी अंचल के अंतर्गत आने वाले वर्तमान सीकर जिले के बाठौठ-पाटोदा (बाटोत-पटेड़ा) नामक जुड़वां गाँवों में हुआ था। पारिवारिक रूप से ये दोनों कछवाहा राजपूत वंश की शेखवात खांप से ताल्लुक रखते थे और रिश्ते में चाचा-भतीजा थे।

डूंगजी (ठाकुर डूंगर सिंह शेखवात): वे बाठौठ-पाटोदा के छोटे जागीरदार थे। वे स्वभाव से अत्यंत स्वाभिमानी, साहसी और युद्ध कला में निपुण थे।

जवाहरजी (ठाकुर जवाहर सिंह शेखवात): वे डूंगजी के सगे भतीजे थे। जवाहरजी रणनीतिक रूप से बेहद चतुर, कूटनीतिज्ञ और गुरिल्ला युद्ध (छापामार युद्ध) पद्धति के विशेषज्ञ थे।

डूंगजी और जवाहरजी :शेखावाटी ब्रिगेड में रिसालदार का पद

अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी ने शेखावाटी क्षेत्र में बढ़ रहे जन-असंतोष और स्थानीय विद्रोहों को दबाने के लिए ‘शेखावाटी ब्रिगेड’ (Shekhawati Brigade) की स्थापना की थी। इस सैन्य टुकड़ी का मुख्य उद्देश्य शेखावाटी के स्वतंत्र चेतना वाले राजपूतों और अन्य जातियों को नियंत्रित करना था। डूंगजी और जवाहरजी अपनी योग्यता के बल पर इस शेखावाटी ब्रिगेड में रिसालदार (कैवेलरी कमांडर) के उच्च पद पर आसीन थे।

परंतु, स्वभाव से स्वतंत्र और देशभक्त होने के कारण वे लंबे समय तक अंग्रेजों की चाकरी नहीं कर सके। उन्होंने देखा कि किस प्रकार अंग्रेज अधिकारी स्थानीय जनता का शोषण कर रहे हैं और यहाँ के राजा-महाराजा मूकदर्शक बने हुए हैं। इसी वैचारिक मतभेद और मातृभूमि के प्रति अगाध प्रेम के कारण उन्होंने ब्रिटिश सेना की नौकरी को लात मार दी और हथियार उठाकर बागी हो गए।

विद्रोह का सूत्रपात और ‘धाड़ायती’ (रॉबिन हुड) आंदोलन

नौकरी छोड़ने के बाद डूंगजी और जवाहरजी ने अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने के लिए एक गुप्त विद्रोही संगठन का निर्माण किया। उन्होंने अरावली की पहाड़ियों और शेखावाटी के रेतीले धोरों को अपना ठिकाना बनाया। इस दल में समाज के हर वर्ग के साहसी युवाओं को शामिल किया गया, जिनमें जाट, मीणा, राजपूत और अन्य पिछड़ी जातियों के लोग थे।

डूंगजी-जवाहरजी के इस विद्रोही आंदोलन को स्थानीय भाषा में ‘धाड़ा’ (धाड़ायती) यानी छापामार डाका कहा जाता था। हालांकि, ब्रिटिश दस्तावेजों में इन्हें ‘डाकू’ या ‘लुटेरे’ लिखा गया, लेकिन आम जनता के लिए वे मसीहा थे। उनकी कार्यप्रणाली के मुख्य बिंदु निम्नलिखित थे:

ब्रिटिश खजानों को निशाना बनाना: वे ईस्ट इंडिया कंपनी के सैन्य काफिलों, डाक गाड़ियों और सरकारी खजानों पर अचानक हमला कर उन्हें लूटते थे।

अंग्रेज परस्त जमींदारों को दंड: शेखावाटी और मारवाड़ के जो सेठ और साहूकार अंग्रेजों को वित्तीय सहायता देते थे या उनके मुखबिर थे, डूंगजी की सेना उनके घरों पर धावा बोलती थी।

