खाटू श्याम जी को ‘निशान’ क्यों चढ़ाया जाता है? जानें महत्व और निशान चढ़ाने की सही विधि!

Khatu Shyam Ji Nishan Importance: खाटू श्याम जी की पदयात्रा में आपने भक्तों के हाथों में रंग-बिरंगे झंडे देखे होंगे, जिन्हें ‘निशान’ (Nishan) कहा जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह निशान सिर्फ एक झंडा नहीं, बल्कि भक्त के समर्पण का प्रतीक है? हमारी टीम ने रींगस से खाटू तक की पदयात्रा के दौरान भक्तों और अनुभवी पुजारियों से इस परंपरा की बारीकियों को समझा।

क्या है ‘निशान’ और इसका महत्व?

निशान असल में बाबा श्याम के विजय ध्वज का प्रतीक है।

  • त्याग का प्रतीक: यह माना जाता है कि जब बर्बरीक ने अपना शीश दान किया था, तो उन्होंने धर्म की विजय के लिए यह बलिदान दिया था। यह निशान उसी धर्म की जीत का संदेश देता है।
  • अर्जी का रूप: भक्त अपनी मनोकामना (Ardas) के लिए निशान लेकर पदयात्रा करते हैं।
  • रंगों का अर्थ: मुख्य रूप से केसरिया, नीला, सफेद और लाल रंग के निशान चढ़ाए जाते हैं, जो शांति, शक्ति और भक्ति को दर्शाते हैं।

निशान चढ़ाने की सही विधि (Proper Ritual)

हमारी टीम ने स्थानीय गाइड (Local Guide) से बातचीत में जाना कि कई भक्त अनजाने में गलतियाँ करते हैं। सही विधि इस प्रकार है:

  • रींगस से शुरुआत: परंपरा के अनुसार, भक्त रींगस (Ringas) से निशान लेकर पैदल यात्रा शुरू करते हैं।
  • पवित्रता का ध्यान: यात्रा के दौरान निशान को जमीन पर नहीं रखा जाता। यदि विश्राम करना हो, तो इसे किसी ऊँचे स्थान पर या स्टैंड पर रखा जाता है।
  • भजन-कीर्तन: यात्रा के दौरान “जय श्री श्याम” का जाप करते रहने से यात्रा का फल कई गुना बढ़ जाता है।
  • अर्पण: मंदिर पहुँचकर इस निशान को बाबा के चरणों में या मंदिर शिखर पर चढ़ाया जाता है।

क्या घर पर भी निशान चढ़ा सकते हैं?

जी हाँ, यदि आप खाटू नहीं जा सकते, तो अपने घर के मंदिर या स्थानीय श्याम मंदिर में भी निशान चढ़ा सकते हैं।

क्या निशान को जमीन पर रख सकते हैं?

नहीं, निशान को हमेशा सम्मानपूर्वक हाथों में या स्टैंड पर रखना चाहिए।

निशान चढ़ाने से क्या होता है?

मान्यता है कि निशान चढ़ाने से भक्त के सभी कष्ट बाबा श्याम अपने ऊपर ले लेते हैं।

निष्कर्ष: आस्था का वो अटूट धागा जो सबको जोड़ता है ।खाटू श्याम जी की महिमा शब्दों में बांधना असंभव है। चाहे वह ‘हारे का सहारा’ कहलाने वाली उनकी कहानियाँ हों, उनके साक्षात् चमत्कार हों, या रींगस से खाटू तक हाथों में ‘निशान’ लेकर भक्तों का वह अटूट जोश—यह सब केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक गहरा एहसास है।हमारी टीम ने अपनी इस यात्रा के दौरान यह महसूस किया कि खाटू की गलियों में जो शांति और अपनापन है, वह दुनिया के किसी भी कोने में मिलना मुश्किल है। वहां न कोई अमीर है, न कोई गरीब; वहां सिर्फ ‘श्याम के दीवाने’ हैं। यदि आपकी जिंदगी में भी कभी अंधेरा आए, तो बस एक बार सच्चे मन से “जय श्री श्याम” बोलकर देखिएगा, क्योंकि बाबा का वादा है— “जब दुनिया साथ छोड़ देगी, तब मैं हाथ पकड़ लूँगा।”

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