करणी चरित्र के अनुसार, जब श्री करणी जी (Shri Karni Ji) का जन्म हुआ, तब उनकी माता देवल देवी कुछ समय के लिए मूर्छित (Unconscious) हो गई थीं। मूर्च्छा की स्थिति में उन्हें साक्षात् दुर्गा के दर्शन हुए। लेकिन जब उन्हें होश आया, तो उन्होंने अपने पास एक साधारण सी दिखने वाली कन्या को पाया। देवल देवी को लगा कि शायद दुर्गा के दर्शन मात्र एक भ्रम (Illusion) थे।जब शिशु के रोने की आवाज पिता मेहाजी (Meha Ji) के कानों में पड़ी, तो उन्होंने अपनी बहन (करणी माता की बुआ) से उत्सुकतापूर्वक पूछा कि क्या हुआ है, लड़का या लड़की?
बुआ का उपहास और पहला चमत्कार (The First Miracle)
उस दौर में कन्या के जन्म को अक्सर शुभ नहीं माना जाता था। मेहाजी की बहन ने हाथ का ‘डूचका’ (एक तरह का इशारा) देते हुए ताना मारा और कहा— “फिर पत्थर आ गया” (अर्थात् फिर से लड़की हुई है)।
जैसे ही बुआ ने यह अपशब्द कहे, उनकी पांचों अंगुलियां वैसी की वैसी ही आपस में जुड़ गई।
बुआ की अंगुलियां ठीक करना: आगे चलकर रिधूबाई ने ही अपनी बुआ की उन जुड़ी हुई अंगुलियों को ठीक किया था, जिसके बाद उनका नाम ‘करणी’ पड़ा।