धन का लोक-कल्याणकारी वितरण: लूटे गए धन का एक भी हिस्सा वे अपने निजी ऐशो-आराम के लिए नहीं रखते थे। उस धन से:अकाल पीड़ित किसानों के लगान चुकाए जाते थे।गरीब कन्याओं के विवाह करवाए जाते थे।अकाल के समय चारे और पानी (कुएँ और बावड़ी निर्माण) की व्यवस्था की जाती थी।गायों की रक्षा के लिए गौशालाएं चलाई जाती थीं।

इसी लोक-कल्याणकारी नीति के कारण संपूर्ण राजपूताना में उनकी कीर्ति फैल गई और लोग उन्हें लोक-देवताओं की तरह पूजने लगे।

डूंगजी और जवाहरजी के साथ विश्वासघात की ऐतिहासिक घटना और आगरा किले में कैद

जैसे-जैसे डूंगजी और जवाहरजी का प्रभाव बढ़ा, अंग्रेजी प्रशासन की नींद उड़ गई। जयपुर, जोधपुर और बीकानेर के ब्रिटिश पोलिटिकल एजेंटों पर इन दोनों को जिंदा या मुर्दा पकड़ने का भारी दबाव था। लेकिन, स्थानीय जनता का पूर्ण समर्थन होने के कारण अंग्रेजों के लिए इन्हें पकड़ना नामुमकिन था; क्योंकि जब भी अंग्रेजी सेना आती, ग्रामीण लोग विद्रोही दल को पहले ही सतर्क कर देते थे।

अंततः, अंग्रेजों ने अपनी पुरानी और कुटिल नीति “फूट डालो और राज करो” का सहारा लिया। उन्होंने डूंगजी के सगे संबंधियों को लालच देना शुरू

साले भैरों सिंह का विश्वासघात :डूंगजी का विवाह मारवाड़ अंचल के एक ठिकाने में हुआ था। उनके सगे साले का नाम भैरों सिंह था। अंग्रेजों ने भैरों सिंह को भारी जागीर और धन का लालच देकर अपनी ओर मिला लिया।एक बार जब डूंगजी अपनी ससुराल (कुछ लोक कथाओं के अनुसार रामगढ़ के पास या मारवाड़ के एक ठिकाने में) आए हुए थे, तब भैरों सिंह ने अत्यधिक आतिथ्य सत्कार का नाटक किया। उसने डूंगजी को अत्यधिक मदिरापान करवाकर अचेत कर दिया। जब डूंगजी पूरी तरह बेसुध हो गए, तो भैरों सिंह ने चुपके से बाहर तैनात ब्रिटिश सेना को संकेत दे दिया।

डूंगजी को आगरा किले में बंदी बनाना

निहत्थे और अचेत डूंगजी को अंग्रेजों ने बड़ी क्रूरता से गिरफ्तार कर लिया। उन्हें मारवाड़ या जयपुर की किसी स्थानीय जेल में रखने के बजाय, अंग्रेजों ने उत्तर प्रदेश के आगरा किले (Agra Fort) की सबसे सुरक्षित और अंधेरी कालकोठरी में स्थानांतरित कर दिया ताकि राजपूताना की जनता विद्रोह न कर सके। आगरा का किला उस समय ब्रिटिश साम्राज्य की सबसे अभेद्य जेलों में से एक माना जाता था, जहाँ से परिंदा भी पर नहीं मार सकता था।

आगरा किले से फरारी: शौर्य, चातुर्य और राष्ट्रभक्ति की अद्भुत मिसाल

डूंगजी की गिरफ्तारी के बाद शेखावाटी में शोक की लहर दौड़ गई। जवाहरजी अकेले पड़ गए थे और विद्रोही दल बिखरने लगा था। जनश्रुतियों के अनुसार, डूंगजी की पत्नी (जवाहरजी की चाची) ने जवाहरजी और विद्रोही दल को धिक्कारते हुए कहा कि “तुम्हारा सरदार जेल में सड़ रहा है और तुम लोग यहाँ बैठे हो, तुम्हें शर्म आनी चाहिए।”

