मारवाड़ की पन्ना धाय “गोरा धाय” और धौंसा का अविस्मरणीय इतिहास: बलिदान की पूरी गाथा

गोरा धाय” और धौंसा नाम आपने सुने नहीं होंगे या सुने भी है तो उतना नहीं सुने होंगे जितना सुनना और समझना चाहिए था।राजस्थान (Rajasthan) की धरती केवल किलों और महलों के लिए ही नहीं, बल्कि यहाँ की माताओं के अटूट बलिदान (Unforgettable Sacrifice) के लिए भी जानी जाती है। जब भी त्याग की बात आती है, तो मेवाड़ की पन्ना धाय का नाम सबसे पहले आता है, लेकिन मारवाड़ (Marwar) के इतिहास में भी एक ऐसी ही वीरांगना हुई थीं— गोरा धाय (Gora Dhai)।

औरंगजेब की कैद और गोरा धाय का साहसी मिशन (Rescue from Aurangzeb)

1679 में जब महाराजा जसवंत सिंह का निधन हुआ, तो मुगल बादशाह औरंगजेब (Aurangzeb) ने नन्हे राजकुमार अजीत सिंह को दिल्ली (Delhi) में कैद कर लिया। औरंगजेब का इरादा राजकुमार का धर्म परिवर्तन (Religious Conversion) कराना था। ऐसे कठिन समय में मारवाड़ के रक्षक वीर दुर्गादास राठौड़ (Veer Durgadas Rathore) ने एक गुप्त योजना (Secret Plan) बनाई।

इस योजना की सबसे मजबूत कड़ी थीं गोरा धाय। हमारी टीम के साथ मौजूद स्थानीय गाइड (Local Guide) ने बताया कि मुगलों की आँखों में धूल झोंकने के लिए गोरा धाय ने अपने स्वयं के पुत्र का मोह त्याग दिया। उन्होंने राजकुमार के बिस्तर पर अपने बेटे को सुला दिया और असली राजकुमार अजीत सिंह को एक टोकरी (Basket) में छिपाकर सुरक्षित बाहर निकाल लाईं।

जब मुगलों को असलियत का पता चला, तो उन्होंने गोरा धाय के मासूम पुत्र को मार दिया। एक माँ के लिए अपने बच्चे का यह बलिदान (Sacrifice of Son) इतिहास में विरला ही मिलता है।

धौंसा: मारवाड़ का राष्ट्रगान और गोरा धाय (Marwar National Anthem Dhaunsa)

जोधपुर के इतिहास में गोरा धाय का सम्मान इतना अधिक है कि मारवाड़ के ‘राष्ट्रगान’ जिसे ‘धौंसा’ (Dhaunsa) कहा जाता है, उसमें भी उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।हमने जोधपुर के ‘खांडा फलसा’ (Khanda Falsa) के पास एक लोकल ढाबे (Local Dhaba) पर बुजुर्गों से बातचीत की। उन्होंने बड़े गर्व से बताया कि जब भी जीत की खुशी में ‘धौंसा’ नगाड़ा (Dhaunsa Drum) बजता था, तो उसकी गूँज के साथ गोरा धाय की यशगाथा (Glory of Gora Dhai) गाई जाती थी। यह दुनिया का शायद इकलौता ऐसा राष्ट्रगान (National Anthem) है, जहाँ एक राजा के साथ उसकी ‘धाय माँ’ (Wet Nurse) को भी बराबर का सम्मान दिया गया

जोधपुर में गोरा धाय के स्मारक (Monuments in Jodhpur)

गोरा धाय की छतरी (Gora Dhai ki Chhatri): यह छतरी जोधपुर के आड़ा बाज़ार (Ada Bazar) के पास स्थित है। इसकी राजपूताना वास्तुकला (Rajputana Architecture) और बारीक नक्काशी (Intricate Carving) देखने लायक है।

गोरंधा बावड़ी (Gorandha Bawri): महाराजा अजीत सिंह ने अपनी कृतज्ञता (Gratitude) प्रकट करने के लिए इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। स्थानीय लोग (Local People) इसे आज भी श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं।

जोधपुर के किले में धौंसा की परंपरा (Tradition in Jodhpur Fort)

हमारी टीम ने जब मेहरानगढ़ किले की यात्रा की, तो वहां के लोकल गाइड (Local Guide) ने बताया कि धौंसा की परंपरा महाराजा अजीत सिंह (Maharaja Ajit Singh) के समय से और भी अधिक शक्तिशाली हो गई थी।सुबह और शाम की घोषणा: पुराने समय में किले के मुख्य द्वार पर धौंसा बजाकर दिन की शुरुआत और समाप्ति की घोषणा की जाती थी।गोरा धाय का सम्मान: हमने किले के पास की एक लोकल दुकान (Local Shop) पर पुराने जानकारों से सुना कि जब भी धौंसा बजता था, तो वह गोरा धाय के उस बलिदान की याद दिलाता था जिसकी वजह से आज मारवाड़ का राजघराना सुरक्षित है।हाथी पर सवारी: धौंसा हमेशा हाथी की पीठ पर सजकर निकलता था। हमने पास के एक लोकल ढाबे (Local Dhaba) पर बुजुर्गों से सुना कि “जब धौंसा की पहली चोट पड़ती थी, तो पूरा जोधपुर जान जाता था कि आज कोई बड़ा उत्सव या विजय की खबर आई है।”

