हाड़ी रानी का बलिदान: युद्ध के मैदान में जब पत्नी ने भेंट किया अपना ही सिर (The Sacrifice of Hadi Rani)

राजस्थान की धरती वीरों की ही नहीं, वीरांगनाओं की भी रही है। हाड़ी रानी (Hadi Rani), जिनका वास्तविक नाम सलेह कंवर था, उनकी कहानी वीरता और कर्तव्य के प्रति समर्पण की ऐसी मिसाल है जो दुनिया में कहीं और नहीं मिलती।

वह ऐतिहासिक युद्ध और हाड़ी रानी का निर्णय

यह कहानी 17वीं शताब्दी (17th Century) की है। बूंदी के हाड़ा शासक की बेटी सलेह कंवर का विवाह सलूंबर (उदयपुर) के राव रतन सिंह चूंडावत (Rao Ratan Singh Chundawat) से हुआ था। विवाह के मात्र 2 दिन (2 Days) ही हुए थे कि महाराणा राजसिंह का संदेश पहुँचा—औरंगजेब की सेना को रोकने के लिए रतन सिंह को तुरंत युद्ध पर जाना था।

“चूंडावत माँगी सैंणाणी, सिर काट दे दियो क्षत्राणी”

राव रतन सिंह अपनी नई-नवेली रानी के मोह में थे। युद्ध के मैदान में जाते समय उन्होंने रानी से उनकी कोई निशानी (Souvenir/Token) माँगी। हाड़ी रानी को लगा कि उनके पति का मोह उन्हें युद्ध जीतने नहीं देगा और वे मातृभूमि के प्रति अपना कर्तव्य नहीं निभा पाएंगे।

  • तब रानी ने एक ऐसा फैसला लिया जिसे सुनकर आज भी आंखें नम हो जाती हैं:
  • रानी ने अपने हाथों से अपना सिर काट दिया (Beheaded Herself)।
  • उसे थाली में सजाकर पति के पास भिजवा दिया ताकि पति का मोह खत्म हो सके और वे वीरता (Valor) के साथ लड़ सकें।

Quick Fact Box: हाड़ी रानी महत्वपूर्ण जानकारी

  • वास्तविक नाम सलेह कंवर / सहल कंवर
  • पति का नाम राव रतन सिंह चूंडावत
  • रियासत बूंदी (मायका), सलूंबर (ससुराल)
  • प्रसिद्ध कविता ‘सेनाणी’ (मेघराज मुकुल द्वारा लिखित)
  • मुख्य स्मारक सलूंबर और बूंदी (Hadi Rani Circle)

हाड़ी रानी का बलिदान (Hadi Rani Sacrifice) आज के समय क्या संदेश देता है?

हाड़ी रानी का बलिदान केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि कर्तव्य के प्रति सर्वोच्च समर्पण (Supreme Sacrifice) का प्रतीक है। जब राव रतन सिंह अपनी पत्नी के मोह में युद्ध से विचलित हो रहे थे, तब रानी ने महसूस किया कि एक क्षत्राणी का धर्म अपने पति को कमज़ोर करना नहीं, बल्कि उसे मातृभूमि के लिए प्रेरित करना है। हमारी टीम का अनुभव (Our Team Experience) यह रहा है कि जब आप सलूंबर या बूंदी की गलियों में जाते हैं, तो वहां की हवा में आज भी रानी की वीरता की कहानियाँ गूंजती हैं। रानी का यह कदम सिखाता है कि देश और कर्तव्य (Country and Duty) निजी प्रेम से ऊपर होते हैं। यही कारण है कि सदियों बाद भी राजस्थान के हर घर में हाड़ी रानी का नाम सम्मान से लिया जाता है।

सलूंबर में हाड़ी रानी से जुड़े कौन से स्थान (Places to visit in Salumbar) देखने लायक हैं?

यदि आप हाड़ी रानी के इतिहास को करीब से देखना चाहते हैं, तो आपको उदयपुर के पास स्थित सलूंबर (Salumbar) जरूर जाना चाहिए। वहां रानी की याद में बना ‘हाड़ी रानी महल’ और उनकी छतरी (Cenotaph) आज भी मौजूद है।

मेघराज मुकुल की प्रसिद्ध कविता ‘सेनाणी’ (Senani Poem by Meghraj Mukul) और हाड़ी रानी का क्या संबंध है?