इस आत्मसम्मान की चोट ने जवाहरजी को एक ऐतिहासिक और असंभव लगने वाले मिशन के लिए प्रेरित किया। उन्होंने डूंगजी को आगरा के किले से छुड़ाने की प्रतिज्ञा की।

लोटिया जाट और करणा मीणा का प्रवेश

इस मिशन को अंजाम देने के लिए जवाहरजी ने अपने दो सबसे वफादार, बुद्धिमान और परम साहसी मित्रों को चुना:

लोथू निठारवाल (लोठू जाट / लोटिया जाट): वे सीकर के रिंगस के पास के रहने वाले थे। वे शारीरिक रूप से अत्यंत बलवान, महाबली और वेश बदलने में माहिर थे।

करणा मीणा (करणिया मीणा): वे गुरिल्ला युद्ध और रात के अंधेरे में रास्ता खोजने में उस्ताद थे।

इसके अलावा बालू नाई, सांवता मीणा और संकू लोहार भी इस दल के मुख्य रणनीतिकार थे।

बारात का स्वांग और ऐतिहासिक हमला (वि.सं. 1903 / सन 1846)

लोथू जाट की योजना के अनुसार, आगरा जैसे सुरक्षित सैन्य मुख्यालय पर सीधे हमला करना आत्महत्या जैसा था। इसलिए कूटनीति का सहारा लिया गया।

साधु और बारातियों का वेश: जवाहरजी, लोथू जाट, करणा मीणा और उनके लगभग 50-60 चुने हुए जांबाज सैनिकों ने साधु-संतों, व्यापारियों और एक बारात का नाटक रचा। उन्होंने अपने हथियारों को बारात के सामान और डोलियों में छिपा दिया।

मुहर्रम का दिन: उन्होंने हमले के लिए मुहर्रम का दिन चुना, जब आगरा शहर में भारी भीड़ थी और ब्रिटिश सैनिकों का ध्यान त्योहार की व्यवस्थाओं पर था।

किले पर धावा: लोथू जाट ने साधु के वेश में किले के संतरियों को अपनी बातों में उलझाया और सही मौका देखकर करणा मीणा और जवाहरजी के सैनिकों ने जेल के मुख्य प्रहरियों पर अचानक हमला कर दिया।

जेल के ताले तोड़ना: संकू लोहार ने भारी हथौड़ों से पल भर में डूंगजी की कोठरी के ताले तोड़ दिए। डूंगजी अपने भतीजे और सहयोगियों को देखकर अचंभित रह गए।

वे डूंगजी के साथ-साथ वहाँ बंद अन्य भारतीय कैदियों को भी आजाद करवाकर अंग्रेजों के अस्तबल से तेज तर्रार घोड़े छीनकर रातों-रात राजपूताना की ओर भाग निकले। यह घटना ब्रिटिश इतिहास के सबसे बड़े ‘प्रिसन ब्रेक’ (Prison Break) में से एक है, जिसने गवर्नर जनरल तक को हिलाकर रख दिया था।

नसीराबाद छावनी पर हमला: अंग्रेजों को खुली चुनौती

आगरा किले से मुक्त होने के बाद डूंगजी और जवाहरजी शांत नहीं बैठे। वे अंग्रेजों को यह दिखाना चाहते थे कि वे शेखावाटी के शेरों को हल्के में न लें। उन्होंने सीधे ब्रिटिश सेना के सबसे बड़े मुख्यालय नसीराबाद छावनी (अजमेर) को निशाना बनाने की योजना बनाई।

18 जून, 1847 की ऐतिहासिक घटना और डूंगजी-जवाहरजी

यह तारीख राजस्थान के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। डूंगजी-जवाहरजी के नेतृत्व में विद्रोही सेना ने नसीराबाद सैन्य छावनी पर भोर के समय अचानक धावा बोल दिया।