महाराजा अजीत सिंह और धौंसा का इतिहास (The Connection)

जब वीर दुर्गादास राठौड़ (Veer Durgadas Rathore) और गोरा धाय ने राजकुमार अजीत सिंह को औरंगजेब की कैद से मुक्त कराकर जोधपुर वापस लाया, तो मारवाड़ का भविष्य सुरक्षित हो गया।

कृतज्ञता का प्रतीक: महाराजा अजीत सिंह जब शासक बने, तो उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि उनके राज्य के सबसे पवित्र गान ‘धौंसा’ में उनकी रक्षक माँ गोरा धाय (Gora Dhai) का नाम हमेशा के लिए अमर हो जाए।

धौंसा की गूंज: हमने जोधपुर के ‘खांडा फलसा’ के पास एक लोकल ढाबे (Local Dhaba) पर पुराने बुजुर्गों से सुना कि जब धौंसा बजता था, तो उसकी धमक के साथ गाये जाने वाले शब्दों में गोरा धाय की ममता और बलिदान का बखान होता था, जिससे प्रजा की आँखें नम हो जाती थीं।

राजसी सम्मान: अजीत सिंह ने आदेश दिया था कि जैसे मारवाड़ के राजाओं का सम्मान होता है, वैसे ही गोरा धाय के बलिदान का गान हर विजयोत्सव पर किया जाए।

मारवाड़ के राष्ट्रगान ‘धौंसा’ के बोल (Lyrics and Meaning)

धौंसा गान की पंक्तियाँ राजस्थानी और डिंगल भाषा के प्रभाव वाली हैं। हमारी टीम को शोध के दौरान इसके कुछ मुख्य अंश मिले हैं, जो महाराजा अजीत सिंह के राज्याभिषेक के समय गाए जाते थे:”धौंसा बाजे धू धू करे, मारवाड़ रो मान बधावे…”(अर्थ: धौंसा की गंभीर आवाज गूंज रही है, जो मारवाड़ के सम्मान को बढ़ा रही है…)

इसमें गोरा धाय का विशेष उल्लेख:गान के दौरान एक महत्वपूर्ण हिस्सा आता है जिसमें कहा जाता है कि किस तरह गोरा धाय ने अपने पुत्र का मोह त्याग कर मारवाड़ के सूरज (अजीत सिंह) को बचाया। हमने जोधपुर के ‘खांडा फलसा’ के पास एक लोकल ढाबे (Local Dhaba) पर बुजुर्गों से सुना कि जब तक यह गान बजता था, प्रजा भावविभोर हो जाती थी।

धौंसा की विशिष्टताएं (Unique Features)

राजसी सवारी का गौरव: पुराने समय में जब मारवाड़ की सेना युद्ध के लिए निकलती या महाराजा का काफिला चलता, तो हाथी पर रखा धौंसा सबसे आगे होता था। इसकी ‘धूँ-धूँ’ की आवाज़ दुश्मन के दिल में खौफ और प्रजा में जोश भर देती थी।

जोड़ी में प्रयोग: अक्सर इसे जोड़ों में बजाया जाता था। हमने एक लोकल ढाबे (Local Dhaba) पर बुजुर्गों से सुना कि “धौंसा की धमक ऐसी होती थी कि ज़मीन तक काँप उठती थी।”

कलात्मक नक्काशी: धौंसा के धातु के घेरे पर अक्सर राजसी चिन्ह और सुंदर नक्काशी की जाती थी, जो इसे एक वाद्य यंत्र से कहीं अधिक एक ऐतिहासिक धरोहर बनाती है।

गोरा धाय किस समाज से थीं और उनका स्मारक कहाँ है?

गोरा धाय माली समाज (Mali Community) से ताल्लुक रखती थीं। उनका स्मारक (Monument), जिसे ‘गोरा धाय की छतरी’ (Gora Dhai ki Chhatri) कहा जाता है, जोधपुर के पुराने शहर (Old Jodhpur City) के खांडा फलसा (Khanda Falsa) क्षेत्र में स्थित है। यह छतरी अपनी बारीक नक्काशी (Fine Carving) के लिए भी प्रसिद्ध है।

‘गोरंधा बावड़ी’ का गोरा धाय से क्या संबंध है?

महाराजा अजीत सिंह ने अपनी ‘धाय माँ’ के प्रति कृतज्ञता (Gratitude) प्रकट करने के लिए जोधपुर में एक बावड़ी का निर्माण करवाया था, जिसे ‘गोरंधा बावड़ी’ (Gorandha Bawri) कहा जाता है। ‘गोरंधा’ शब्द असल में गोरा धाय का ही अपभ्रंश (Modified Name) है।

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