हाड़ी रानी के बलिदान को अमर करने में राजस्थानी कवि मेघराज मुकुल की कविता ‘सेनाणी’ (Senani) का सबसे बड़ा हाथ है। इस कविता की प्रसिद्ध पंक्तियाँ— “चूंडावत माँगी सैंणाणी, सिर काट दे दियो क्षत्राणी” आज भी राजस्थान के हर बच्चे की जुबान पर हैं। ‘सेनाणी’ शब्द का अर्थ है ‘निशानी’ (Souvenir/Token)। कविता में बताया गया है कि जब राव रतन सिंह युद्ध के लिए प्रस्थान कर रहे थे, तो उनका मन बार-बार रानी की याद में विचलित हो रहा था। उन्होंने अपने सैनिक को भेजकर रानी से कोई निशानी लाने को कहा। रानी ने सोचा कि यदि उनके पति का मोह इसी तरह रहा, तो वे युद्ध हार जाएंगे और पीठ दिखाकर लौट आएंगे। इसलिए उन्होंने अपनी अंतिम निशानी के रूप में अपना शीश (Head) ही काट कर दे दिया। हमारी टीम का अनुभव (Our Team Experience) रहा है कि इस कविता को सुनने मात्र से आँखों में आँसू आ जाते हैं। यह कविता राजस्थान के वीर रस (Heroic Poetry) का सबसे बड़ा उदाहरण है।

हाड़ी रानी की बावड़ी (Hadi Rani Ki Baori) कहाँ स्थित है और इसकी क्या खासियत है?

हाड़ी रानी के नाम से मशहूर एक बेहद खूबसूरत और ऐतिहासिक बावड़ी टोडा रायसिंह (टोंक जिला) में स्थित है। इसे ‘हाड़ी रानी की बावड़ी’ (Hadi Rani Ki Baori, Toda Rai Singh) कहा जाता है। यह बावड़ी अपनी अनूठी वास्तुकला (Architecture) और सीढ़ियों के बेहतरीन जाल के लिए जानी जाती है। माना जाता है कि इसका निर्माण 12वीं से 17वीं शताब्दी के बीच हुआ था। लोकल गाइड (Local Guide) बताते हैं कि यहाँ की सीढ़ियाँ इस तरह बनी हैं कि आप जिस सीढ़ी से नीचे उतरते हैं, उसी से वापस ऊपर नहीं आ सकते। फोटोग्राफी के शौकीनों और इतिहास प्रेमियों के लिए यह एक परफेक्ट पिकनिक स्पॉट (Perfect Picnic Spot) है। ₹500 के बजट में आप जयपुर से टोंक की यात्रा कर इस शानदार बावड़ी को देख सकते हैं। हमारी टीम ने यहाँ पाया कि यह जगह फिल्मों की शूटिंग के लिए भी काफी पसंद की जाती है।

क्या राव रतन सिंह चूंडावत ने वह युद्ध जीता था और उसके बाद उनका क्या हुआ?

हाड़ी रानी के बलिदान के बाद जब राव रतन सिंह के पास रानी का कटा हुआ सिर पहुँचा, तो वे स्तब्ध रह गए। उनके मन से मोह के सारे बंधन टूट गए और वे भयंकर क्रोध (Fierce Anger) के साथ युद्ध के मैदान में उतरे। उन्होंने मुगल सेना (Aurangzeb’s Army) के छक्के छुड़ा दिए और उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया। इतिहास (History) गवाह है कि औरंगजेब की सेना उस समय मेवाड़ की सीमाओं में प्रवेश नहीं कर पाई थी। युद्ध जीतने के बाद, रानी के वियोग में राव रतन सिंह भी अधिक समय तक जीवित नहीं रहे और उन्होंने भी अपनी वीरगति प्राप्त की। हमारे साझा अनुभवों (Shared Experiences) के आधार पर, यह कहानी केवल एक बलिदान की नहीं, बल्कि एक पति-पत्नी के अटूट प्रेम और देश के प्रति उनके साझा कर्तव्य (Common Duty) की है।

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