18 जून, 1847 को डूंगजी और जवाहरजी ने अजमेर स्थित नसीराबाद ब्रिटिश मिलिट्री कैंटोनमेंट को अपना मुख्य लक्ष्य बनाया। इस ऐतिहासिक हमले में उन्होंने सामरिक और आर्थिक रूप से अंग्रेजों की कमर तोड़ दी। विद्रोही दल ने ब्रिटिश राजकोष से 52,000 रुपये नकद लूटे और सामरिक क्षति पहुँचाते हुए अंग्रेजों के 27 सबसे उत्तम नस्ल के युद्ध-घोड़े और भारी मात्रा में हथियार जब्त कर लिए। इस अभियान की सबसे खास बात यह रही कि लूटी गई संपूर्ण राशि का उपयोग उन्होंने अपने निजी ऐशो-आराम के लिए नहीं किया; बल्कि उसे तुरंत पुष्कर (अजमेर) ले जाकर वहाँ के ब्राह्मणों, गरीबों और गौशालाओं को दान कर सामाजिक कल्याण का एक अनूठा उदाहरण पेश किया।

डूंगजी-जवाहरजी का ब्रिटिश सेना और रियासती फौजों से महासंग्राम

नसीराबाद की घटना के बाद ब्रिटिश हुकूमत पूरी तरह बौखला गई थी। ईस्ट इंडिया कंपनी के उच्च सैन्य अधिकारियों—कैप्टन मेसन, कैप्टन हाईलाक्स, मेजर फोरेस्टर और कैप्टन शॉक—ने डूंगजी-जवाहरजी को पकड़ने के लिए एक संयुक्त कमान बनाई।अंग्रेजों ने जयपुर, जोधपुर और बीकानेर के महाराजाओं पर दबाव बनाया कि वे अपनी सेनाएं इस विद्रोही दल के खिलाफ भेजें। चूंकि इन रियासतों ने अंग्रेजों के साथ सहायक संधियां कर रखी थीं, इसलिए मजबूरी में उन्हें ब्रिटिश हुकूमत का साथ देना पड़ा।

डूंगजी-जवाहरजी का बीकानेर और जोधपुर की सेनाओं से मुकाबला

डूंगजी और जवाहरजी की छोटी सी सेना का मुकाबला अब एक साथ तीन-चार बड़ी फौजों से था। उन्होंने छापामार युद्ध नीति अपनाई। वे अरावली की पहाड़ियों से होते हुए रेगिस्तानी इलाकों में चले जाते, जहाँ ब्रिटिश सेना पानी और रास्ते के अभाव में भटक जाती थी। इस दौरान कई छोटे-मोटे युद्ध हुए, जिनमें डूंगजी के दल ने रियासती फौजों को भारी नुकसान पहुँचाया।

डूंगजी-जवाहरजी का अंतिम समय और राजाओं द्वारा दिया गया ऐतिहासिक संरक्षण

लगातार संघर्ष और संसाधनों की कमी के कारण डूंगजी और जवाहरजी को अंततः अपनी रणनीति बदलनी पड़ी। वे समझ गए थे कि अब सीधे युद्ध के बजाय कूटनीतिक रूप से सुरक्षित होना आवश्यक है। यहाँ राजस्थान के दो महाराजाओं ने अपनी देशभक्ति और शरणागत वत्सलता का परिचय दिया, भले ही वे अंग्रेजों के दबाव में थे।

जवाहरजी और बीकानेर महाराजा रतन सिंह

जवाहरजी संघर्ष करते हुए बीकानेर रियासत की सीमा में प्रवेश कर गए। वहाँ के महाराजा रतन सिंह उनकी वीरता के कायल थे।जब अंग्रेजों को पता चला कि जवाहरजी बीकानेर में हैं, तो उन्होंने महाराजा रतन सिंह पर जवाहरजी को तुरंत उनके हवाले करने का भारी दबाव डाला।महाराजा रतन सिंह ने राजपूती परंपरा का पालन करते हुए अंग्रेजों के आदेश को ठुकरा दिया और जवाहरजी को अंग्रेजों को सौंपने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने जवाहरजी को अपने यहाँ ससम्मान संरक्षण दिया, जहाँ उन्होंने अपना शेष जीवन गरिमा के साथ बिताया।

डूंगजी और जोधपुर महाराजा तख्त सिंह

मारवाड़ क्षेत्र में अंग्रेजों से घिरने के बाद, डूंगजी ने जोधपुर के महाराजा तख्त सिंह के सामने इस शर्त पर आत्मसमर्पण किया कि उन्हें कभी भी अंग्रेजों के हवाले नहीं किया जाएगा। महाराजा ने यह शर्त स्वीकार कर ली, लेकिन जब अंग्रेजों ने डूंगजी को सौंपने का दबाव बनाया, तो जोधपुर की जनता और सामंतों ने ब्रिटिश सेना पर पत्थरों और हूटिंग से हमला कर तीखा विरोध किया। इस प्रचंड जन-आक्रोश को देखते हुए महाराजा तख्त सिंह ने डूंगजी को फिरंगियों से पूरी तरह मुक्त रखा। उन्होंने डूंगजी को जोधपुर के मेहरानगढ़ दुर्ग में अपनी व्यक्तिगत हिरासत और राजकीय संरक्षण में रखा, जहाँ इस महान वीर ने सम्मानपूर्वक अपने जीवन के अंतिम दिन व्यतीत किए।

छावनी’ या ‘डूंगजी-जवाहरजी री छावळी’ (लोकगीत)

राजस्थान के पारंपरिक लोक गायकों (भोपों) द्वारा रावणहत्था वाद्ययंत्र पर डूंगजी-जवाहरजी की वीरता के किस्से गाकर सुनाए जाते हैं। इन वीर रस से ओत-प्रोत लोकगीतों को ‘छावनी’ या ‘छावळी’ कहा जाता है (चूंकि इन्होंने नसीराबाद छावनी को लूटा था, इसलिए इनके गीतों का नाम छावनी पड़ा)। इन गीतों के माध्यम से आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में युवा पीढ़ी को राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा दी जाती है।

डूंगजी और जवाहरजी भारत में 1857 की क्रांति के सच्चे अग्रदूत थे, जिन्होंने मंगल पांडे से भी बहुत पहले अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का बिगुल फूंक दिया था। उनका आंदोलन सामाजिक समरसता का एक अद्भुत प्रतीक था; क्योंकि उनके दल में लोथू जाट और करणा मीणा जैसे विभिन्न समाजों के लोग शीर्ष पदों पर शामिल थे, जो यह साबित करता है कि उनकी जंग जातिवाद से ऊपर उठकर सिर्फ मातृभूमि के लिए थी। एक संपन्न जागीरदार होने के बावजूद उन्होंने महलों के सुख-वैभव को ठुकराकर जंगलों की खाक छानी और त्याग व निस्वार्थ सेवा की मिसाल पेश करते हुए गरीबों के कल्याण के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।

राजस्थान का रॉबिनहुड किसे कहा जाता है?

डूंगजी और जवाहरजी को राजस्थान का रॉबिनहुड कहा जाता है। इतिहास और लोक-परंपराओं में इन्हें गरीबों का मसीहा और ‘धावड़िए’ (धाड़ायती यानी छापामार डाका डालने वाले) कहा गया है क्योंकि ये अंग्रेजों और शोषक अमीरों की तिजोरियां लूटकर सारा धन जरूरतमंदों में बांट देते थे। सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से बहुत पहले ही फिरंगियों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह फूंकने के कारण शेखावाटी और मारवाड़ अंचल में इन्हें 1857 की क्रांति के लोक देवता के रूप में पूजा जाता है।

बलजी-भूरजी और डूंगजी-जवाहरजी में अंतर:

समय का अंतर: डूंगजी-जवाहरजी ने 1847 में नसीराबाद छावनी को लूटा था, जबकि बलजी-भूरजी का अंग्रेजों और जोधपुर की पुलिस के साथ अंतिम मुकाबला 30 अक्टूबर, 1926 को बीकानेर/जोधपुर सीमा पर बैरस (बेरासर) के टीलों पर हुआ था, जहाँ वे शहीद हुए थे।

समानता (कार्यशैली): बलजी और भूरजी भी डूंगजी-जवाहरजी की तरह ही ‘रॉबिन हुड’ शैली में काम करते थे। वे अंग्रेज समर्थक राजाओं, धनकुबेरों और फिरंगियों को लूटकर उस पैसे को गरीबों में बांटते थे।

अनोखा किस्सा: भूरजी इतने रौबीले और निडर थे कि वे अपने ऊँट की पूँछ पर अंग्रेजों का झंडा (यूनियन जैक) बांधकर रखते थे, जो अंग्रेजों के लिए सीधी चुनौती था।

आज भी सीकर जिले के पाटोदा गाँव में इन चारों वीरों (डूंगजी, जवाहरजी, बलजी और भूरजी) की याद में ‘डूंगजी जवाहरजी एवं बलजी भूरजी स्मृति पुरस्कार’ समारोह आयोजित किया जाता है। दोनों जोड़ियाँ अलग-अलग समय की थीं, लेकिन दोनों का लक्ष्य एक ही था—अंग्रेजी हुकूमत का खात्मा।

डूंगजी और जवाहरजी को अन्य किन उपनामों से जाना जाता है?

डूंगजी और जवाहरजी को शेखावाटी और पश्चिमी राजस्थान के ग्रामीण अंचलों में अत्यधिक सम्मान प्राप्त है। लोक संस्कृति में इन्हें आदरपूर्वक ‘बलजी और भूरजी’ के नाम से पुकारा जाता है। इसके अतिरिक्त, गरीबों के हक के लिए लड़ने, अमीरों व अंग्रेजों का धन लूटकर निर्धनों की सहायता करने की अनूठी कार्यशैली के कारण इतिहासकारों ने इन्हें “राजस्थान का रॉबिन हुड” भी कहा है।

नसीराबाद छावनी को लूटने के बाद उन्होंने उस धन का क्या उपयोग किया था?

: 18 जून, 1847 को नसीराबाद छावनी पर किए गए ऐतिहासिक हमले में उन्हें ब्रिटिश खजाने से लगभग 52,000 रुपये की भारी धनराशि और कई बहुमूल्य अरबी घोड़े प्राप्त हुए थे। इस लूटे गए धन को उन्होंने अपने निजी स्वार्थ के लिए बिल्कुल इस्तेमाल नहीं किया। धार्मिक और सामाजिक कल्याण की भावना से प्रेरित होकर उन्होंने इस धन का एक बड़ा हिस्सा मथुरा के चौबे ब्राह्मणों को दान स्वरूप भेंट किया। इसके साथ ही, हिंदुओं के पवित्र तीर्थ स्थल पुष्कर (अजमेर) में एक विशाल गौशाला का निर्माण करवाया ताकि लावारिस और बेसहारा गायों की सेवा की जा सके। बचा हुआ शेष धन उन्होंने स्थानीय गरीब, अकाल पीड़ित और जरूरतमंद परिवारों में वितरित कर दिया।

डूंगजी को बंदी बनाने के लिए अंग्रेजों को किस स्थानीय शासक या व्यक्ति ने सहयोग दिया था?

अंग्रेज सीधे तौर पर डूंगजी को पकड़ने में बार-बार असफल हो रहे थे। अंततः उन्होंने कूटनीति और लालच का सहारा लिया। डूंगजी के सगे साले भैरों सिंह (भैरू सिंह) ने धन और जागीर के लालच में आकर अंग्रेजों के साथ गुप्त समझौता कर लिया। भैरू सिंह ने डूंगजी को अपने यहाँ दावत पर बुलाया और अत्यधिक मदिरापान करवाकर उन्हें पूरी तरह अचेत कर दिया। इस विश्वासघात के बाद जोधपुर रियासत की सेना ने अचेत अवस्था में डूंगजी को धोखे से गिरफ्तार कर लिया और तुरंत ब्रिटिश अधिकारियों को सौंप दिया, जिन्होंने उन्हें सुरक्षा के लिहाज से आगरा के अभेद्य और सबसे सुरक्षित माने जाने वाले किले में कैद कर दिया था।

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